प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- मुशायरों के मंच की गारंटी थे राहत इंदौरी

 प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- मुशायरों के मंच की गारंटी थे राहत इंदौरी


मिर्जा गालिब की तरह राहत इंदौरी के कहने का अंदाजे बयां और था। राहत इंदौरी मुशायरों के मंच की गारंटी थे। वे मंच की और पब्लिक की नब्ज को जानते थे। उनके पास कहने को अपने समय के दुख-दर्द, हालात और ऐसा बहुत कुछ था जिसे लोग घंटों सुनना चाहते थे। उर्दू शायरी के पास अभी भी तमीज के शायर और श्रोता बचे हुए हैं जिसका हिन्दी कविता के मंच पर अभाव है। यही वजह है कि आज हिन्दी कवि सम्मेलन के मंचों से कविता गायब होकर चुटकुले, मिमिक्री सुनाई देती है। हिन्दी का गंभीर कवि अब कवि सम्मेलन के मंच से गायब है। बहुत सारे कवियों का मानना है कि कविता कभी पब्लिक डोमेन की चीज नहीं रही जबकि हम भारतीय जीवन पद्धति को देखते तो इसमें हमेशा से लय और छंद जीवन से लेकर मृत्यु तक साथ रहते हैं।
बकौल राहत इंदौरी
इससे पहले कि हवा शोर मचाने लग जाए
मेरे अल्लाह मेरी खाक ठिकाने लग जाए।

राहत इंदौरी को नहीं मालूम रहा होगा कि कोरोना संक्रमण में मरने, बाकी समय के मरने से कैसा जुदा होगा। जिस शायर के करोड़ों चाहने वाले थे, वह चंद लोगों की मौजूदगी में सुपुर्दे-खाक होगा। उन्हीं का एक शेर है-
नफरत का बाजार न बन, फूल खिला तलवार न बन
कौन खरीदेगा तुझको, उर्दू का अखबार न बन।

चार दशक तक अपनी बेहतरीन शायरी और विचारों से देश-दुनिया को रास्ता दिखाने वाले राहत इंदौरी को कोरोना हुआ, हार्ट अटैक हुआ और वे चल बसे। आज सोशल मीडिया पर उनके वीडियो उन्ही का अंदाजेबयां कर रहे हैं-
मैं जब मर जाऊं, मेरी अलग पहचान लिख देना
लहु से मेरी पेशानी पे, हिन्दुस्तान लिख देना।

राहत इंदौरी का एक शेर है-
बहुत ही खूबसूरत है ये दुनिया
यहां कुछ दिन ठहरना चाहिए था

एक शायर दुनिया के हालात से कितना भी खफा हो जाए, लेकिन जानता है कि यह दुनिया खूबसूरत है। जो लोग इस दुनिया की खूबसूरती बिगाड़ रहे हैं, वह उन्हें पहचानता था। राहत इंदौरी इसी कारण देश-दुनिया में मुशायरों की जान थे। अफसोस है कि हिन्दी में ऐसा ज्ञान कवि अब कोई नहीं है जो मंच की नब्ज पहचानता हो और रचना के स्तर को भी ऊंचा बनाए रखे। मुक्त छंद की कविता का जोर बढ़ा तो हिन्दी कविता मंच पर तीसरे दर्जे के नुक्कड़ और लतीफेबाज कवियों के हाथ में आ गई और हिन्दी कवि सम्मेलनों का जो बुरा हाल हुआ वह अब किसी से छिपा नहीं है। मंच पर कविता पढऩा एक हुनर है वरना अच्छी कविता भी पिट जाती है। शरद जोशी तो मंच पर गद्य पढ़कर मंच लूट ले जाते थे। मंच पर स्तर की शायरी भी सफलता से की जा सकती है इसे राहत इंदौरी ने मुमकिन किया था। उर्दू में मुशायरों की रवायत पुरानी है लेकिन राज-दरबारों से निकलकर जनता-दरबार तक आकर भी उसका स्तर काफी हद तक कायम है। हिन्दी कवि सम्मेलनों के बारे में ऐसा कहना मुमकिन नहीं है। राहत इंदौरी भी मुशायरों की उसी रवायत के शायर थे। खासी लोकप्रियता उन्हें मिली और उनकी शायरी को गंभीरता से स्वीकार किया गया। उन्हीं की पंक्तियों से उन्हें याद किया जा सकता है-
अब अगर कम भी जिएं हम तो कोई रंज नहीं
हमको जीने का सलीका है, यही काफी है। ऐसे समय जब मंचों पर अच्छी कविता और उसके कहने वाले कम होते जा रहेे हैं, मंचों पर इवेंट मैनेजरों, किसी गिरोह विशेष का या सबको साधकर समय की नब्ज को पहचान कर मंच के अनुकूल कहने का रिवाज बढ़ता जा रहा है ऐसे में राहत इंदौरी, अदम गोंडवी, मुन्नवर राणा, निदा फाजली जैसे शायरों ने अपनी शायरी से मंच को ना केवल ऊंचाई दी बल्कि अपने समय के हालातों से रूबरू कराया।

दिल मेरा तोड़ते हो, लो तोड़ो, चीज़ मेरी नहीं तुम्हारी है। राहत इन्दौरी के कहने का अन्दाज़ बिल्कुल अलग है। आग में फूलने फलने का हुनर जानते हैं, ना बुझा हमको के जलने का हुनर जानते हैं। हर नये रंग में ढलने का हुनर जानते हैं, लोग मौसम में बदलने का हुनर जानते हैं। इन्दौरी की शायरी की फूलों की नाजुकता है जो हर दिल को लुभाने का हुनर रखती है और खाइयों की सी गहराई है जो हर दिल को अपने में छुपाने का हुनर रखती है। वे हर रंग की शायरी करते हैं जिसमें प्यार, नफऱत, गुस्से, मेल-मिलाप के रंग बिखरे पड़े हैं। मेरी आँखों में कैद थी बारिश तुम ना आये तो हो गयी बारिश। तेरी आँखों की हद से बढ़कर हूँ, दश्त मैं आग का समन्दर हूँ। कोई तो मेरी बात समझेगा, एक क़तरा हूँ और समन्दर हूँ।

राहत इंदौरी के चांद पागल है गजल संग्रह की भूमिका में मुन्नवर राणा लिखते हैं -किसी किसी को ही मिलते हैं चाहने वाले! एक अच्छे शायर में खूबियों के साथ साथ खराबियाँ भी बराबर की होनी चाहिए, वरना फिर वह शायर कहाँ रह जाएगा, वह तो फिर फ़रिश्ता होकर रह जाएगा! और फ़रिश्तों को अल्लाह ने शायरी के इनआम से महरूम रखा है। इसलिए पूरे यक़ीन से कहा जा सकता है कि राहत फ़रिश्ते नहीं हैं। वह तमाम इन्सानी कमजोरियों से लुत्फ लेना जानते हैं  और एक अच्छे और सच्चे शायर की तरह वह अपनी कमजोरियों का इकरार भी करते हैं।  जिसके पास अपने गुनाहों और कमजोरियों के इकऱार की हिम्मत भी मौजूद हो , वह सचमुच बड़ा आदमी होता है!
राहत ने अपनी शायरी के खरे सोने में कहीं कहीं अवामी जज़्बात के पीतल की मिलावट भी की है, और गज़़ल को खूबसूरत ज़ेवरों में ढालने के लिए ताँबे और पीतल के टाँकों की ज़रूरत पड़ती है, वरना सोने के ढेलों और टुकड़ों से सिक्के तो ढाले जा सकते हैं, खूबसूरत ज़ेवर कभी नहीं बनाए जा सकते हैं। अच्छे और होशियार सर्राफ़ की तजुरबेकार आँखें ज़ेवर का हुस्न देखती हैं, ताँबे और पीतल के टाँके तो मामूली कारीगर तलाश करते रहते हैं! मुशायरे , महफि़लें और स्टेज तो वो नुमाइशगाहें हैं जहाँ आप औरत और शायरी का मेकअपज़दा चेहरा देखते हैं। शायरी गैस भरा वह गुब्बारा नहीं है जो पलक झपकते आसमान से बातें करने लगता है! बल्कि शायरी तो खुश्बू की तरह आहिस्ता आहिस्ता अपने परों को खोलती
मुनव्वर राना कोलकाता 13.02.09

अपने पहले गजल संग्रह रूत की भूमिका में राहत इंदौरी लिखते हैं .. गज़़ल के वास्ते ये फ़ासला ज़रूरी है ... कई नये शहर और नये मुल्क आबाद हो चुके हैं ... नये बाज़ारों और नयी दुकानों में नाम की धूम मची हुई है, खरीदारों की मोहताजी भी नहीं और बिकने की आरजू भी नहीं... हवा को गले लगाकर ये कहना - अपना कौन और पराया कौन ... कैसी कठिन घड़ी है, धूप को उसकी और साये को उसकी औकात याद दिलाते रहना ... चरागों पे हमारे दावे और रोशनियों पर किसी और का कब्जा ... चाँद सूरज कभी-कभार घर के रोशनदान से आँखें मारते रहे और ग़ायब होते रहे, लेकिन अच्छी-बुरी जैसी भी जुबान थी लोगों के सामने रहे- सहीफ़ों की
..... हमने गुल भी बहुत खिलाये थे ..
जिन ज़मीनों के वारिस होने का दावा ... वो उठाना गलत था ... के ... हम कहाँ के धुले धुलाये थे ... महफिल थी - हाल अब भी वही है मजलिस का ...
इन्दौर नवम्बर , 2016 डॉ. राहत इन्दौरी

उर्दू के विख्यात शायर डॉ. राहत इन्दौरी का जन्म इन्दौर में 1 जनवरी 1950 को हुआ था। उन्होंने इन्दौर विश्वविद्यालय में सोलह वर्षों तक उर्दू साहित्य पढ़ाया तथा उर्दू की त्रैमासिक पत्रिका शाखें का दस वर्षों तक सम्पादन किया। अब तक उनके छह कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने पचास से अधिक लोकप्रिय हिन्दी फि़ल्मों एवं म्यूजिक एलबमों के लिए गीत लेखन भी किया है।

हर सुबह है वही मातम दर ओ दीवार के साथ कितनी लाशें मेरे घर आएँगी अखबार के साथ आज वो चुप हैं जो पहले बहुत बोलते थे लोग समझौता किए बैठे हैं सरकार के साथ

राहत इंदौरी साहब के निधन की खबर ने उनके चाहने वालों को बेचैन कर दिया। उन्होंने शायरी की दुनिया में बादशाह की तरह जिंदगी गुजारी।
राहत इंदौरी ने मुशायरों के साथ-साथ कवि सम्मेलनों में भी अपनी शायरी का लोहा मनवाया। उन्हें अपनी बात आम लोगों तक पहुंचाने का हुनर हासिल था। वे अपनी शायरी के जरिये लोगों के दिलों में बसते थे। मुशायरों में शायरी पेश करने का उनका अंदाज सबसे अलाहिदा था, वे जैसे रंगमंच पर संवाद कह रहे हो ऐसा लगता था। उनको सुनते हुए ऐसा महसूस होता था जैसे हम शायरी को देख रहे हैं। उनकी शायरी में व्यवस्था के खिलाफ भरपूर स्वर सुनाई देते हैं। वे अपनी बात बड़ी बेबाकी से कहते थे। अपने विचारों से कभी समझौता नहीं किया। युवा शायर सुखनवर हुसैन कहते हैं मौजूदा समय सोशल मीडिया का समय है। आज घर बैठे हम अपने पसंदीदा शायरों से जुड़ जाते हैं। सोशल मीडिया बहुत से गुमनाम कलमकारों, शायरों, कवियों को मंच दिया है। यू ट्यूब, व्हाट्सएप वगैरह पर राहत साहब के बहुत से मुशायरों को देखा और सुना जा सकता है।
सोशल मीडिया पर इन दिनों बहुत से साहित्यिक, अहबी ग्रुप चल रहे हैं। छत्तीसगढ़ में छ.ग. उर्दू तंजीम, दि अरूज फाउंडेशन, हल्क ए अदब जैसे शायरी के ग्रुप हैं। राहत साहब ने शायरी को नई ऊंचाईयां दीं। उन्होंने रवायती शायरी के साथ ही जदीद शायरी को भी बखूबी पेश किया। उनके कलाम में तंज का भी गोशा नजर आता है।

कभी महक की तरह हम गुलों से उड़ते हैं, कभी धुएँ की तरह परबतों से उड़ते हैं, ये कैंचियाँ हमें उडऩे से खाक रोकेंगी, के हम परों से नहीं हौसलों से उड़ते हैं....