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दर्द-ए-गौमाता : कामधेनु वि.वि, गौ सेवा आयोग पर सरकार खर्च करती है 76 करोड़, पर गायों को बचाने में सभी असमर्थ!

दर्द-ए-गौमाता : कामधेनु वि.वि, गौ सेवा आयोग पर सरकार खर्च करती है 76 करोड़, पर गायों को बचाने में सभी असमर्थ!

आशिका कुजूर

रायपुर. गांव से लेकर शहर तथा पगडंडियों से लेकर हाईवे तक में हो रही सड़क दुर्घटनाओं में सैकड़ों गायों की मौत पर चिंता और दु:ख जरूर जताया जा रहा है लेकिन इसकी जिम्मेदारी गौ—मालिक से लेकर सरकारी विभाग तक सभी पल्ला झाड़ रहे हैं. आश्चर्य कि पशुपालन विभाग का बजट सालाना 517 करोड़ रूपये है. सरकार ने कामधेनु विश्वविद्यालय और गौ सेवा आयोग खोल रखे हैं साथ ही 100 से ज्यादा गौ शालाएं संचालित हो रही हैं परंतु गौ—वंश की हत्या को रोकने के लिए इन विभागों ने कोई कानून तक नहीं बनाया ताकि दोषियों पर शिकंजा कस सकें.

छत्तीसगढ़ में नई सरकार बनने के तुरंत बाद ही नरवा, गरुवा, घुरुवा, बाड़ी योजना लागू की गई थी। शुक्रवार को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उपराष्ट्रपति एम. वेंकैय्या नायडू से मुलाकत कर इस विषय में चर्चा की तब उपराष्ट्रपति ने इस योजना की तारीफ़ भी की। योजना को रूप रेखा के अनुसार धीरे-धीरे अमल में लाया जा रहा है। प्रदेश के मुखिया ने कहा कि अब तक देश के हज़ार गावों में गौठानों का निर्माण भी हो चुका है और मवेशियों की अच्छी तरह से देखरेख की जा रही है, लेकिन वास्तविकता में इसके ठीक विपरीत परिस्तिथियाँ हैं कि प्रदेश भर में सड़क में घूमने वाले मवेशियों की वजह से दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं।

आवारा मवेशियों के लिये कई गौठानों का निर्माण किया गया है, लेकिन इन्हें वहां रखने की जहमत नहीं की जाती है। हाल ही में राजधानी रायपुर से लगे धरसीवां में 10 गायों को अज्ञात वाहन ने रौंद दिया। इससे 8 गायों की सड़क पर तड़पकर दर्दनागक मौत हो गई। वहीं दो गायों को इलाज के लिए भेजा गया। इसकी जानकारी लोगों मिली तो वहां हड़कंप मच गया और आक्रोशित होकर लोग सड़क पर हंगामा करने लगे। पुलिस की समझाइस के बाद ग्रामीण ग्रामीणों ने सड़क जाम नहीं किया। सड़क दुर्घटना में पिछले पांच दिन में 18 गायों की मौत हो चुकी है। क्षेत्र में यह कोई पहली घटना नही है इसके पहले 5 एवं 6 सितंबर की रात भी रायपुर बलौदाबाजार मार्ग पर एक कार ने एक लाइन से दस गायों को इतनी जोरदार टक्कर मारी थी कि उसमें भी 8 गायों की मौत और दो गाय घायल हुई थीं। वहीं सोमवार को भी औद्योगिक क्षेत्र के फेस-2 में मुरेठी मार्ग पर अज्ञात वाहन के रौंदने से दो गाय सड़क पर मृत मिली थी।

पशुपालन विभाग, गौ सेवा आयोग के अलावा सरकार ने कामधेनु विश्वविद्यालय की स्थापना की है जिनका करोड़ों रूपये बजट है. छत्तीसगढ़ गौ सेवा आयोग का बजट सालाना 6 करोड़ से अधिक का है जिसके अंतर्गत 111 से ज्यादा गौ शालाएं संचालित की जाती हैं. प्रत्येक गौशाला को लाखों रूपये आर्थिक अनुदान भी आयोग देता हैं लेकिन इनमें से कोई भी संस्था गायों की मौत के प्रति उत्तरदायी नही है. आश्चर्य कि प्रदेश में ऐसा कोई कानून भी नही है जिसके चलते गौ मालिकों की जिम्मेदारी तय की जा सके या गाय माता की मौत के लिए कोई सजा का प्रावधान भी नही है.

300 से ज्यादा गायों की मौतें पर सरकार के पास कोई योजना, कानून नही : ओमेश बिसेन
अखिल विश्व गौसेना के प्रान्त संयोजक उमेश बिसेन जो पिछले कई सालों से मवेशियों के लिए उचित व्यवस्था मुहैया कराने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उनका दावा है कि पिछले तीन महीने में 300 से ज्यादा गौ—माताओं की मौत अलग—अलग कारणों से हुई है जिनमें सड़क दुर्घटनाएं भी शामिल हैं. आश्चर्य कि इन्हें बचाने के लिए या आरोपियों को सजा दिलाने के लिए सरकार के पास कोई नीति नही है. पशुपालन विभाग, गौ सेवा आयोग या गौशालाओं के संचालक एक—दूसरे पर जिम्मेदारी थोप देते हैं और खुद बच निकलते हैं.

सरकारी गौठान पशुओं के लिए कैदखाने जैसे
सड़कों पर आवारा पशुओं के लिए सरकार की जवाबदेही तो है ही साथ ही उन पशुओं के मालिक भी जिम्मेदार हैं। पशुओं के मालिक सिर्फ दुधारू गायों को ही चारा खिलाते हैं बाकि मवेशियों को चरने के लिए खुले में छोड़ देते हैं. चूँकि सड़कें थोड़ी साफ़ सुथरी होती हैं इसलिए मवेशी सड़क को ही गौठान बना लेते हैं। सरकार द्वारा जिन गौठानों का निर्माण कराया गया है वह मवेशियों के लिए कैदखाने जैसा है क्योकि वहां चारा पानी की व्यवस्था नहीं होती है। सड़क दुर्घटनाओं में मवेशियों की मृत्यु तो होती ही है साथ ही प्लास्टिक खाने से भी होती है।

गौ-हत्याओं पर किसने क्या दी सफाई
गौ सेवा आयोग
के रजिस्ट्रार कमलेश कुमार सोनी का कहना है कि गौ सेवा आयोग केवल आवांछित मवेशिओं को संरक्षण देती है. सड़कों पर आवारा मवेशियों के लिए आयोग की जिम्मेदारी नहीं है. आयोग सिर्फ पंजीकृत गौशालाओं को प्रक्रिया पूरी करने के बाद फंड दे सकती है. अभी वर्तमान में प्रदेश में कुल 111 गौशालाएं हैं जिसके लिए गौ सेवा आयोग जिम्मेदारी ले सकता है. इन गौशालाओं में केवल बेसहारा और आवांछित मवेशी जैसे बीमार या बूढ़े मवेशियों को रखा जाता है.

दूसरी ओर पशुपालन विभाग के संचालक डॉ प्रसन्ना का कहना है कि आवारा मवेशियों का उत्तरदायित्व नगर निगम और ग्राम पंचायतों का होता है. पशुपालन विभाग केवल उनकी सहायता कर सकते हैं पशुओं को पिंजरे में रखने के लिए. सड़क किनारे जो गौठान हैं, उनको प्राथमिकता दी जाती है और उन पर कार्यवाही की जातीं है. पशुपालन विभाग सड़कों पर आवारा मवेशियों की जिम्मेदारी नहीं ले सकता है.

बलरामपुर आदर्श गौसेवा एवं कल्याण संस्थान के संचालक समिति से आनंद चौबे ने कहा कि पंजीकृत गौशालाओं में क्षमता से अधिक मवेशियों को न रखने का आदेश है और आवारा मवेशियों की जिम्मेदारी हमारी नहीं है.

बिलासपुर कामधेनु गौशाला सेवा समिति से प्रमोद शर्मा का कहना है कि पहले से ही मौजूद मवेशियों के लिए ही चारा की व्यवस्था नहीं हो पाती है ऐसे में आवारा मवेशियों को रखना और उनका पालन करना संभव नहीं है. गौ सेवा आयोग की ओर से चारा प्रबंधन भी नियमित रूप से नहीं मिलता है.