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भारत का 50वां अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह: भारतीय फिल्म उद्योग में पुरुष वर्चस्व बहुत ज्यादा है- तापसी पन्नू

भारत का 50वां अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह: भारतीय फिल्म उद्योग में पुरुष वर्चस्व बहुत ज्यादा है- तापसी पन्नू

अजित राय

गोवा, 24 नवंबर। सांड की आंख, मनमर्जियां, पिंक, बदला, मुल्क जैसी फिल्मों से चर्चा में आई अभिनेत्री तापसी पन्नू का कहना है कि भारतीय फिल्म उद्योग में पुरुष वर्चस्व बहुत ज्यादा है और स्त्रियों को बराबरी में आने में अभी बहुत वक्त लगेगा। तापसी पन्नू भारत के 50 वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में 'वुमन इन लीड' विषय पर संवाद में बोल रही थी।

उन्होंने कहा कि जैसे ही कोई स्त्री केंद्रित फिल्म बननी शुरू होती है, प्रोड्यूसर बजट कम कर देते हैं। कई बार तो बड़े फिल्म स्टार के पारिश्रमिक के आधे में ही ऐसी फिल्में बन जाती है। यह हालत तब तक नहीं बदलेगी जबतक बड़ी संख्या में स्त्रियां प्रोड्यूसर नही बनती। उन्होंने कहा कि उन्हें कई बार औरत होने के नाते इस भेदभाव का शिकार होना पड़ा है। कई बार तो निर्देशक की इच्छा के बावजूद प्रोड्यूसर के दबाव के कारण उन्हें फिल्म में नहीं लिया गया। कई तटस्थ और लिंग भेद से परे लिखी गई पटकथा पर बनने वाली फिल्म में उनकी जगह पुरुष कलाकार को ले लिया गया। उनका सपना है कि वे 'अवेंजर्स' जैसी फिल्मों में मुख्य भूमिका निभाएं जो अक्सर पुरुष निभाते हैं।

तापसी पन्नू ने कहा कि भारतीय मुख्य धारा के सिनेमा में पुरुष वर्चस्व के कारण ही हाल तक औरतों के लिए दो ही तरह की भूमिकाएं लिखी जाती थी- एक वैंप यानि चुड़ैल या बुरी औरत और दूसरी सीता माता टाइप औरत। मैंने 'बदला' और 'मनमर्जियां' में थोड़ी नकारात्मक भूमिकाएं निभाई पर लोगों ने पसंद किया। स्त्री केंद्रित फिल्म या तो अच्छी होती है या खराब। पर हमारे यहां पुरुष वर्चस्व वाली खराब फिल्में भी बाक्स आफिस पर अच्छा खासा कारोबार कर लेती है।

उन्होंने कहा कि फिल्म और अभिनय उनके लिए जीवन मरण का मामला नहीं है। यही जीवन का अंत नही है। यह जीवन का केवल एक हिस्सा है। मैं फिल्मे 'बन' के लिए, मजे के लिए करती हूं। जिस दिन लगेगा कि मुझे अभिनय में मजा नहीं आ रहा, मैं फिल्म छोड़ कर कोई दूसरा काम करूंगी। फिल्म में मेरा काम तभी सफल माना जाएगा जब दर्शक सिनेमाघरों से बाहर निकलने के बाद भी मुझे याद रखें। इसीलिए मेरे लिए फिल्म में छोटी और बड़ी भूमिका मायने नहीं रखती। सवाल यह होता है कि इसमें मेरे करने के लिए नया क्या है और क्या दर्शक मुझे याद रख पाएंगे।

उन्होंने कहा कि फिल्म इंडस्ट्री में कोई भी एक व्यक्ति न तो उनका गाड फादर है न मेंटर। हर वह निर्देशक जिसके साथ उन्होंने काम किया,  उनका मेंटर है, चाहे अनुराग कश्यप हों या नीरज पांडे या डेविड धवन हो या शूजित सरकार। 'सांड की आंख' फिल्म में अपनी उम्र से चालीस साल बड़ी औरत की भूमिका पर उन्होंने कहा कि उन्हें पटकथा बहुत पसंद आई और इसमें बहुत कुछ नया करने की गुंजाइश थी। मुझे याद है कि जब मैं इस फिल्म से जुड़े लोगों से मिलने गई तो एक कमरे में बारह लोग थे और सभी मुझे समझा रहे थे कि यह फिल्म मुझे जरूर करनी चाहिए। दूसरी मुख्य भूमिका के लिए भूमि पेडणेकर को खोजने में दो साल लग गए। 

उन्होंने कहा कि वे दक्षिण भारतीय सिनेमा की शुक्रगुजार हैं क्योंकि उनकी पहली फिल्म तमिल में बनी और खूब चली। दक्षिण भारत की फिल्मों ने मुझे सिनेमा सिखाया, मुझे अभिनेत्री बनाया। मैंने सपने में भी नहीं सोचा कि दक्षिण भारतीय फिल्मों का सीढ़ी की तरह बालीवुड में जाने के लिए इस्तेमाल करूंगी। आज भी मुझे जब कोई अच्छा आफर दक्षिण भारत से आएगा तो मुझे खुशी होगी।

उन्होंने कहा कि वे फिनीक्स पक्षी की तरह अपनी ही राख से बार बार जीवित होने की कला सीख गई है। एक वह भी दौर था कि जब तीन चार तेलुगू फिल्में असफल हुई तो मैं हैदराबाद में अकेली पड़ गई। प्रोड्यूसरों के दबाव में कोई निर्देशक चाहकर भी मुझे अपनी फिल्म में लेने को तैयार नहीं था। फिर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी कर्मों कि सिनेमा मेरे लिए जीवन का अंत नही है।

तापसी पन्नू ने कहा कि वे एक दोस्त के रूप में अनुराग कश्यप को बेहद प्यार करती है हालांकि उनकी कई फिल्मों से घोर असहमति है। उन्होंने अनुराग कश्यप की अधिकतर फिल्में देखी ही नहीं है और वे उनकी फिल्मों की फैन कभी नहीं रही। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वे अनुराग कश्यप की फिल्म में काम करेंगी। पर पहली मुलाकात में ही उन्हें लगा कि ऐसा इंसान मिलना दुर्लभ है।

उन्होंने कहा कि 'मनमर्जियां' में जैसी भूमिका निभाई है, असल जिंदगी में वैसा न तो वे खुद करेंगी और न ही किसी को वैसा करने की सलाह देंगी। यह फिल्म कई औरतों की जिंदगी की सच्ची घटनाओं पर आधारित है। यह भूमिका बहुत मुश्किल थी पर काम कर गई। कई आंटियों ने कहा कि फिल्म में मैंने गलत किया। मैंने उन्हें समझाया कि हम कोई पाठ्य पुस्तक नहीं बना रहे हैं न ही कोई शिक्षा पर फिल्म बनाने जा रहे हैं। यह तो अनुराग कश्यप की फिल्म है।

उन्होंने कहा कि उनके फिल्मी कैरियर में दो बार ऐसा हुआ कि मैं भावुक हो गईं। वे मेरे जीवन के यादगार क्षण थे। 'पिंक' में कोर्ट के एक दृश्य में अपना बयान देकर गवाहों के कटघरे से बाहर निकली तो इतनी भावुक हो गईं कि संभल नहीं पाई और अमिताभ बच्चन साहब ने गले लगाकर सांत्वना दी। दूसरी घटना 'मुल्क' फिल्म के अंतिम दृश्य की है। कोर्ट में  दो पेज का अपना आखिरी वक्तव्य बिना किसी टेक के पूरा किया तो दर्शकों में से एक सज्जन आए और एक कागज पर लिखकर मुझे दिया कि एक दिन मैं भारतीय सिनेमा की सबसे अच्छी अभिनेत्री बनूंगी। मैंने उनके साथ फोटो खिंचवाने को कहा तो उन्होंने इनकार कर दिया। वह कागज आज भी मैंने संभाल कर रखा है।