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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -मनुष्य के रोबोट में तब्दील होने का समय

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -मनुष्य के रोबोट में तब्दील होने का समय

अकेले चाइना के एप ही नहीं, बहुत कुछ है, जो हमें धीरे-धीरे वर्चुअल दुनिया में जीने का आदी बना रहा है। भारत सरकार ने चीन के 59 एप को प्रतिबंधित किया है जिनमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय एप टिकटॉक, वी चेट, शेयरइट, हेलो, लाइकी, क्लीन मास्टर, केम स्केनर, यूसी ब्लाऊजर, क्यू क्यू म्युजिक, मेल मास्टर शामिल है। एक और एप पब्जी जो कोरियन कंपनी वह भी हमारे देश में बहुत लोकप्रिय है। अधिकांश बच्चे, बड़े देर रात तक पब्जी खेलने में मशगुल रहते हैं। कोरोना संक्रमण काल में पूरे लॉकडाउन के दौरान लोगों ने खूब टिकटॉक बनाया। सोशल डिस्टेंसिंग की सीख को लोगों ने बहुत पहले से अपनी जीवनचर्या का हिस्सा बना लिया है। अपने काम से काम बाकी से क्या काम, का सूत्र जीवन सूत्र बन गया है।

अब लिखना भी कम हो रहा है। यदि लिखना भी है तो वह भी गूगल हिन्दी एप के जरिये बोलकर लिखा जा सकता है।
हम जिस समय में जी रहे हैं उससे हमारी सोच धीरे-धीरे आत्मकेन्द्रित होती जा रही है। मनुष्य को रोबोट या भक्त में तब्दील करने वाले इस समय में हमें कोई भी घटना, हत्या, समुदाय में उपजा दुख, तकलीफ, लाचारी की घटनाएं हमारी संवेदना को उद्वेलित नहीं करती, हम मूकदर्शक बने रहते हैं।

दरअसल यह पढऩे का नहीं, देखने का समय है। स्मृति फीड हो गई है मोबाइल में, इलेक्ट्रॉनिक डायरी में, ई-मेल बॉक्स में। चाहे फोन नंबर हो, मोबाइल नंबर हो, घर के पते हों या कोई महत्वपूर्ण तिथि , स्मृति से सभी विस्मृत है। यदि घर में धार्मिक पंचांग, कैलेंडर न हो तो बहुतों को तीज-त्यौहार भी याद न रहे। जब भी किसी का फोन आता है, मोबाइल आता है तो तुरंत दूसरे नंबर के लिए डिजिटल डायरी फोनबुक में झांकना पड़ता है।

मुझे याद आती है अपनी मां, दादी और उन जैसे बहुत से बुजुर्गों की, जो पढ़े-लिखे तो नहीं थे, किंतु उन्हें बहुत सी कहावतें, तिथियां , रीति रिवाज और कहानियां, दोहे, चौपाई सभी कुछ याद थे। बात -बात पर कोई न कोई कहावत, मुहावरा, संस्मरण जैसे उनकी दिनचर्या थी। वाचिक परंपरा के चलते यह सब पीढ़ी-पीढ़ी चलता रहा। मुद्रित शब्दों का जैसे-जैसे प्रभाव बढ़ा, वाचिक परंपरा वैसे-वैसे लुप्त होने लगी, खासकर दृश्य माध्यम के आने के बाद तो जैसे हम लगभग सुनना भूल गए, केवल देखने लगे। टी.वी. चैनलों के आने के बाद से हमारी कल्पना, देखने की प्रवृत्ति लगभग समाप्त सी हो गई। जो फ्रेम टी.वी. के चैनल ने दिखाया, वही फ्रेम हमने अपनी स्मृति में फीड कर लिया। देश में तेजी से बढ़े मध्यवर्ग और निम्न मध्य वर्ग ने, जो कभी वाचिक परंपरा में पला-बढ़ा था, उसने इसे अनजाने में ही विस्मृत कर दिया। हकीकत यह है कि हमारे पास आज जो भाषा है, वह हमने बोलकर पाई है, न कि लिखकर। वाक्य को बोलने से जो संगीत बनता है, वह लिखते समय नहीं बनता। अब लिखना भी कम हो रहा है। यदि लिखना भी है तो वह भी मोबाईल एप के जरिये बोलकर लिखा जा सकता है।

बच्चे स्मृति पटल पर चीजों को अंकित करने की बजाय केवल रटने लगे हंै। रटने में कल्पना का कतई समावेश नहीं रहता। औसत आदमी की स्मृति उम्र से पहले क्षीण होने लगी है। उसे हर बात के लिए डायरी, कैलेंडर, इलेक्ट्रॉनिक चीजों की दरकार है या फिर मेमोरी प्लस की शरण में बच्चे स्मृतिपटल पर चीजों को अंकित करने की बजाय केवल रटने लगे हैं। दृश्य धीरे-धीरे स्मृति से विस्मृत हो रहे हैं, रिश्तों का संसार सिमटता जा रहा है। दुनिया छोटी होने के साथ-साथ ही स्मृति का पटल, उसकी छवियां भी सीमित और छोटी होने लगी हैं। यांत्रिक होते मनुष्य की स्मृति में मैं और मेरा निजी संसार उपस्थित है। इलेक्ट्रानिक उपकरणों के दृश्य अब एक लत है।

गजानन माधव मुक्तिबोध ने 'एक साहित्यिक की डायरीÓ नामक अपने निबंध में जिन तीन क्षणों की बात की है, उनमें पहला अनुभव का है, जिसके बिना आवेग और गति असंभव है। मानसिक प्रक्रिया को आत्माभिव्यक्ति की ओर ले जाने के लिए आवश्यक पहला जबरदस्त धक्का यह प्रथम क्षण ही देता है । वह उस गति की दिशा को निर्धारित करता है  दूसरा क्षण फैंटेसी का होता है और तीसरे क्षण में फैंटेसी साहित्यिक कलात्मक अभिव्यक्ति का रूप धारण करने लगती है और सृजन प्रक्रिया जोरों से गतिमान होती है। मुक्तिबोध के अनुसार, भाषा सामाजिक निधि है। शब्द के पीछे एक अर्थ-परंपरा है। ये अर्थ जीवनानुभवों से जुड़े हुए हैं। आज जब सारी चीजें रेडीमेड उपलब्ध है, जीवन अनुभव का एक रचा हुआ पूरा नकली संसार उपस्थित हो, तो फिर सार्वजनिक-सामाजिक अनुभवों की परंपरा का विलुप्त होना स्वाभाविक है। बाजार में उपलब्ध मनोरंजन के सभी इलेक्ट्रॉनिक साधनों, कार्यक्रमों से मानवीय संवेदनशीलता अनुपस्थित है। टी.वी. पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों के कारण त्वरित आक्रामकता वर्तमान समाज की मानसिक जरूरत बन गई है। किसी का जीवन समाप्त हो रहा है, किसी का घर उजड़ रहा है, इसका दु:ख किसी को महसूस नहीं होता। टी.वी. पर इस तरह की घटनाओं को लोग फिक्शन के रूप में देखते हैं। टी.वी. चैनल पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम सोचने या विचार करने की जरूरत महसूस नहीं होने देते। यही कारण है कि अब लोगों ने धीरे-धीरे सोचना छोड़ दिया है। उन्हें कोई भी बड़ी घटना उद्वेलित नहीं करती। एक्सीडेंट , नरसंहार , दंगा सभी कुछ मनोरंजक कार्यक्रम की शक्ल में टी.वी. पर उपस्थित है। वह बेडरूम में लेटा हुआ या डायनिंग टेबल पर खाना खाते हुए दंगों के दृश्यों को बिना किसी भावात्मक विचलन के देखता है। न्यूज चैनल को लोग सिनेमा की तरह देखते हैं। सिनेमा देखते समय तो दर्शक यह मानकर चलता है कि जो कुछ दिखाया जा रहा है, वह नाटकीय है, किंतु न्यूज चैनल देखते हुए उसे यह भ्रम बराबर बना रहता है कि वह यथार्थ को अपनी आँख से देख रहा है! जबकि न्यूज चैनल पर दिखाया जाने वाला यथार्थ भी लोगों के मनोरंजन के लिए होता है। टी.वी. का रिमोट कहीं दूसरे चैनल की तलाश में न दब जाए, इस आशंका से कार्यक्रम बनाने वाले कम से कम समय में दस- दस खबरें दिखा रहे हैं। एक घंटे में सिक्सटी-60 खबरों के साथ यह भी हिदायत दी जाती है कि बैठे रहिए, जाइएगा नहीं, हम लौटते हैं ब्रेक के बाद, बहुत सी नई खबरों के साथ।

मनोरंजन के मकडज़ाल में फंसे दर्शक से अनायास उपभोक्ता बने आदमी को बाजार में उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, नई-नई तकनीक और बाजार के मायावी संसार ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। ज्ञान और संवेदना के स्तर पर मनुष्य को रोबोट में बदलने का उपक्रम तेजी से जारी है। बाजार की चकाचौंध, तेजी से भागती जिंदगी और टी.वी. के रंगीन और इंटरनेट के खुशनुमा संसार के बीच मनुष्य अपनी स्मृतियों से विमुख होता जा रहा है। अपने निजी कक्ष में पहुँचते ही उसके सामने एक ऐसा स्क्रीन उपस्थित है जो उसे उसके मनचाहे, अतृप्त संसार में ले जा सकता है। इंटरनेट पर बैठकर वह अपनी वास्तविक पहचान छिपाकर किसी से भी अपने मन की बात, अपनी कभी न व्यक्त हो सकने वाली इच्छाओं का बयान कर सकता है। टी.वी. के रूपहले रंगीन परदे पर वह उन तस्वीरों को इत्मीनान से देख सकता है, जिन्हें सार्वजनिक रूप से देखने पर प्रतिबंध है। अपने अवचेतन में असंख्य स्मृतियों को संजोने वाले मनुष्य का संसार अब धीरे-धीरे सीमित होता जा रहा है। ओपन मार्केट के इस दौर में बाकी सब तो खुला-खुला है,  केवल यदि कुछ बंद हैं तो वे हैं स्मृतियों, संवेदनाओं के दरवाजे!