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कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की दो कविताएं

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की दो कविताएं


देखा, मैंने देखा


उच्छल जलधि तरंगा देखा

द्राविड़, उत्कल, बंगा देखा

जीवन रंग-बिरंगा देखा

कितना संग-कुसंगा देखा

तन को अंग-अनंगा देखा

कितना नंग-धड़ंगा देखा

अड़ता हुआ अड़ंगा देखा

भिड़ता भीड़-भड़ंगा देखा

बे-रँग बीच सु-रंगा देखा

बढ़ता बात-बतंगा देखा

जलता हुआ पतंगा देखा

जग को डसे भुजंगा देखा

कोई हाथ से तंगा देखा

भारी मन से चंगा देखा

गली-गली भिखमंगा देखा

बिल्ला देखा, रंगा देखा

दो देशों का पंगा देखा

लोकतंत्र बदरंगा देखा

पास-पड़ौसी दंगा देखा

लोगों को बेढंगा देखा

नेताओं को जब भी देखा

नंगा देखा

हाय रे हाय मैंने देखा


मचान पर चढ़ा यह कौन है?



अनहोनी वर्षा से अपने आप

ठूठों पर पीक उठीं कोंपलों को

किसकी उपलधि कहें?


उग आया माटी के ढेरों पर

अपने आप धतूरा

फल आया है उसका

जैसे कोरोना विषाणु की काया 

यह किसकी उपलब्धि?

महाकाल को अर्पित


दरकती दीवारों में अपने आप

पीक उठे पीपल को

किसकी उपलब्धि कहें?

पूरा मकान ही ढह जायेगा


सूने दरबारों में

अपने ही जाले पर

रेंग रही मकड़ी की सत्ता

अपने आप बस गये चमगादड़

उल्लुओं की आँखों में

चमक रही किसकी उपलब्धि?


बंजर धरती पर लाचार

तिनके जैसा जीवन


वीरान वनों में खड़े रह गये

खाली मचान पर चढ़कर

यह कौन है

जो अपनी आवाज़ गुँजाकर

खुद ही उसकी प्रतिध्वनि सुनकर

फूला नहीं समा रहा है?


क्या कोई गीत रचा है उसने

पता नहीं क्या गा रहा है?