breaking news New

मुक्तिबोध को जल्दबाजी में नहीं पढ़ा जा सकता: सूरज पालीवाल

मुक्तिबोध को जल्दबाजी में नहीं पढ़ा जा सकता: सूरज पालीवाल


रायपुर। मुक्तिबोध की कहानियों पर बोलते हुए देश के वरिष्ठ आलोचक सूरज पालीवाल ने कहा कि जिस तरह शास्त्रीय संगीत का बड़ा उस्ताद किसी राग को धीरे से उठाता है और धीरे-धीरे उसे अंतिम ऊंचाईयों तक ले जाता है। मुक्तिबोध की कहानियां भी उसी तरह की है। मुक्तिबोध अपनी कहानी में पाठक को घुमाते हैं और खुद भी घुमते हैं और पाठक की उत्सुकता बनी रही है ये उनकी किस्सागोई का नमुना है। मुक्तिबोध को जल्दबाजी में नहीं पढ़ा जा सकता। मुक्तिबोध के यहां हर शब्द का महत्व है।
रायपुर के वृंदावन हाल में मुक्तिबोध परिवार की ओर से उनकी पुण्यतिथि में आयोजित 11वें व्याख्यान माला में सूरज पालीवाल ने दीमक के व्यापारियों के विरुद्ध प्रति संसार रचती मुक्तिबोध की कहानियां विषय पर बोलते हुए कहा कि  मुक्तिबोध की की अथारिटी को मानते हैं हमारी पीढ़ी ने उनके साहित्य, उनके जीवन की सच्चाई और उनसे निर्भिक होकर चलना भी सीखा है।  मुक्तिबोध परिणाम की चिंता नहीं करते थे। हम दुनियादार लोग तुरंत समझौता कर लेते हैं हमें मुक्तिबोध का साहित्य अच्छा लगता पर हम उसके संघर्ष से बचना चाहते हैं। मुक्तिबोध के पत्र का संदर्भ देते हुए श्री सूरज पालीवाल ने कहा कि मुक्तिबोध अपने से विपरीत विचारधारा के लोगों के गरिमा का ध्यान भी रखते थे। धर्मवीर भारती के संदर्भ में लिखे गए पत्र का उल्लेख किया। उन्होंने श्रीकांत वर्मा और मुक्तिबोध के बीच हुए पत्राचार का भी जिक्र किया।
मुक्तिबोध की कहानी पक्षी और दीमक की चर्चा करते हुए कहा कि यह कहानी जितनी साधारण है उतनी ही आसाधारण है यह कहानी पहले तो श्यामला के संबंध और सामाजिक संबंधों की बात करते दिखती है किंतु बाद में इस कहानी में भगवा वस्त्रधारी कार्यालय में ली जाने वाली रिश्वत और व्यापारी का जो वार्तालाप है वह कहानी को असाधारण बनाता है। दीमक का बड़ा व्यापारी पक्षी को दीमक को खाने का आदी बनाता है। पक्षी अपने पंखों की ताकत को जानता है। पंखों से आकाश छूने को भी जानता है किंतु व्यापारी के धोखे में आकर दीमक खाने का आदी बन जाता है और वह अपने पंख खो बैठता है। यह कहानी प्रतिकात्मक है जिसमें हम अपने समय के  साथ भी जोड़कर देख रहे हैं। हमारे देश के बड़े व्यापारी हमारे युवकों की ऐसी ही चीजों के प्रति आकर्षण पैदा कर रहे हैं जो खतरनाक है। वे हमारे सपनों को मारकर हमारे पीढ़ी को खत्म करना चाहते हैं। श्री सूरज पालीवाल ने इधर के दिनों हुई घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि देश भयंकर मंदी की दौर से गुजर रहा है और दूसरी ओर रूस जैसे देश को करोड़ों रूपए सहायता देने की बात कही जा रही है यह भ्रम की स्थिति है। युवाओं को बताया जा रहा है कि देश में रोजगार है विदेशों भी रोजगार के सब्जबाग दिखाए जा रहे हैं। हमारे यहां कहा जाता है कि बच्चे बुढ़ापे की लाठी होते हैं लेकिन लाठी विदेश में है। चंद्रयान-2 की असफलता पर खडिय़ाली आंसू बहाए जाने की घटना का जिक्र करते हुए उन्होने कहा कि विज्ञान के क्षेत्र में हर बार नए प्रयोग होते है हर बार प्रयोग सफल नहीं होते। वैज्ञानिक ऐसे प्रयोगों से सबक लेकर नए प्रयोग करते हैं। उन्होंने मुक्तिबोध की इस शब्दावली से वार शब्द लेते हुए कहा कि आज अभिनदन को वार हीरों की तरह विमान उड़ाते हुए ऐसे दिखाया जा रहा है कि पाकिस्तान को खत्म कर देगा यह सब जानबूझ कर किया जा रहा ताकि लोग उन बातों की चर्चा नहीं करे जिनपर चर्चा जरूरी है। हम सब जानते हैं कि बिना अमेरिका के कोई युद्ध नहीं होगा पर हमारे मीडिया के जरिए हमें भ्रमित किया जा रहा है। 
श्री पालीवाल ने मुक्तिबोध की पत्नी शांता ताई के लिखे जाने का आग्रह किया। कार्यक्रम के प्रारंभ में मुक्तिबोध के पुत्र रमेश मुक्तिबोध और दीवाकर मुक्तिबोध ने अतिथियों का स्वागत किया। रमेश अनुपम ने कार्यक्रम का संचालन किया और अरुण काठोटे ने धन्यवाद ज्ञापित किया।