breaking news New

कृषि विभाग में सरकारी अफसरों का अजब खेल, 77.49 करोड़ के बीज 45.35 करोड़ में ही बेच दिए!

कृषि विभाग में सरकारी अफसरों का अजब खेल, 77.49 करोड़ के बीज 45.35 करोड़ में ही बेच दिए!
  • सीएजी की रिपोर्ट ने भी उठाए खरीदी प्रक्रिया पर सवाल!
    कृषि विभाग में सी वीड जेल और रसायन खरीदी में 18 करोड़ का गोलमाल
    दोषियों को सजा नही बल्कि प्रमोशन मिल गया!


रायपुर. कृषि विभाग में भ्रष्टाचार की सीलन एक बार उधड़ी तो परत—दर—परत कई मामले सामने आते जा रहे हैं. कल हमने खुलासा किया था कि कृषि विभाग में सी वीड जेल की खरीदी में किस तरह अफसरों ने गोलमाल करते हुए करोड़ों का वारा न्यारा किया. अब आगे जानिए कि किस तरह भ्रष्ट अफसरों ने ब्लैक लिस्टेड कंपनियों को खाद बीज क्रय करने का ठेका दिया जबकि कंपनियों ने कागजी कार्रवाई में काफी घालमेल किया. खुला खोल फर्रूखावादी इस कदर हुआ कि एक ही पते पर बीज बांटने वाली तीन कंपनियां थी और इसमें दो डायरेक्टर मुकेश जैन और मुकेश चौरड़िया के हस्ताक्षर एक से थे!

सीएजी की रिपोर्ट में तीनों ठेकेदारों का खुलासा करते हुए कहा गया है कि दो बोलीदाता यथा मेसर्स रॉयल सीडस एवं मेसर्स लौकिक सीडस के कार्यालयीन पते एक ही थे. इसके साथ ही मैसर्स अवनि ट्रेडर्स एवं रायल सीडस भी सहयोगी फर्म थी. इसके अलावा मुकेश चौरड़िया जोकि मेसर्स रायल सीडस का अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता था, ने मेसर्स अवनि ट्रेडर्स के घोषणा पत्र में साक्ष्य के रूप में मुकेश जैन के नाम से हस्ताक्षर किया था तथा जैन व चौरड़िया के हस्ताक्षर लगभग एक ही थे. कंपनी ने नवम्बर 2015 से मार्च 2017 तक 2.12 करोड़ का आलू बील खरीदा था.

सीएजी की रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि विपणन रणनीति के अभाव में धान सोयाबीन और गेहूं के बीज विक्रय में वास्तविक मूल्य 77.49 करोड़ के विरूद्ध 45.35 करोड़ में ही बेच दिया गया जिससे निगम को 32.14 करोड़ की हानि हुई. इस गड़बड़ी के खिलाफ महालेखाकार ने दोषियों पर कार्यवाही की अनुशंसा करते हुए कहा है कि जिला कार्यालयों द्वारा दर अनुबंधकारियों को क्रय आदेश पारदर्शी तरीके से देना चाहिए एवं जो कर्मचारी इस आदेश का पालन करने में विफल हुए हैं, उनके विरूद्ध उचित कार्यवाही की जाये.

महालेखाकार ने अपनी रिपोर्ट में उप—महाप्रबंधक बीज एवं प्रबंध संचालक के निर्णय पर सवाल उठाते हुए कहा कि सामग्री का परीक्षण किए बिना खराब गुणवत्ता के आधार पर दर अनुबंध प्रस्ताव—61 को अंतिमीकृत नही करने का उप महप्रबंधक बीज एवं प्रबंध संचालक का निर्णय न्यायोचित नही था. न्यूनतम प्रस्ताव को निरस्त करने के निर्णय एवं नई दर अनुबंध के अन्तिमीकरण न करने के कारण बीज आपूर्तिकर्ताओं को 1.08 करोड़ का अनुचित लाभ पहुंचाया गया.

दूसरी ओर कृषि विभाग में भी भंडार क्रय नियम के विपरीत 18 करोड़ के गड़बड़झाले की कहानी सामने आई है. आश्चर्य कि मामले की जांच भी बैठी मगर आज तक उसकी रिपोर्ट पेश नही हो सकी. दोहरा आश्चर्य यह कि करोड़ों का भ्रष्टाचार करने वाले अफसरों को सजा देने के बजाय उलटा मलाईदार पदों पर बिठा दिया गया है. आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार 2015—16 में विभाग के अधिकारियों ने भंडार क्रय नियम का उल्लंघन करते हुए 18 करोड़ की खरीदी की. इसके तहत एनएफएसएम, हरित क्रांति एवं आरकेवीवाय योजना में 50 प्रतिशत अनुदान पर सूक्ष्म तत्व—वीडीसाइड—कीटनाशक रसायन खरीदने के लिए फर्जीवाड़ा किया.

मामला खुला और अधिकारियों के नाम फंसने लगे तो तत्कालीन कृषि संचालक एम.एस. केरकेटटा ने उन्हें बचाते हुए फाइल दबा दी. आश्चर्य कि फिलहाल सुनील कुजूर जो मुख्य सचिव हैं, वे ही उस समय तत्कालीन अपर मुख्य सचिव थे. उन्होंने ही शो काज नोटिस जारी कर संचालक से जवाब भी मांगा मगर कोई जवाब नही मिला बल्कि उन्हें पदोन्नति मिल गई. उधर, कृषि विभाग के ओएसडी और संयुक्त संचालक विनोद वर्मा ने इंदिरा गांधी कृषि विश्वविदयालय के कुलसचिव को पत्र लिखकर जांच समिति बनाने की बात कही जबकि यह उनके अधिकार में नही था. इसके पीछे वर्मा की मंशा खुद को क्लीन चिट दिलाने की थी. बाद में जब मामला आगे बढ़ा तो कृषि उत्पादन आयुक्त केडीपी राव ने उन्हे कारण बताओ नोटिस जारी करने को कहा था. इस मामले में मंत्री ने स्वीकार किया था कि 13 करोड़ के घोटाले में 30 से ज्यादा अफसरों ने मिलजुलकर वारा—न्यारा किया.

इस मामले की जांच कर रहे अधिकारी अपर संचालक एबी आसना ने एक महीने के भीतर जांच पूरी करने को कहा है. जबकि वर्तमान संचालक टामन सोनवानी ने अपना पक्ष देने से इंकार कर दिया. स्पष्ट है कि शीर्ष अधिकारियों से लेकर निचले तक सब मामले को दबा रहे हैं और दोषियों को बचा भी रहे हैं.