77 साल पुरानी रेल्वे दुर्गा पूजा की टूटेेगी परंपरा, बंगाल की संस्कृति व परम्परा से लोग नहीं जुड़ पायेंगे

77 साल पुरानी रेल्वे दुर्गा पूजा की टूटेेगी परंपरा, बंगाल की संस्कृति व परम्परा से लोग नहीं जुड़ पायेंगे


राजनांदगांव। 77 साल बाद यह पहला मौका होगा जब बहुप्रतिक्षित रेल्वे दुर्गा उत्सव नहीं मनेगा। कोरोना काल के चलते रेल्वे दुर्गा पूजा उत्सव समिति ने वर्षो पुरानी दुर्गा उत्सव नहीं मनाने का फैसला लिया है।
राजनांदगांव जिले में प्रतिष्ठित रेल्वे दुर्गा पूजा के अवसर पर न तो बंगाल के कलाकारों द्वारा पूजा मंडप सजाया जायेगा और न ही कलकत्ता के मुर्तिकारों द्वारा बनाई गई आकर्षक प्रतिमा का लोग दर्शन कर पायेंगे। बंगाल की परम्परा व संस्कृति के अनुसार पूजा अवसर पर बजने वाले ताल वाद्य ढाक की ध्वनि भी इस बार कानों में सुनाई नहीं पड़ेगी।
समिति के सचिव अम्लेन्दु हाजरा ने बताया कि केवल कलश घट की पूजा विधि विधान मंत्रोचार के साथ करते हुए परम्परा को खण्डित नहीं किया जावेगा। इसके लिए शासन की अनुमति चाही गई है। किसी भी प्रकार का कोई संस्कृति कार्यक्रम भोग-प्रसाद वितरण आदि नहीं होगा। समिति ने वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए जनहित में यह फैसला लिया है। प्रतिवर्ष पूजा संबंधी व अन्य आवश्यक जानकारी पूजा आमंत्रण पत्र के माध्यम से लोगों को दी जाती है। वह इस बार नहीं दी जा रही है। केवल मोबाइल व इंटरनेट के माध्यम से लोग पूजा से जुड़ सकंेगे।
श्री हाजरा ने बताया कि इस पूजा को लेकर प्रदेश के बाहर व विभिन्न जिलों के भी लोग जुड़ते है और वर्ष भर इस पूजा उत्सव की प्रतीक्षा रहती है। चंूकि, लोग बंगाल की परम्परा व संस्कृति से जुड़ते है जिसके लिए लोगों में काफी उत्साह रहता है। इस वर्ष महिलाओं हों व बच्चों के मध्य मायुसी छाई है इस विषय पर शहर के बुद्धिजीवियों व गणमान्य लोगों के मध्य चर्चा है। समिति की ओर से यह भी बताया गया है कि शासन द्वारा जारी गाईड लाईन का पूरा पालन किया जावेगा तथा समिति की ओर से यह भी अपील की गई है कि इस बार लोग घरों में रहकर ही मातारानी की पूजा अर्चना करे।
श्री हाजरा ने आगे कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर जाने से अपने आप को रोकेए अत्यधिक आवश्यकता होने पर ही घर से बाहर निकले गणेश उत्सव में भी लोगों में मायुसी दिखी है। लोगों ने केवल परम्परा का निर्र्वहन कर पूजा अर्चना को खण्डित होने से बचाया है उसी प्रकार दुर्गा पूजा भी लोग घरों में रहकर ही करे और परंपरा को खंडित होने से रोके तथा बीमार व्यक्ति किसी भी प्रकार का कोई भी उपवास न रखें।