प्रधान संपादक सुभाष मिश्र कह रहे हैं कि - एक आदमी के मरने पर इतना बवाल क्यों?

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र कह रहे हैं कि - एक आदमी के मरने पर इतना बवाल क्यों?
वैश्विक बीमारी कोरोना की आहट होते हुए भी अपने गुजरात के अहमदाबाद शहर में, जो इन दिनों कोरोना संक्रमण से सबसे ज्यादा प्रभावित शहरों में शुमार है, 'नमस्ते ट्रम्प कराने वाले मोदीजी चिंतित है कि कैसा देश है अमेरिका जहां एक अश्वेत की पुलिस मृत्यु पर इतना बवाल की मित्र ट्रम्प को बंकर में जाना पड़ा। उन्होंने मन ही मन अमेरिका को लानत भेजी होगी और सोचा होगा, की देखो मेरा भारत कितना महान है। हमारे देश में पिछले तीन सालों में सरकारी आंकड़ों के अनुसार पुलिस हिरासत में 427 लोग मरे और न्यायिक हिरासत में 4049 लोग मरे पर कहीं कोई बवाल नहीं हुआ। पिछले तीन सालों में हमारे देश के 38 हजार किसानों ने आत्महत्या की, कोई शहर बंद नहीं हुआ, कहीं कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ। पिछले चार साल में हमारे देश में 2920 सांप्रदायिक दंगे हुए जिनमें 389 लोगों की जान गई। तुम अमेरिकन एक जान के पीछे इतना बवाल कर रहे हो। अकेले दिल्ली में इसी फरवरी माह में 23 लोगों की जान गई। क्या तुम्हें ऐसा लगता है कि हमारे देश के आदमी की जान की कोई कीमत नहीं। कोरोना संक्रमण से मरने वालों में अभी हम जरूर तुमसे पीछे है, पर हमारे देश में लॉकडाउन को लेकर उतना बवाल, घरना प्रदर्शन नहीं हुआ जितना तुम्हारे अमेरिका में। हां कुछ लाख सिरफिरे लोग अपने पैरो के भरोसे जमीन नापने हजारो किलोमीटर पैदल निकल पड़े। ये सब देखकर, कुछ लोगो को सड़क पर, कुछ को ट्रेन में मरते देखकर भी मेरे देशवासियों ने कुछ नहीं कहा। उल्टे मेरे आव्हान पर उन्होने घर में बंद रखकर दीपावली जैसा माहौल निर्मित किया। हम गांधीबाबा के, देश के लोग अहिंसा के पुजारी है। आप हमारे एक गाल पर थप्पड़ मारो, हम दूसरा गाल आगे कर देंगे।  'इसको ही जीना कहते हैं तो यूं ही जी लेंगे उफ न करेंगे, लब सी लेंगे, आंसु पी लेंगे। अब गम से घबराना कैसा, गम सौ बार मिला।

मित्र ट्रम्प तुम्हें धैर्य और आध्यात्मिक तरीके से अपने लोगों से मन की बात करने की जरूरत है। तुमने नाहक ही अपने बड़बोलेपन और व्यवहार से आग में घी डालने का काम किया। तुम्हें रोज-रोज व्हाईट हाउस में मीडिया के सामने जाकर बोलने की क्या जरूरत है। बहुत सारे लोग है उन्हें भेजा करो। तुम तो मेरी तरह केवल अपनी बात किया करो। लोग अगर सोशल डिस्टेंसिंग नहीं मानते, तो कोई बात नहीं। अपनी ओर से उनकी सलामती के लिए सलाह दो नहीं, तो सब अनलॉक कर दो और भाड़ में जाने दो लोगों को, जिसे अपनी जान प्यारी होगी, वो खुद परवाह करेगा, बचेगा। तुम नवंबर में होने वाले चुनाव पर फोकस करो। मित्र ट्रम्प तुम्हें अपनी तरह दूसरी पारी खेलते हम देखना चाहते हैं।

डोनाल्ड ट्रम्प भारत को जी-7 से जी-11 के देशों में शामिल करना चाहते हैं। हमारे देश के प्रधानमंत्री मोदीजी ने उन्हें आश्वासन दिया होगा कि छोटी-मोटी हिंसा, दो-चार लोगों की मृत्यु से घबराने की जरूरत नहीं है। आप तो ऐसा कुछ चक्कर चलाओ की अगला चुनाव इन्हीं सब मुद्दों पर श्वेत लोगों को साथ लेकर जीत जाओ। जैसा हम अपने देश में बहुसंख्यकों को साथ लेकर कर रहे हैं। चाहो तो देश की सुरक्षा के नाम पर चीन पर हमला कर दो। राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत जनता बाकी सब भूल जायेगी। ये हमारा आजमाया हुआ फार्मूला है।

अमेरिका में अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की पुलिस हिरासत में मौत के बाद कई शहरों में भड़की हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही है। खराब हालात को देखते हुए सुरक्षा अधिकारियों को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कुछ समय के लिए भूमिगत बंकर तक में ले जाना पड़ा। तनाव बढ़ता देख अमेरिका के 40 से अधिक शहरों में कफ्र्यू लगा दिया गया है। डोनाल्ड ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों से कहा है कि जल्द ही दंगे नहीं रुके तो वे सेना को अमेरिका की सड़कों उतार देंगे।

हमारी ही तरह ब्रिटेन से मुक्त होकर बने अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन के नाम से वाशिंगटन डी सी में इस समय व्हाइट हाउस आंदोलनकारियों की आवाज से, नारों से गूंज रहा है।

हमारा मित्र राष्ट्र अमेरिका इन दिनों वैश्विक बीमारी के साथ-साथ नस्लवाद की समस्या से भी जूझ रहा है। अभी आने वाले नवंबर में वहां चुनाव है। जब भी चुनाव नजदीक आते हैं पता नहीं कैसे तनाव भी चला आता है। अमेरिका में श्वेत-अश्वेत की यह लड़ाई बहुत लंबे समय से चली जा रही है। रंगभेद पश्चिम के गोरें साम्राज्यवादियों की देन है। अफ्रीका मूल के पिछड़े हुए अश्वेत लोगों को गुलाम बनाकर यूरोप और अमेरिका भेजा गया।

दुनिया का सबसे पुराना लोकतांत्रिक देश के होने के साथ ही साथ अमेरिका एक व्यापारिक, सैन्य शक्ति संपन्न, सुपर पॉवर देश भी है, जो समय-समय पर पूरी दुनिया में दादागिरी करने से भी बाज नहीं आता। बहुत सारे पढ़े-लिखे हिन्दुस्तानियों का सपना है, अमेरिका में बस जाना। ग्रीन कार्ड हासिल कर लेना और डॉलर में रूपया कमाना। अमेरिका का न्यू जर्सी और नजदीक का देश कनाडा तो निकट भविष्य में प्रवासी भारतीयों की बाहुल्यता वाली जगह न हो जाये, इसमें कोई आश्चर्य नहीं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प घरेलू प्रदर्शन से थोड़े परेशान है, वहां केवल एक व्यक्ति की मृत्यु पुलिस प्रताडऩा से हुई है। हमारे देश में ना जाने कितने दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक से लेकर बहुत सारे लोग अक्सर पुलिस के राजसत्ता के या माब लिचिंग के शिकार होते हैं, परंतु हमारे यहां कोई बवाल नहीं होता। जिस तरह जातिगत अस्मिता बहुत गहरी होती है, उसी तरह नस्लगत रंगविभेद की जड़ें भी बहुत गहरी होती है। कोई खास मौका आने पर इसका भयावह रूप हमें सामने दिखाई देता है, जो आज अमेरिका में दिख रहा है। हमारे यहां भी कुछ घटनाएं है, जो इसी मानसकिता के कारण घटित हुई है, पर ज्यादा कुछ हल्ला-गुल्ला नहीं हुआ। थोड़े बहुत जागरूक लोग छोटी-मोटी रैली निकालकर, जरूरत पड़ी तो न्यायालय और ऐसी स्वायत्त संस्थानों का दरवाजा खडख़ड़ाते हैं, जहां से उन्हें खुद ज्यादा उम्मीद नहीं है।

4 जुलाई 1776 में अमेरिका को स्वतंत्रता मिल गई थी, पर अफ्रीका से लाए गए अश्वेत गुलामों को दासता से मुक्ति नहीं मिली थी। उनसे घर के सारे कार्य कराए जाते थे, खेती में भी अश्वेतों से कार्य कराया जाता था और उनका शारीरिक शोषण आम बात थी। उत्तर और दक्षिणी अमेरिका में इस बात को लेकर मतभेद था। दक्षिणी राज्यों की बढ़ती नाराजगी को कम करने के लिए वर्ष 1850 में भगोड़ा दास कानून लाया गया जिसमें मालिक से भाग चुके अश्वेतों को पकड़कर वापस लाया जा सकता था। उत्तर और दक्षिण राज्यों के बीच इन्हीं मतभेदों की वजह से 1861-1865 के बीच गृह युद्ध चला। अब्राहम लिंकन ने इन सभी आपसी मतभेदों को खत्म कर मुक्ति उद्घोषणा लाने के बाद गृह युद्ध समाप्त कराया। उसके सौ साल बाद भी अमेरिका समाज में अश्वेतों की स्थिति में कुछ खास सुधार नहीं आए और ना ही उन्हें श्वेतों के समान अधिकार प्राप्त हुए।

19 सदीं में अमेरिका के दक्षिणी प्रांतों में चल रही गुलामी की प्रथा को समाप्त करने के लिए जब वहां सिविल वार हुआ तो दोनों पक्षों से श्वेत सैनिक ही लड़े और 10 लाख से ज्यादा श्वेत मारे गए। यानी अश्वेतों को गुलामी से मुक्ति मिले इसके लिए श्वेत लोगों ने जान दी।

सांप्रदायिकता हो या रंगभेद, सत्ता पर काबिज लोगों के लिए एक राजनीतिक हथियार है। सकारात्मक राजनीति जहां लोगों को आपस में जोड़ती है, भाईचारे की बात करती है। वही सकारात्मक राजनीति में विश्वास करने वाले अवसर का लाभ लेकर धर्म, संप्रदाय, जाति, क्षेत्रीयता, भाषा, नस्ल, खानपान, मान्यताओं को लोगों में भ्रम की, वैमनस्य की स्थिति पैदा करती है। अमेरिका और भारत जैसे देशों में जो कुछ घटित हो रहा है, या हुआ है उसमें इसी तरह की नकारात्मक शक्तियों का हाथ है। कोरोना संक्रमण को लेकर चीन पर हमला बोल रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने विश्व स्वास्थ्य संगठन से भी नाता तोड़ लिया। बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कुछ कारपोरेट घरानों से संचालित होने वाली व्हाइट हाउस की सत्ता चाहती है कि विश्व बाजार पर, अर्थव्यवस्था पर उसका कब्जा हो। अमेरिका संयुक्त राष्ट्र संघ को भी कुछ नहीं समझता। उसे कभी निकारागुआ अच्छा नहीं लगता, तो कभी सद्दाम हुसैन। ये तो गनीमत है कि अमेरिकी संविधान के अनुसार कोई भी व्यक्ति दो बार से अधिक अमेरिका का राष्ट्रपति नहीं रह सकता सिवाय द्वितीय विश्व युद्ध के समय अपवाद स्वरूप रूजवेल्ट के दौरान। उन्होंने भी हिरोशिमा-नागासाकी पर बम गिराने की मंजूरी देकर अपना नाम हमेशा के लिए काले अक्षरों में दर्ज करा लिया।

मनुष्य जाति एक है जिसमें रंग के, नस्ल के और जाति के भेद है पर मूलत: सब एक हैं। गोरे लोग सिर्फ अपने को सभ्य मानते हैं। जैसे हिटलर जर्मनी के लोगों की नस्ल को ही दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रजाति मानता था। अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने दक्षिण अफ्रीका के जरिये अमेरिका में आई दास प्रथा को बंद करवाया। अमेरिका में उद्योगपति घरानों की कितनी दखल अंदाजी है इस बात का पता वहां के दो बार राष्ट्रपति रहे विल्सन विशिष्ट की इस वाक्य से पता चलता है कि अमेरिका में उद्योगपतियों का एक गुट सड़क पर किसी आदमी को पकड़ता है, उसे व्हाइट हाउस में ले जाता है और देशवासियों से कहता है यह तुम्हारा राष्ट्रपति है।
महाराष्ट्र के खैरलांजी में 2006 में दलित परिवार के साथ बलात्कार, हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या हो या मुंबई की डॉ. पायल तडवी की जातीय उत्पीडऩ के बाद आत्महत्या, गाय को लेकर दलितों की मॉब लिचिंग। इन सब मामलों में आंदोलन दलितों को ही करना पड़ा। अमेरिका की तरह यहां का बहुसंख्यक समुदाय ने बढ़-चढ़कर इन आंदोलनों में हिस्सा नहीं लिया। यदि हम प्रजातंत्र की नीचे और मूल्यों को मजबूत देखना चाहते हैं, तो हमें अपनी चुप्पी तोडऩी होगी।