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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-शिक्षा और स्वास्थ्य कब पहली प्राथमिकता होगी

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-शिक्षा और स्वास्थ्य कब पहली प्राथमिकता होगी


कोरोना काल ने पूरे देश को एक बार यह अहसास करा दिया है कि जान है तो जहान है। इस जान और जहान के बीच में यदि सर्वाधिक किसी बात से देश के लोग प्रभावित हुए हैं तो वह है रोजगार के अवसर के साथ स्वास्थ्य सेवाएं और मौजूदा शिक्षा व्यवस्था। कोविड-19 के चलते जब अस्पतालों की व्यवस्था चरमरा गई तो फिर ताबड़तोड़ में रेल के कोच के साथ-साथ होटल धर्मशाला सार्वजनिक भवनों तक को कोविड सेंटर में बदलने की नौबत आन पड़ी। पहली बार लोगों को महसूस हुआ है कि हमारी मौजूदा स्वास्थ्य सेवाएं कितनी लचर है। लोगों ने मजबूरी में ही सही अपने घर में क्वारेंटीन रहकर अपना इलाज कराया । जैसे घर में इलाज वैसे ही घर से पढ़ाई। यही हाल हमारी शिक्षा व्यवस्था का है। आज तक न तो स्कूल-कॉलेज शुरू हो पाये ना ही ढंग से ऑनलाईन पढ़ाई ही हो पाई। स्कूल-कॉलेजों में किस तरह से पढ़ाई हो फीस का स्ट्रक्टर शेड्यूल कैसा हो इसको लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं बन पाई। खानापूर्ति के नाम पर आन लाईन क्लासेस जरूर शुरू हुई किन्तु हमारा वाई-फाई नेटवर्क शहर से बाहर निकलते ही दस किलोमीटर पर ही दम तोड़ देता है। मोबाइल कंपनियों के दावों का झूठ थोड़ी-थोड़ी दूरी पर उजागर हो जाता है। पता नहीं ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे किस नेटवर्क से ऑनलाईन क्लास अटैंड करते होंगे।

शिक्षा और स्वास्थ्य हमारी सरकारों की प्राथमिकता में कभी नहीं रहा। दोनों ही क्षेत्रों में तरह-तरह के नवाचार के नाम पर प्रयोग होते रहे। डाक्टर और टीचर जो इसकी बुनियाद में थे उन्हें कभी संविदा पर तो कभी मानदेय पर नियुक्ति देकर पढ़ाई की अस्पताल में स्वास्थ्य सुविधाओं के होने की रस्म अदायगी होती है। अभी भी देश के अलग-अलग प्रदेश में अलग-अलग तरह के टीचर,  डाक्टर पदस्थ हैं। नई शिक्षा नीति, स्वास्थ्य नीति किस तरह व्यवहारिक हो इस पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है।
हमारे देश में सार्वजनिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य के लिए बजट आबंटन आवश्यकता से हमेशा कम रहा है।
फाइनेंस मिनिस्टर ने 2020-21 के केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के लिए 69000 करोड़ रुपये के आबंटन की घोषणा की जो पिछले साल से थोड़ा अधिक है। भारत में डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात 1: 1000 के डब्ल्यूएचओ की सिफारिश के खिलाफ 1: 1456 है। 21 मई 2020 तक भारत में 542 मेडिकल कॉलेज और 64 स्टैंड पीजी संस्थान हैं जिनकी योग्यता मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा मान्यता प्राप्त है।

विगत वर्षों में आइसीडीएसय इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विसे के तहत मुहैया कराई जाने वाली सेवाओं के लिए बजट में भारी कटौती होती रही। बजट की कमी के कारण 6 वर्ष से नीचे के बच्चों के बेहतर व गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्यण्पोषण और शिक्षा की गारंटी तो एक सपना ही है। मौजूदा संकट ने देश में शिक्षा और स्वास्थ्य के सार्वजनिक ढांचे की जर्जर हालत से सभी वाकिफ  हो चुके हैं। मुनाफा आधारित निजी अस्पतालों और स्कूलों ने अपने लाभ के लिए किसी प्रकार की कोई कसर नहीं छोड़ी है। कोरोना की मार झेल रहे लोगों के लिए स्वास्थ के साथ बच्चों की शिक्षा को प्रायवेट अस्पतालों स्कूलों के भरोसे छोडऩा बहुत भारी पड़ा ऐसी स्थिति से निबटने के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं के सार्वजनिक ढांचे को मजबूत किया जाना ही एकमात्र विकल्प है।

मार्च में लॉकडाउन की घोषणा से लेकर अब तक सरकार की ओर से ढेर सारी घोषणाएँ तो की गई लेकिन इन घोषणाओं के केंद्र में 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को कभी नहीं रखा गया। अभी आंगनबाड़ी सेवाए लगभग पूरी तरह बन्द है। नतीजतन ग्रोथ मॉनिटरिंग के अभाव में कुपोषित एवं अतिकुपोषित बच्चे प्रभावित हो रहे हैं जो बेहद चिंताजनक है। यही नहीं ऑनलाइन शिक्षा के इस दौर में नेटवर्क मोबाइल चार्ज डाटा पैक से लेकर मोबाइल सेट की अनुपलब्धता जैसी बुनियादी समस्याओं ने व्यापक आबादी को शिक्षा के दायरे से बाहर कर दिया है। ऑनलाइन प्लेटफार्म तकनीकी तौर पर चाहे जितने भी उन्नत क्यों न  हों वे नियमित स्कूली शिक्षा के विकल्प कतई नहीं हो सकती।

पूरे देश सहित सरकार को इस आशय की शिकायतें लगातार मिल रही थी कि हाईकोर्ट के एक आदेश का फायदा उठाकर कुछ निजी स्कूल संचालक पैरेंट्स से पूरी फीस वसूली का दबाव बना रहे हैं और उन्हें फीस जमा करने के लिए मैसेज भेज रहे हैंए साथ ही स्कूल प्रबंधन की तरफ से फीस जमा नहीं करने पर बच्चों को स्कूल से बाहर निकालने की बात कही जा रही है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लॉकडाउन के दौरान आदेश दिया था कि निजी स्कूल संचालक छात्रों से ट्यूशन फीस की वसूली कर सकेंगे। इसके लिए हाईकोर्ट ने स्कूलों को सशर्त अनुमति दी थी हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि ट्यूशन फीस की वसूली से उन्हें शिक्षकों सहित अन्य स्टाफ  को पैसा देना होगा इस दौरान हाईकोर्ट ने किसी भी स्टाफ को नौकरी से बाहर नहीं निकलने की भी अपील की थी।
दरअसल, हाईकोर्ट ने अपने आदेश में ट्यूशन फीस वसूली का आदेश दिया था साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा था कि जो पैरेंट्स फीस नहीं देते हैं या जिनकी आर्थिक स्थिती ठीक नहीं है स्कूल प्रबंधन द्वारा उन पर फीस जमा करने का दबाव नहीं डाला जाएगा।

लॉकडाउन के दौरान शैक्षणिक शुल्क के नाम पर छात्रों से भारी-भरकम फीस वसूलने और फीस नहीं दे पाने वाले बच्चों को ऑनलाइन क्लास से बाहर करने वाले स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाने राज्य सरकार सख्ती के साथ नकेल कसने जा रही है। सरकार ने जिला शिक्षा अधिकारियों के माध्यम से सभी स्कूलों द्वारा इस अवधि के दौरान वसूली गई फीस का पूरा ब्यौरा मांगा गया है।

अशासकीय विद्यालय फीस विनियमन अधिनियम 2020 निजी स्कूल द्वारा प्रथम बार फीस निर्धारण का प्रस्ताव स्कूल फीस समिति द्वारा समयसीमा में प्रस्तुत नहीं किया जाताए तो विद्यालय फीस समिति में कलेक्टर द्वारा नामांकित नोडल अधिकारी ऐसे निजी स्कूल की फीस तय कर सकेंगे। अधिनियम में यह भी कहा गया है कि नोडल अधिकारी के प्रस्ताव के आधार पर फीस समिति में अभिभावकों को नामांकित कर सकेगा। वहीं स्कूल के प्राचार्य द्वारा स्वविवेक से अभिभावकों को नामांकित किया जा सकेगा। समिति में एक शिक्षाविद् को जिला शिक्षा अधिकारी के परामर्श से शामिल किया जा सकेगा। समिति में एक विधि विशेषज्ञ को भी रखने का प्रावधान किया गया है।

स्वास्थ्य सेवाओं के संबंध में एक अध्ययन बताता है कि भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की तंगी के चलते प्रतिवर्ष 4 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे आ जाते हैं। डब्ल्यूएचओ ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि भारत मे 60 प्रतिशत से अधिक लोग खुद अपनी जेब से अपना इलाज कराते हैं जो वैश्विक औसत की तुलना में बहुत अधिक है।

सवाल आज यह है की कोरोना वायरस जिसके इलाज की वैक्सीन अभी तक नही आई है और जिसके अभी और फैलने की संभावना है उससे और भविष्य में उस जैसी अन्य बीमारियों से निपटने की हमारी क्या तैयारी है  यदि हम पैमेंट के आधार पर ही सबको बेहतर शिक्षा और स्वास्थ निजी क्षैत्र के भरोसे उपलब्ध करायेंगे तो देश की बड़ी आबादी का क्या होगा सबको शिक्षा और सबको स्वास्थ्य के अधिकार का क्या होगा यदि हम अभी सजग सतर्क नहीं हुए तो फिर तो कब सतर्क, सजग होंगे।