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नाटक के अर्थशास्त्र पर सार्थक विमर्श

नाटक के अर्थशास्त्र पर सार्थक विमर्श

रायपुर, 3 अक्टूबर। कौटिल्य के अर्थशास्त्र से भी ज़्यादा जटिल है नाटक का अर्थशास्त्र । नाटक की इकानामी नाटक की हर प्रस्तुति की तरह ही हर जगह, हर बार नई हो जाती है। ज़्यादातर घाटे का सौदा होते हुए हर रंगकर्मी इसे करना चाहता है और करता है। देश की आर्थिक स्थिति तो कभी -कभी इतनी ख़राब होती है जितनी आज है पर थियेटर की इकानामी हमेशा ही लड़खड़ाई सी रहती है ।रंगमंच से जुडे अधिकांश लोग गणित में ज़रूर कमजोर हो सकते हैं पर गणितबाजी में वे क़तई कमजोर नहीं हैं । कुछ लोग सत्ता को साधकर NGO की आड़ में ग्रांट पाने के लिए भी नाटक -नाटक खेलते हैं । ऐसे लोगों को सत्ता का प्रश्रय भी मिलता है क्योंकि ये प्रचारात्मक , स्तुति गान वाली बिना प्रतिरोध की नाट्य प्रस्तुति करते हैं और ज़रूरत पड़ने पर स्वीकृतकर्ता की आवभगत भी करते हैं ।


ये सारी बातें दिल्ली के रशियन सेंटर में अजित राय द्वारा रंगमंच का अर्थशास्त्र गोष्ठी में चर्चा के दौरान आई ।देशभर के अलग -अलग क्षैत्र से आये रंगकर्मियों की चर्चा को सुनते हुए एक बात तो साफ़तौर पर समझ में आई की सबको अपने -अपने शहर का गणित मालूम है । शहर के लोगों का मनोविज्ञान समझने वाले जुझारू रंगकर्मियों के पास फ़िलहाल ऐसा कोई फ़ार्मूला नही है ,जो थियेटर की इकानामी को भलीभाँति समझा दे। उनके पास हौसल्ला , हुनर हिकमतअमली, जूनून के साथ अपने रंगमंच की ताक़त है । चंदाजीवी इस समाज में लोग होली, गणेश के चंदे की ही तरह नाटक के लिए चंदा देने तो तैयार हैं पर टिकिट ख़रीदकर जाने से उनकी इज़्ज़त कम हो जाती है।

सुप्रसिद्ध फिल्म और कला समीक्षक अजीत राय ने एक अक्टूबर को  अपने जन्मदिन के अवसर एकत्र हुए देशभर के रंगप्रेमियों की उपस्थिति को एक सार्थक विमर्श में तब्दील किया ।ये अजित राय का जादू है की उनके जन्मदिन को मनाने अपना पैसा ख़र्च करके देश विदेश के कोने -कोने से लोग एक शाम एक साथ एकत्र होते हैं ।


 ऐसी ही शाम एक अक्टूबर को दिल्ली के रशियन सेंटर की थी जिसमे थियेटर की इकानामी को लेकर सार्थक और गंभीर चर्चा हुई ।चर्चा की शुरूआत अतुल सत्य कौशिक ने की । पूरे प्रोफेसलिज्म के साथ एक से बढ़कर नाटको की सफल और हाईस्कूल प्रस्तुति देने वाले दिल्ली से जुडे अतुल सत्य कौशिक ने थियेटर की इकानामी के लिए एक मैकेनिज्म तैयार करने की बात कही । हाल में निर्देशित उनके गंभीर विषय वस्तु के नाटक पाजामा पार्टी ने टिकिट बिक्री के नये कीर्तिमान स्थापित किये।

हिन्दू पेपर से लम्बे समय से जुडे रहे नाट्य समीक्षक दीवान सिंह बझेली ने नाटको की श्रेष्ठता और निरंतरता पर ज़ोर दिया । गोष्ठी की अध्यक्षद्वय साहित्यकार ऋषिकेश सुलभ पटना  और जयपुर रंग महोत्सव से जुडे दीपक गेरा ने अपने अनुभव साझा किये । इस चर्चा में चंडीगढ़ से चक्रेश कुमार,इलाहाबाद से सुश्री विधु खरे ,दिल्ली से प्रियंका शर्मा विकास बारी ,जबलपुर के आशीष पाठक , रींवा के मनोज मिश्रा , हिसार के मनीष जोशी , आज़मगढ़ से अभिषेक पंडित , ममता पंडित,रायपुर से सुभाष मिश्र, खैरागढ़ से डॉ योगेन्द्र चौबे ने भाग लेकर अपने -अपने शहर में हो रहे रंगकर्म की जानकारी देते हुए उसके आर्थिक पक्ष पर बात की ।

आज़मगढ़ में अभिषेक पंडित ने जहाँ नाटक का सामाजिकरण करके पूरे शहर को ही इससे जोड़ रखा है वही रींवा के मनोज मिश्रा और उनके साथी पूरी दबंगाई से नाटक के लिए चंदा लेते हैं , और लोग चंदा देकर जहाँ जगह मिलती है वहाँ बैठकर नाटक देखते हैं । चंडीगढ़ के चक्रेश कुमार बहुत से प्रयोगों के बाद अब अलग -अलग राज्यों के गाँवों में जाकर जनसहयोग से प्ले करते हैं ।आजकल उनका पड़ाव छत्तीसगढ के समीपवर्ती उड़ीसा के गाँवों में होने को है । बाक़ी अन्य प्रदर्शनकारी कलाओं से इतर नाटक सीधे -सीधे प्रतिरोध का माध्यम है ,इस कारण सरकारों से इसे वह प्रोत्साहन , प्रश्रय नही मिलता जो अन्य प्रदर्शनकारी कलाओं को मिलता है । यह विधा कुछ जूनूनी रंगकर्मियो की ज़िद के कारण भरतभूमि से लेकर अब तक निरंतर चली आ रही है ।ऐसे ही जूनूनी रंगकर्मि , नाट्य लेखक , नाट्य डायरेक्टर विकास बारी । शिक्षक की नौकरी छोड़कर मन की सुनने वाले इस युवा डायरेक्टर के नाटक आज पूरे देश में धूम मचा रहे हैं ।दिल्ली की ही रंगकर्मि प्रियंका शर्मा ने सिविल लाईन में एक NRI का बंद पड़ा बंगला न्यूनतम किराये पर लेकर नाट्य प्रदर्शन प्रारंभ किया है ।अपने पड़ोस में रह रहे एलिट क्लास की एक महिला को टिकिट लेकर नाटक देखने आने कहने पर - वे कहने की हम अपना टाईम भी दे और टिकिट भी लें । ऐसे पडोसीनुमा दर्शकों के बीच प्रियंका निरंतर नाट्य प्रस्तुति कर रही हैं ।


जबलपुर के आशीष पाठक जिन्होंने रैनबैक्सी जैसी कंपनी की नौकरी छोड़कर पूर्णकालिक रूप से नाटक को ही अपनी आजीविका का साधन बना रखा है , अपनी संधर्ष यात्रा और सफलता की कहानी बयां की।

खैरागढ़ इंदिरा संगीत विश्वविघालय के नाट्य विभाग के प्रमुख, गुडी रायगढ़ के निर्देशक डॉ योगेन्द्र चौबे ने बताया की उनके बहुत से पासआऊट विधार्थी अपनी -अपनी संस्था के माध्यम से लोकनाट्य से जुड़कर अच्छा काम कर रहे हैं। छत्तीसगढ फिल्म एंड विजुअल आर्ट सोसाइटी के अध्यक्ष संस्कृति कर्मि सुभाष मिश्र ने कहा की नाट्य गतिविधियाँ की निरंतरता और गुणवत्ता से नियमित दर्शक वर्ग तैयार किया जा सकता है। टिकिट लेकर नाटक देखने वाले दर्शकों की कमी नही है केवल इसके नियमित बेहतरीन प्रस्तुति की ज़रूरत है । उन्होने रायपुर में अपने घर की छत पर बने सौ सीटर सर्वसुवियुक्त जनमंच के वीकएंड थियेटर की जानकारी देते हुए सभी नाट्य निर्देशक को जनमंच पर नाट्य प्रस्तुति के लिए आमंत्रित किया।

इस सार्थक विमर्श के दौरान सुप्रसिद्ध लेखिका तस्लिमा नसरीन, हंस के संपादक ,लेखक संजय सहाय, असग़र वजाहत, फिल्म ऐक्टर यशपाल शर्मा , कला समीक्षक शिवकेश, कत्थक डांसर रचना यादव सहित बड़ी संख्या अपने अपने क्षैत्र की देश विदेश की ख्यातिनाम हस्तियाँ उपस्थित थी।