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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र का कॉलम : हम आदमी कहां, हम तो झुनझुने हैं..! छत्तीसगढ़ की अफसरशाही पर नेताओं के बोलवचन

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र का कॉलम : हम आदमी कहां, हम तो झुनझुने हैं..! छत्तीसगढ़ की अफसरशाही पर नेताओं के बोलवचन

संदर्भ : छत्तीसगढ़ की अफसरशाही पर नेताओं के बोलवचन


सुभाष मिश्र

राज्य की अफसरशाही के खिलाफ आए ताजा—ताजा दो बयानों ने एक नई बहस छेड़ दी है. सरकार के एक मंत्री और कांग्रेस विधायक ने अपने सार्वजनिक बयान में ब्यूरोक्रेसी पर नकेल कसने की बात कही है. चंद रोज पहले मंत्री कवासी लखमा का विवादास्पद बयान आया था कि बड़ा नेता बनना है तो डीएम-एसपी की कॉलर पकड़ो. यह मानो कुछ कम था इसलिए नहला पर दहला मारते हुए कांग्रेस के विधायक बृहस्पति सिंह ने कल बलरामपुर के राशन कार्ड वितरण कार्यक्रम में उदबोधन देते हुए कहा कि अगर बैंक का कोई भी अफसर किसानों को झूठे लोन की वसूली के नाम पर तंग करता है तो उसे जूता मारना पड़े तो मारिए और जेल में डालिए.

राज्य बनने के बाद से ही अफसरशाही ऐसे बयानों को सुनने और बेइज्जत होने को विवश है. सरकार को अपने कामों की समीक्षा के लिए अफसरों पर निगरानी कर सतत समीक्षा करते रहना चाहिए. और उन्हे सौंपी गई जिम्मेदारी और परिणाम देने का समय तय होना चाहिए, और उनसे हिसाब मांगते रहना चाहिए लेकिन वह अपमानजनक ढंग से ना हो. योजनाएं बनाना सरकार का काम है और इम्पलीमेंट करवाना अफसरशाही का. यदि वह ईमानदारी से अपना काम ना करती तो क्या राज्य के विकास की इतनी गौरवशाली तस्वीर बन सकती थी!

सबसे बेहतर नजीर पेश की थी हमारे मुखिया मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने. जब वे मुख्यमंत्री बने तो आइएएसों की बैठक में साफ कर दिया था कि हम बदले की भावना से काम नही करेंगे. उनके इस सहदृयशील बयान का स्वागत इसलिए हुआ था कि सालों तक वे ब्यूरोक्रेसी से जूझते रहे और जब सरकार बनी तो बिगड़ैल अफसरों को सुधरने का पूरा मौका उन्होंने दिया. बेहतर होता कि यही उदार दृष्टि कांग्रेस पार्टी के नेता नेता और सरकार के मंत्री भी रखते. सरकार बने मात्र आठ महीने हुआ है लेकिन ऐसे कई मामले सामने आ गए हैं जब अफसरशाही शर्मसार हुई हो. राजनांदगांव के एक छुटभैए नेता का आडियो वायरल हुआ था जिसमें वह ट्रांसफर के लिए अफसर को धमकाते नजर आया था. अभी बस्तर में मुख्यमंत्री की सभा में जाने को लेकर कर्मा के बेटे और बस्तर आईजी के बीच तूतू—मैंमैं हो गई थी.

सरकारी मशीनरी को बेइज़्ज़त करने में कोई पार्टी किसी से कम नही पर जब दूसरे के शासनकाल मे ये सब हो तो वे राज्य में आज जो भाजपा कांग्रेस घड़ियाली आंसू बहाते दिखते हैं ।पिछले 15 सालों के भाजपा राज में कितने अफसरों के साथ गाली गलौच की गई थी और उन्हें बेइज्जत होना पड़ा था. बिलासपुर में पदस्थ एक डिप्टी कलेक्टर को मंत्री स्तर के नेता ने तमाचा जड़ दिया था. कोरबा में एक आइएएस अफसर को एक मंत्री ने सबके सामने बेइज्जत किया था जिसका वीडियो यू टयूब में खासा वायरल हुआ था. प्रधानमंत्री के सामने आइएएस अमित कटारिया सिर्फ चश्मा लगाकर खड़े हो गए थे तो सरकार ने भृकुटि टेढ़ी कर ली थी. इसके अलावा दर्जनों ऐसी घटनाएं हुईं जिससे भाजपा के नेताओं की चाल—चरित्र—चेहरा पता चल गया था.

सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों की कॉलर पकड़ने, जूते मारने या किसी पार्टी का एजेंड बताकर सार्वजनिक मंचों से गरियाने से ना तो क्रेडिबल छत्तीसगढ़ बनेगा और ना ही राज्य का वर्क कल्चर सुधरेगा. उल्टे पूरे राज्य में अफसरशाही के बीच एक नकारात्मक वातावरण निर्मित होगा जो यहां के शासकीय तंत्र का मनोबल ही गिरायेगा. अभी दो दिन पहले ही माना विमानतल पर भाजपा के विधायक द्वारा महिला एयर होस्टेस के साथ अभद्र व्यवहार की खबरें समाचारों में सुर्खियों में हैं. आये दिन इसी तरह हमारे नेताओं के उलजलूल बयान आते रहते हैं.

मशहूर शायर दुष्यंतकुमार के दो शेर यहां मौजू जान पड़ते हैं :
कैसे कैसे मंजर आने लगे हैं, गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं,
वो सलीबों के करीब आए तो हमको कायदे कानून समझाने लगे हैं.

उनका एक और शेर है :
जैसा जी चाहे बजाओ इस सभा में,
हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं...

बलरामपुर में विधायक द्वारा दिया गये बयान के दौरान मंच पर मंत्री सहित कलेक्टर—एसपी भी उपस्थित थे. जिले की कमान जिन अधिकारियों के हाथ में है, उनकी मौजूदगी में उस तरह की बयानबाज़ी चौंकाती है. यह बयान मैदानी क्षेत्र में काम करने वाले शासकीय सेवकों के मनोबल को गिराने वाला है. क्या जिस तरह का सिविल सेवा आचरण नियम शासकीय सेवकों के लिए है, उस तरह का कोई आचरण नियम पार्टियाँ, सरकार जनप्रतिनिधियों के लिए भी बनायेगी.

बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता संजय श्रीवास्तव ने ठीक कहा है कि इस तरह का बयान देना कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय चरित्र को उजागर करता है. कांग्रेस पार्टी सत्ता के नशे में मदहोशी के आलम में है इसलिए कुछ भी बयानबाजी करने से बाज नहीं आ रहे हैं. उन्होंने कहा कि इस पर कांग्रेस पार्टी को संज्ञान में लेकर माफ़ी मांगनी चाहिए. ऐसे ही कुछ बयान कांग्रेस प्रवक्ताओं ने भाजपा के 15 साल में हुई घटनाओं को लेकर दिये थे. केवल बयानबाज़ी से ये दृश्य नही बदलने वाला है.इसके लिए पूरी कार्यसंस्कृति बदलने की ज़रूरत है ।

आम जनता जब भारी मतों से किसी पार्टी की सरकार को चुनकर लाती है तो उससे बहुत सारी अपेक्षाएं होती है. यह उम्मीद करती है सरकार आने के बाद उसकी अपेक्षाएं विशेष कर सरकार द्वारा जारी चुनाव घोषणाओं में किए गए वादे पूरे होंगे। सरकारें भी बनने के बाद सबसे पहले अधिकारियों की बैठक लेकर अपने चुनाव घोषणा पत्र के एजेंडे को लागू करना चाहती है। ब्यूरोक्रेसी उसे वित्तीय स्थिति के साथ नियम प्रक्रिया की जानकारी देती है दबंदग नेतृत्व ब्यूरोक्रेसी की उतनी ही सलाह मानती है जितनी जरूरी है। जन अपेक्षाओं के अनुरूप सरकार के मुखिया निर्णय लेते हैं। हमारे राज्य छत्तीसगढ़ में भी ऐसा ही कुछ हुआ, किंतु पार्टी की ओर से जो जन प्रतिनिधि चुनकर आते हैं उनकी भी बहुत सारी अपेक्षाएं अपनी सरकार और अपने साथियों से होती है। विशेषकर तबादला पोस्टिंग में हमारे जनप्रतिनिधियों की ज्यादा ही रूचि होती है और जब उनकी अपेक्षा पूरी नहीं होती तब उनका गुस्सा पार्टी फोरम पर कम अधिकारियों पर ज्यादा निकलता है। उन्हें लगता है कि अधिकारी तो हमारे हाथों की कठपुतली है हम उन्हें तबादला पोस्टिंग निलंबन आदि का भय दिखाकर किसी भी स्तर पर डरा धमका सकते हैं अपमानित कर सकते हैं।

तस्वीर का दूसरा पक्ष यह भी है कि बहुत से अधिकारी कर्मचारी अपने व्यक्तिगत लाभ के लिये अपनी शासकीय मर्यादाओं को दरकिनार कर मंत्रियों, विधायकों और महत्वपूर्ण पदों, लाभ और पॉवर के पदों पर बैठे लोगों के इर्दगिर्द चक्कर लगाकर अपनी जगह बना लेते हैंं. ऐसे लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सरकार किसकी है. वे अपने तिकड़मबाजी विभाग को कथित रूप से चलाने के लिए अपनी कार्यशैली, अपनी वसूली क्षमता अधिकमत लाभ दिलाने के आश्वासन के साथ सत्ता प्रतिष्ठानों में काबिज हो जाते हैंं. ऐसे लोगों को देखकर ईमानदारी से कार्य करने वाले ब्यूरोक्रेसी से जुड़े लोग अचंभित भी होते हैं और मजबूरी में इनसे अपने संबंध बनाए रखने पड़ते हैं.

किसी भी राज्य में देश में जिस पार्टी की सरकार होती है, सरकारी लोगों को उसकी मंशा और एंजेडे के अनुसार निर्धारित प्रकिया, नियम क़ानून से काम करना होता है। सत्तापक्ष से जुड़े लोग चाहते हैं कि ब्यूरोक्रेसी सारे नियम क़ानून को ताक पर रखकर प्राथमिकता के आधार पर उनके काम करे. बहुत से अधिकारी लाभ के पद पर बने रहने के लिए पार्टी एंजेडे के रूप में अपने पद की सारी गरिमा को बलायताक रखकर ऐसा करते भी हैं और बाद में सत्ता परिवर्तन पर उनमें से कुछ फँसते हैं, बाक़ी तुंरत गिरगिट की तरह अपना रंग बदलकर जिसकी सत्ता होती है, उसके रंग में रंगकर लाभ हानि के खेल में शमिल हो जाते हैं. ऐसे लोगों के कारण आम नागरिक ये समझ नही पाते कि सरकार बदलने से क्या कुछ बदला है और जब कोई रैली जुलूस निकलता है तो अनायास उसके मुंह से ये नारा निकल पड़ता है कि ना गगन बदला है ना चमन बदला है : ये मुंर्दे वहीं हैं सिर्फ कफन बदला है


( लेखक आज की जनधारा दैनिक समाचार-पत्र तथा एकेजे न्यूज वेब मीडिया हाउस के प्रधान-संपादक हैं)