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अर्थव्यवस्था की बहाली और पर्यावरण का संकट

अर्थव्यवस्था की बहाली और पर्यावरण का संकट

शिवप्रसाद जोशी

कोरोना संकट के बीच दीर्घ लॉकडाउन से अर्थव्यवस्था को हुए भारी नुकसान से उबरने के लिए भारत सरकार ने पिछले दिनों 20 लाख करोड़ रुपये का प्रोत्साहन पैकेज जारी किया था. इसमें निर्माण और कोयला आधारित इकाइयों पर अधिक निवेश पर जोर दिया गया था. ये ऐसे उद्योग हैं जहां निवेश का अर्थ है कार्बन उत्सर्जन को बढ़ावा देना. जानकारों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ अभियान को इस तरह के पैकेज और पीछे धकेलेंगे और दुनिया की हालत और अधिक चिंताजनक होती जाएगी. लेकिन भारत ये पैकेज न जारी करता, तो क्या उसके पास अन्य विकल्प थे, इस बारे में जानकारों की राय बंटी हुई है.  

अर्थव्यवस्था को गति देने वाले विशेष पैकेजों के जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन पर प्रभाव की छानबीन के लिए लंदन स्थित एक स्वतंत्र एजेंसी विविड इकोनमिक्स ने 17 देशों के विशेष पैकेजों का तुलनात्मक अध्ययन किया. हरित आर्थिकी के लिए परामर्श देने वाली इस एजेंसी की पिछले दिनों जारी रिपोर्ट के मुताबिक ‘ग्रीन स्टिमुलस इंडेक्स' यानी हरित प्रोत्साहन सूचकांक में अमेरिका, चीन और भारत समेत पांच देशों का प्रदर्शन सबसे खराब रहा है. अन्य दो देश दक्षिण अफ्रीका और मेक्सिको हैं. इन देशों में भारत का नंबर पांचवा है.

यूं तो भारत के प्रोत्साहन पैकेज का बड़ा हिस्सा पर्यावरणीय लिहाज से सुरक्षित उद्योगों के लिए है लेकिन जलवायु परिवर्तन के लिहाज से संवेदनशील अन्य उद्योगों के प्रति उसके आग्रह की वजह से उसे सूचकांक में अपेक्षित जगह नहीं मिल पाई है. वनीकरण के प्रस्तावित उपायों की बदौलत भारत ने कुछ ‘ग्रीन' अंक जरूर हासिल किए हैं लेकिन कोयला खदानों की कमर्शियल माइनिंग के समर्थन के उसके फैसले और उद्योगों के लिए जंगलों को साफ करने की धड़ाधड़ मंजूरियों के चलते उसे ऋणात्मक 60 ‘ब्राउन' अंक मिले हैं. खराब स्थितियों मे बसर कर रहे आदिवासी समुदायों के लिए हरित रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए रिपोर्ट में भारत के कदमों की सराहना भी की गई है क्योंकि इससे वन प्रबंधन, वन्यजीव संरक्षण और वनीकरण में भी मदद मिलती है.

विविड इकोनमिक्स की रिपोर्ट के मुताबिक 17 देशों के प्रोत्साहन पैकेज से उद्योग, ऊर्जा और यातायात सेक्टरों में करीब साढ़े तीन खरब डॉलर निवेश किए जाएंगें लेकिन अर्थव्यवस्था को गति देने वाले ऐसे उपाय पर्यावरण को बड़े पैमाने पर क्षति पहुंचा सकते हैं. इसीलिए बहुत से अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण और सामाजिक संगठनों ने देशों से अपील की है कि वे अपनी कोविडोत्तर आर्थिक रिकवरी के लिए प्रोत्साहन पैकेजों को पर्यावरणीय लिहाज से भी संवेदनशील, सुगम और सहज बनाएं. भारत को भी अपना हरित दायरा बढ़ाने के अभियान को नहीं छोड़ना चाहिए. कोविड पश्चात की रणनीतियों के लिए लाजिमी है कि उनकी ‘ग्रीन वैल्यू' बनी रहे.

रिपोर्ट में सुझाव दिए गए हैं कि कॉरपोरेट बेलआउट प्रस्तावों पर हरित कर लगना चाहिए. टिकाऊ कृषि में निवेश बढ़ाना चाहिए और हरित निवेशों के लिए ऋण व्यवस्था सुचारू करनी चाहिए. पर्यावरणीय चिंताओं को ध्यान में रखने वाले विकास कार्यों के शोध और विकास के लिए वित्तीय सहायता और सब्सिडी देने की सिफारिश भी की गई है. पर्यावरण से जुड़े नियमों और निर्देशों को लचीला करने के बजाय और मजबूत बनाने पर भी जोर दिया गया है. रिपोर्ट में प्रकट की गई चिंताएं नई नहीं हैं. इनका महत्त्व इस बात में है कि ये आर्थिक पैकेजों की सार्थकता के प्रश्न पर केंद्रित हैं.

पर्यावरणीय आंदोलनों से जुड़े हल्कों में ये चिंता बार बार प्रकट की जा रही है कि कोरोना संकट दरअसल जिस व्यापक सामाजिक संकट को रिफलेक्ट करता है, पर्यावरण उसका ही एक हिस्सा है. इसलिए आज की स्थिति में पर्यावरण को सुरक्षित बनाए रखना बड़े आघातों से बचने के लिए पुख्ता रणनीति का हिस्सा होना चाहिए.

कोविड संकट के बीच लॉकडाउन की लंबी अवधियों से पूरी दुनिया में कार्बन उत्सर्जन में गिरावट आई थी और दुनिया के सभी बड़े शहरों में प्रदूषणों के स्तरों में निर्णायक गिरावट देखी जाने लगी थी. यहां तक कहा गया कि वैश्विक बंदी ने ओजोन परत के छेद भी भर दिए थे. हालांकि विडंबना और विरोधाभास ये था कि मनुष्य जीवन पर संकट भी उतना ही भयावह हो चुका था. कोरोना ने अर्थव्यवस्थाओं को तहसनहस किया और आम लोगों की जिंदगियों को छिन्नभिन्न कर दिया. आज खुली आबोहवा और चमकदार आसमान के नीचे ये घाव साफ साफ दिखते हैं, यही कोरोना समय की सबसे बड़ी विडंबना है. 

प्रदूषकों के स्तरों में अभूतपूर्व गिरावटों ने आने वाले समय के लिए कुछ चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं. आंकड़े और वैश्विक संकटों का इतिहास बताता है कि जब जब अर्थव्यवस्था किसी बड़ी मुसीबत से उबरती है तो प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन की दर बढ़ने लगती है और धीर धीरे अपने पुरानी दरों से छलांग लगाती हुई नई खतरनाक ऊंचाइयां हासिल कर लेती है. ये दौर ऐसा ही है और जानकार इसीलिए इकोनमी को गति देने वाले पैकेजों को कुछ चिंता से देख रहे हैं.

इकोनमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली पत्रिका में बिट्स पिलानी की पीएचडी स्कॉलर पूनम मूलचंदानी ने पर्यावरणीय संकट और प्रोत्साहन पैकेजों के बीच अंतर्सबंधों की गहन पड़ताल की है. उनके अध्ययन के मुताबिक 1973 और 1979 के तेल संकट हो या 1991 में सोवियत संघ का विघटन या 1997 का एशियाई वित्तीय संकट या 2008 की वैश्विक मंदी- अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कीमत पर्यावरणीय कवच में दरार से चुकानी पड़ी है. और इसमें भी सबसे ज्यादा भुगतते हैं विकासशील देश और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं.

तमाम देश इस बारे में एकजुट रह पाएं, इसके लिए वैश्विक कोशिशें भी अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पा रही हैं. कोरोना की विकटता ने जलवायु सम्मेलनों को भी चोट पहुंचाई हैं. स्कॉटलैंड में इस साल नवंबर में होने वाला संयुक्त राष्ट्र का जलवायु परिवर्तन सम्मेलन अक्टूबर 2021 तक के लिए स्थगित कर दिया गया है. 2015 के पेरिस समझौते के बाद इस बैठक का विशेष महत्त्व होता लेकिन तारीख आगे बढ़ जाने का असर विश्व सरकारों की पर्यावरणीय संरक्षण से जुड़ी योजनाओं और अभियानों पर भी पड़ेगा, उन पर दबाव कम होगा. पर्यावरण के बारे में सोचने से ज्यादा अर्थव्यवस्था संभालने की कोशिशों को तवज्जो मिलेगी.

महामारी के बाद उपजे हालात से उत्सर्जनों में कटौती खुदबखुद होती चली जाएगी, ये सही धारणा नहीं है. एक बार अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए किए जा रहे उपाय युद्धस्तर पर शुरू होंगे तो पर्यावरण पर असर भी दिखने लगेगा. जलवायु परिवर्तन का संकट वैश्विक महामारी की भयावहता का ही एक आयाम है. दोनों को अलग कर देखना सही नहीं होगा. अगर हमारी प्रौद्योगिकीय परियोजनाएं हरित और साफ ऊर्जा आधारित नहीं रही तो संकट और सघन होगा. ऐसा न हो कि अर्थव्यवस्था तो चमक उठे लेकिन आबोहवा, आसपास और पर्यावरण और समूची जलवायु और अधिक धुंधली और दमघोंटू बन जाए. आर्थिक प्रोत्साहन पैकेजों के इस विकट असंतुलन को खत्म करने में ही सबकी भलाई है.