अन्वन्त कौर की प्राकृतिक गुरुओं को समर्पित कविता

अन्वन्त कौर की प्राकृतिक गुरुओं को समर्पित कविता


प्रकृति के  ये पाँच  रूप

मानना निज जीवन में गुरु स्वरूप


हुआ जीवन इसी से शुरू

मनुष्य जन्म से पहले के गुरु

गति ,विकास का संकेत बताए

उसे छेड़ा तो कहर ढाए


         जल

जल रूपी निरन्तर प्रवाह रखना

नदी स्वरूप सभी बाधाएं पार करना

          

        वायु

 वायु जैसे शान्त रहना

सीमाओं में रहकर जीवन जीना

वायु सीमा तोड़े तो आंधी 

            बन जाए

इंसान सीमा तोडे़े तोे जीवन                    में प्रलय आ जाए।


        पृथ्वी

पृथ्वी से  धैर्य,दृढ़ता रखना

लक्ष्य, निर्णय पर अड़िग रहना

गुण, सफ़ल व्यक्तित्व का 

      स्थिर रहना 


       आग

   ऊर्जा का सही उपयोग करना

हर कार्य को धैर्य से करना

अति उत्साह से पीछे हटना


       आकाश  

आकाश सिखाए खुल कर उड़ना

कभी न तुम लक्ष्य से भटकना

आकाश जैसा जीवन विस्तृत करना

लक्ष्य कभी न विस्मृत करना


........ 


नाम- अनवन्त कौर

जन्म-12  सितम्बर

पेशा-शिक्षिका,बचेली

रुचि-  संगीत,कविता लिखना(सरल भाषा में कविताएं लिखना, जो लोगों को आसानी से समझ आ जाए)

पूर्व प्रकाशित कविताएं-पायनियर, नवभारत