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क्या आज के राजनेता हमारे बच्चों के सबसे अच्छे मार्गदर्शक हो सकते हैं?

क्या आज के राजनेता हमारे बच्चों के सबसे अच्छे मार्गदर्शक हो सकते हैं?

अव्यक्त

अब से कोई 2400 साल पहले यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘द रिपब्लिक’ में कहा था कि राजा को दार्शनिक होना चाहिए या कि दार्शनिकों को भी राजा बनना चाहिए. प्लेटो की शर्त थी कि ऐसे राजा का जीवन एकदम सादगीपूर्ण होना होगा. मोटे तौर पर जिसे हम भारतीय परंपरा मानकर चलते हैं उसमें राजा का ज्ञानी होना अपेक्षित माना गया, लेकिन ज्ञानी मात्र का स्थान राजा से ऊपर रखा गया. राजा कितना भी शक्तिशाली हो और धनवान हो, लेकिन उसे ज्ञानियों, संतों और फकीरों के सामने झुककर उनसे परामर्श और मार्गदर्शन लेने की परंपरा रही. इसलिए यहां कहा गया कि ‘विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन. स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते...’ यानी विद्वान और राजा दोनों की तुलना कभी नहीं हो सकती, क्योंकि राजा की पूजा केवल अपने देश में होती है जबकि विद्वान की पूजा हर जगह होती है.

लेकिन यदि राजा या किसी भी प्रकार के शासक को यह अहंकार हो जाए कि वही सबसे बड़ा ज्ञानी है, तो वह अनर्थकारी ही सिद्ध होगा. बहुत से विद्वानों ने 20वीं सदी में नई प्रकार की तानाशाही या सर्वसत्तावादी शासकों के उदय के लिए प्लेटो के ‘दार्शनिक राजा’ वाले सिद्धांत को भी जिम्मेदार ठहराया है. एडोल्फ़ हिटलर और जोसेफ़ स्टालिन का उदाहरण ऐसे ही शासकों के रूप में दिया जाता है जिन्होंने जीवन के हर क्षेत्र को आधिकारिक रूप से प्रभावित करने की कोशिश में अपनी सनक थोपने से भी गुरेज नहीं किया. इसका कारण था कि उन्होंने स्वयं को सुचिंतित दर्शन और शुद्धतावादी सिद्धांतों का प्रणेता मान लिया और उन अनर्थकारी सिद्धांतों को अमल में लाने की जिद में हिंसा से भी गुरेज नहीं किया.

बच्चों का मार्गदर्शक कौन हो, इस बारे में दुनिया के लगभग सभी समाजों में माता, पिता और आचार्य के नाम पर सहमति रही है. लेकिन वह भी सशर्त रही है. जैसे भारतीय परंपरा में ही आचार्य के लिए कठोर शर्त रख दी गई कि ‘अचिनोति अर्थान्. अचिरति. आचारं कारयति.’ यानी जो सब विषयों का अध्ययन करता है, खुद आचरण करता है, और इस आधार पर दूसरों से आचरण करा पाने में सक्षम है, उसका नाम है ‘आचार्य’. संस्कृत में आचार्य ‘चर’ धातु से बना है. इसी चर धातु से ‘चारित्र्य’ और Cha-ra-cter जैसे शब्दों का बनना माना जाता है. कहने का मतलब यह कि ‘परोपदेश पांडित्यम’ को कोई भी पीढ़ी स्वीकार नहीं करती है. तो हमें क्या लगता है कि आज की पीढ़ी किसी भी ओहदे के व्यक्ति की आचरणरहित गपड़-सपड़ को गंभीरता से लेगी?

वेद में शिक्षक या मार्गदर्शक को ‘पथिककृद् विचक्षणः’ बताया गया है. पथिककृद् यानी पाथ-फाइंडर - रास्ता ढूंढ़ने वाला. आज जो राजनीति खुद रास्ता भटक चुकी है उसके झंडाबरदार भला कैसे ‘पथिककृद्’ बनेंगे? और पथिककृद के लिए भी शर्त रखी गई कि जो ‘विचक्षण’ होगा, वही ‘पथिककृद्’ बन सकेगा. विचक्षण मतलब क्या? विचक्षण माने चक्षण करने वाला, चारों ओर देखने वाला, व्यापक मानवीय दृष्टि वाला, विज़न वाला. केवल इस गुण से युक्त मनुष्य ही किसी के भी मार्गदर्शन का अधिकारी है. आज हमारी राजनीति इस व्यापक मानवीय दृष्टि से च्युत हो चुकी लगती है. वह खंड-खंड में चीजों को देखने की आदी हो चुकी है. जाति, धर्म, पंथ, राष्ट्रीयता और न जाने कितने ही संकीर्ण आधारों पर विभाजनकारी प्रवृत्तियां राजनीति पर हावी हो चुकी है. इन्हीं विखंडनकारी राजनीति के आधार पर सत्ता को प्राप्त करना और फिर उसे कायम रखने की प्रवृत्ति हमारे राजनीतिक दलों और उनके नेताओं पर हावी है. ऐसे में वे कैसे हमारे बच्चों के मार्गदर्शक बन सकते हैं?

आचार्य या मार्गदर्शक के लक्षण माने गए कि वह शीलवान, प्रज्ञावान और करुणावान होगा. यानी कि उसके चरित्र में संतों की भांति साधुता होगी. वह केवल विषय-वस्तु का ही ज्ञाता नहीं होगा, बल्कि उसकी प्रज्ञा भली प्रकार जागृत होगी. और उसके भीतर एक मां के जैसी करुणा भी होगी. ये तीनों गुण जिसमें एक साथ होंगे, केवल वही मार्गदर्शक बनने का अधिकारी होगा. यह एक खेदजनक तथ्य है कि आज के हमारे राजनेताओं में इन तीनों ही प्रकार के गुणों का सर्वथा अभाव पाया जाता है. न उसमें शील है, न प्रज्ञा. करुणा का तो मानो लोप ही हो चुका है. आज की राजनीति में ‘साधन की पवित्रता’ के सिद्धांत को ताक पर रख दिया गया है. राजनीतिक संगठनों के पास जो करोड़ों-अरबों की संपत्ति जमा हो चुकी है, उसका स्रोत किसी को मालूम नहीं है. बल्कि कानून बनाकर ऐसे स्रोत को गुप्त रखने की ढिठाई अमल में आ चुकी है. ऐसे गुप्त और अपवित्र साधनों के जरिए जो लोग सत्ता में आकर शीर्ष पदों पर बैठ गए हैं, हम उनके शील, उनकी प्रज्ञा और करुणा के बारे में कैसे आश्वस्त हो सकते हैं? फिर ऐसे लोग हमारे बच्चों के मार्गदर्शक कैसे हो सकते हैं?

अमेरिका के प्रसिद्ध राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने अपने बेटे के शिक्षक को एक बहुत मार्मिक चिट्ठी लिखी थी. उन्होंने शिक्षक से अनुरोध किया था कि ‘आप मेरे बच्चे को सिखाइएगा कि मेहनत से कमाया गया एक डॉलर, सड़क पर मिलने वाले पांच डॉलर के नोट से ज़्यादा कीमती होता है. ... आप उसे किताबें पढ़ने के लिए तो कहिएगा ही, लेकिन साथ ही उसे आकाश में उड़ते पक्षियों को, धूप में हरे-भरे मैदानों में खिले फूलों पर मंडराती तितलियों को निहारने की याद भी दिलाते रहिएगा.’ लेकिन पता चलता है कि उन्होंने पत्र के आखिर में यह भी लिख दिया कि अनुरोध के साथ-साथ ‘यह एक आदेश भी है’. यानी यह पत्र उन्होंने केवल एक बच्चे के पिता के रूप में नहीं, बल्कि एक शासनाध्यक्ष के रूप में भी लिखा था. आधुनिक समय में शिक्षकों और मार्गदर्शकों की सबसे दुःखद स्थिति यही है कि उन्हें अधिकारियों के पैरों तले रखा गया है, जहां उनकी स्वतंत्रचेतना छटपटाती रहती है. उन्हें परमुखापेक्षी बनाकर रख दिया गया है. वे एक वेतनभोगी कर्मचारी बनकर रह गये हैं. वे भला कैसे भावी पीढ़ियों का आत्मविश्वासपूर्वक मार्गदर्शन कर सकेंगे? जो भला खुद ही डर-डरकर जीता हो, वह कैसे एक निर्भयी और निष्पक्ष विश्वमानुष का निर्माण करेगा?

एक और उदाहरण जवाहरलाल नेहरू का दिया जाता है, जो प्रधानमंत्री बनने के बाद भी बच्चों से लगातार संवाद में रहते थे. लेकिन देखने की बात है नेहरू जी का प्रधानमंत्रित्व उनके व्यक्तित्व का एक छोटा पहलू था और उनके जीवनकाल का अंतिम पड़ाव था. भारतीय जनमानस के साथ उनका सुदीर्घ और प्राथमिक संबंध एक विद्वान और मार्गदर्शक के रूप में ही रहा था. बच्चों के साथ भी उनका संबंध ‘चाचा नेहरू’ के रूप में रहा, न कि ‘माननीय प्रधानमंत्री जी’ के रूप में. यानी बच्चों के साथ संवाद करने के उनके अधिकार का स्रोत सहज मानवीय संबंध था, न कि कोई शासकीय पदवी. नेहरू के बच्चों के साथ संवाद के जो भी दस्तावेज़ और वीडियो फुटेज उपलब्ध हैं उनमें उनकी देहभाषा की सहजता देखनी चाहिए. वे बच्चों से बच्चों के स्तर पर आकर या उन्हीं में से एक बनकर संवाद करते हैं. वहां कोई ज्ञानबघारू आडंबर दिखाई नहीं देता. वहां केवल मंच और स्रोता वाला संबंध नहीं है. ये सब देखने-समझने की बातें हैं.

आज राजनीति में हर प्रकार की मर्यादा भंग हो चुकी है. हमारे राजनेताओं का अपनी वाणी पर बिल्कुल भी नियंत्रण नहीं बचा है. संसद के भीतर और बाहर कहीं भी उनका व्यवहार अनुकरणीय नहीं है. चुनावों के दौरान तो उनका द्वेष, ईर्ष्या, परस्पर चरित्र-हनन, अनर्गल व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप और पाखंडपूर्ण प्रलाप अपने चरम पर होता है. किसी भी तरह सत्ता हासिल करने का लोभ और सत्ता छिन जाने का भय उनके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई देने लगता है. दिखावटी अति-आत्मविश्वास का दावा करते हुए भी उनकी हताशा उनकी बोली और व्यवहार में स्पष्ट झलकने लगती है. ऐसे लोग क्या ही हमारे बच्चों को परीक्षा के भय से निपटना सिखाएंगे? ऐसे लोग क्या ही हमारे बच्चों को बोली और व्यवहार की मर्यादा सिखाएंगे?

अब तो हल्के-फुल्के अंदाज में यह भी कहा जाने लगा है कि हमारे बच्चे राजनेताओं की तरह व्यवहार करने लगे हैं. उनकी मासूमियत खो रही है और उनमें राजनेताओं जैसी ही चतुराई आने लगी है. वे अपनी बात मनवाने के लिए कोई भी नाटक रच सकते हैं. अपने प्रतियोगी को पछाड़ने के लिए वे भी उचित-अनुचित कोई भी कसर नहीं छोड़ना चाहते. वे भी झूठे वादे करने लगे हैं. वे भी सौदेबाजी में माहिर हो रहे हैं. वे भी एक प्रकार से घूसखोरी की प्रवृत्ति के शिकार हो रहे हैं (यानी शांत रहने या बात मानने के एवज में अपनी जिद पूरा करवा रहे हैं). वे भी राजनेताओं की तरह दिखावाबाज़ और खर्चीले हो रहे हैं. वे भी वास्तव में होते कुछ और हैं लेकिन दिखते कुछ और हैं. लेकिन सोचने की बात है कि ऐसा क्यों हो रहा है? इसका कारण है कि बच्चा जिस तरह के पारिवारिक, सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में पलता-बढ़ता है, वैसी ही प्रवृत्तियां उसमें आती हैं. और चूंकि आज के समय में हमने राजनीतिक सत्तामात्र को अपना ईष्ट बना रखा है, सामाजिक व्यवस्था की बागडोर भी राजनेताओं के भरोसे छोड़ दी है, तो आखिरकार यही होना है.

पूछा जा सकता है कि उन मामलों में क्या कहेंगे जिनमें शिक्षक या आचार्य बाद में राजनेता बन जाते हैं? तो ऐसे मामलों में यही कहा जाएगा कि ऐसे व्यक्ति की मूल वृत्ति शिक्षक या आचार्य की नहीं थी. उसके जीवन में सत्ता के प्रति आकर्षण या रजोगुण पहले से मौजूद था जो उचित समय आने पर प्रकट हो गया. मान लिया जाए कि अगर किसी संतवृत्ति मार्गदर्शक पर शासन की जिम्मेदारी अनायास ही आन पड़ी और उसने अनिच्छा से इसे एक तात्कालिक कर्तव्यमात्र मानकर स्वीकार किया हो, तो उस पर रजोगुणी बाह्याडंबर हावी नहीं होने पाएगा. उसकी मूल वृत्ति कायम रहेगी. शासन की चमक-दमक या सत्तालोलुपता का वह शिकार नहीं होगा. वह बाकी ऐश्वर्य का प्रदर्शन नहीं करेगा और समाज को चैतन्य बनाकर शासनमुक्ति की ओर ले जाएगा.

हम अक्सर भूल जाते हैं कि आज की राजनीति और शासनतंत्र की जो विद्रूपताएं हैं, वे हमारे बच्चों से छिपी नहीं हैं. आज यदि हमारे बच्चों को हास्य-कथा या व्यंग्य लिखने को कहा जाए, तो वे सबसे पहले राजनीति और राजनेताओं पर ही लिखना चाहेंगे. आज जब दुनिया महायुद्धों के कगार पर खड़ी है. राजनेताओं की अदूरदर्शिता की वजह से जल, वायु और मिट्टी की शुद्धता ही नहीं, बल्कि पूरी धरती ही अपना अस्तित्व बचाने के संकट से जूझ रही है, ऐसे समय में तो होना यह चाहिए था कि हमारे राजनेता हमारे बच्चों से उनकी सहजता, सरलता, निष्कपटता, अहिंसा, एकता, वैश्विकता, साझेदारी और संरक्षण जैसी बातें सीखते.

यह अनायास नहीं है कि ग्रेटा तुन्बेर्ग नाम की एक बच्ची विनाशकारी शक्तियों से लैस दुनिया के राष्ट्राध्यक्षों को रोज ही धरती की रक्षा का पाठ पढ़ाती दिखाई देती है. सच तो यह है कि हमारे राजनेता स्वयं ही लोकतंत्र और शुचितापूर्ण जीवन की परीक्षा में बुरी तरह विफल साबित हुए हैं. वे हमारे बच्चों को परीक्षा इत्यादि पर भला क्या ही ज्ञान देंगे? बच्चे हमारी बात शिष्टाचारवश चुपचाप सुन रहे हैं तो इसका मतलब यह कदापि नहीं निकालना चाहिए कि उन्हें हमारे बारे में कुछ भी मालूम नहीं है. वे सबकुछ जानते हैं. यही उनकी विडंबना भी है और संभावना भी.