प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-जादू है नशा है, मदहोशियां.......

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-जादू है नशा है, मदहोशियां.......


नशा किसी भी तरह का हो अच्छा नहीं होता। सत्ता का नशा सारे नशों से ऊपर होता है। पद, पावर, प्रतिष्ठा का नशा खतरनाक होता है। इसका हैंगओवर लंबे समय तक बना रहता है। श्रेष्ठता का भी अपना नशा होता है। इधर के दिनों पर पिछले दो ढाई महीने से लोगों को सिनेमा सितारों के किस्से कहानी और नशाखोरी के नाम पर इस तरह उलझाकर, भरमाकर रखा गया है कि वो किसी नशेड़ी की तरह कहने लगे हैं कि 'मुझको यारो माफ करना, मैं नशे में हूं। हमारा मीडिया इस समय ग्लैमर की दुनिया की अफीम चटाकर सबको भरमाने में लगा है। इसके पहले यह धर्म और नफरत की अफीम बांट रहा था। हुकुमरान चाहते हैं कि देश नशे में रहे चाहे वह किसी भी तरह का नशा क्यों न हो?

हमने बचपन से सरकारी स्तर पर गांजा, भांग, डोडा और शराब की दुकानों की नीलामी होते और जरूरत पडऩे पर सरकारों को इन्हें चलाते देखा है। बहुत सी सरकारों की आर्थिक सुदृढ़ता का आधार ही शराब की बिक्री रही है। यही वजह है कि लॉकडाउन के बाद यदि सबसे ज्यादा तेजी से कोई चीज खुली तो, वह थी शराब दुकानें। हमारे बहुत से साधु-संत, औघड़, पीर, औलिया अपनी चिलम में गांजा भरकर पीते दिखते हैं। भांग का गोला खाना या भांग की लस्सी पीना तो बहुत जगह परपंरा और संस्कृति का हिस्सा है। भगवान शंकर के साधक तो नशा पान करना अपना अधिकार समझते हैं। केदारनाथ की शूटिंग के दौरान सुशांत सिंह भी यह प्रसाद ग्रहण कर रहा था। अब उसके बहाने पूरी फिल्म इंडस्ट्रीज को नशेड़ी बताने की मुहिम चल रही है। दरअसल यह 'एक तरह का जादू है, नशा है, मदहोशियां  तुझको भुलाकर मैं जाउं कहां...। आपके सामने कोई विकल्प नहीं है, बैठे रहिए और देखते रहिए कब कौन सी हीरोईन किस पार्टी में गई। नारकोटिक्स विभाग को मिले फिल्मी कलाकारों के व्हाट्सअप चैट पता नहीं कैसे मीडिया को एक साथ ब्रेकिंग न्यूज के लिए मिलते जा रहे हैं? ये चैट के जरिये नशे की समस्या पर कम खबरों पर ज्यादा केंद्रित है।

इधर, पिछले कुछ दिनों से सिनेमा के सेलिब्रिटी के नशों को लेकर मीडिया हाईप है। नशे की तलब और स्वीकारता को लेकर हमारे सिनेमा में बहुत से दृश्य होते हैं। नशे को लेकर बहुत से गाने बने हैं। नशे का महिमामंडन हमारे सिनेमा में आम है। समय के साथ इसके नाम और मात्रा बदलती रहती है। सिनेमा में दिखाई जाने वाली कोई भी हाईफाई पार्टी बिना नशे, ग्लैमर के अधूरी होती है। सिनेमा के कलाकार कब अभिनय करते-करते इसका सेवन भी करने लगते हंै, इसका उन्हें पता तब चलता है, जब उन्हें इसकी लत लग जाती है। या फिर किसी सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु से उपजे विवाद के बहाने देश का ध्यान भटकाने के लिए देश की सर्वोच्च सत्ता मीडिया के साथ मिलकर अपनी एजेंसियों के जरिये इस नशे के कारोबार को किसी एक जगह फोकस करके उजागर करने पर अमादा हो जाती है। देश में जब कोरोना संक्रमण चरम पर है, देश आर्थिक मंदी से जूझ रहा है, लोगों की नौकरियां बड़ी संख्या में चली गई है, देश में जगह-जगह असंतोष है, तब हमारा मीडिया सत्ता-प्रतिष्ठानों के इशारे पर उन मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहा है, जो बहुत पहले से हमारे समाज में मौजूद है। छत्तीसगढ़ से लेकर मध्यप्रदेश, झारखंड, बिहार, उत्तरप्रदेश से लेकर पूरे देश में नशे की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। लोग नशे के लिए दवाई के रूप में मिलने वाला कफ सिरप और दूसरी गोलियां खरीदकर खाने लगे हैं। पंजाब जब पूरी तरह नशे की गिरफ्त में आया तो इसको लेकर उड़ता पंजाब जैसी फिल्म बनी। स्वयं फिल्म इंडस्ट्रीज के बहुत से कलाकार ड्रग एडिक्शन के शिकार हैं। भारत सरकार की एजेंसी एनसीबी द्वारा सुशांत सिंह राजपूत केस में की जा रही जांच में रोज-रोज, नये-नये कलाकारों के नाम नशे के कारण चर्चा में आ रहे हैं। एनसीबी को रिया चक्रवर्ती के जरिए जया साहा का पता चला था, बाद में जया साहा से पूछताछ में कई नाम सामने आने लगे। इन नामों में दीपिका पादुकोण, श्रद्धा कपूर, नम्रता शिरोडकर, रकुल प्रीत सिंह, सारा अली खान जैसे नाम आए। इनके साथ ही टैलेंट मैनेजमेंट एजेंसी क्वान का नाम भी आया है। अब इस कंपनी के साथ बॉलिवुड सुपरस्टार सलमान खान का नाम जुड़ता भी दिखाई दे रहा है। इस टैलेंट मैनेजमेंट कंपनी क्वान के साथ जया साहा और दिशा सालियान भी जुड़ी रही थीं। बवान कंपनी के मालिक मधु मांटेना हैं जो कि एक फिल्म प्रोड्यूसर भी हंै। मधु ने सुपर 30, उड़ता पंजाब, क्वीन, मसान जैसी कई हिट फिल्मों को प्रोड्यूस किया है। एनसीबी ने इस मामले में अब तक रिया और उनके भाई शोविक समेत 20 लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें सुशांत के स्टाफ के लोग और कुछ ड्रग्स पैडलर भी शामिल हैं।

फिल्म लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने कहा, जहां तक ड्रग्स का सवाल है यह समाज की दुर्भावना है। मैंने इसके बारे में केवल सुना है। मैंने अपनी आंखों से कभी ड्रग्स नहीं देखा है, लेकिन मैंने सुना है कि युवा इसका इस्तेमाल करते हैं। यह केवल फिल्म इंडस्ट्री के लिए ही नहीं बल्कि पूरे समाज की वर्तमन समस्या है।

बॉलीवुड में ड्रग्स का मुद्दा इस समय से चर्चा में आया जब कंगना रनौत ने बीते दिनों ट्विटर पर कहा था कि बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री के 99 प्रतिशत लोग ड्रग्स का इस्तेमाल करते हैं। वहीं हाल ही में अभिनेता और भाजपा सांसद रवि किशन ने भी संसद में बॉलीवुड में ड्रग्स का मुद्दा उठाया था। रवि किशन के बयान के बाद बॉलीवुड की दिग्गज अभिनेत्री और राज्यसभा सांसद जया बच्चन ने तीखी प्रतिक्रिया दी। जया बच्चन ने कहा कि कुछ लोगों की वजह से रवि किशन पूरी फिल्म इंडस्ट्री को बदनाम नहीं कर सकते। आजकल पूरी फिल्म इंडस्ट्री दो भागों में बंटी हुई है। कुछ लोगों के साथ बीजेपी खड़ी दिख रही है। मुम्बई फिल्म सिटी को टक्कर देने योगी आदित्यनाथ लखनऊ में भव्य फिल्म सिटी बनाने कलाकारों की मीटिंग ले रहे हैं। वे शायद भूल रहे हैं कि इसके पहले नोएडा में भी फिल्म सिटी बनी थी। आपदा को अवसर में बदलने की यह कोशिश कितना रंग लाती है, ये तो समय बतायेगा।

छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती ओडिशा के मलकानगिरी जिले के अंदरूनी क्षेत्र में करीब 5000 हेक्टेयर में गांजे की अवैध खेती हो रही है। यहां का गांजा तस्करी के जरिये बाहर जाता है। साल भर पहले जो गांजा तीन हजार रुपए किलो मिलता था वह अब पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश में जाकर सोने के भाव में तोले के हिसाब से बिक रहा है।

हमारे देश में पारंपरिक नशे के समय तंबाकू, अफीम, भुक्की, खैनी, सुल्फा एवं शराब आती है। वहीं सिथेंटिक ड्रग्स के रुप में स्मैक, हेरोइन, आइस, कोकीन, क्रेक कोकीन, एलएसडी, मारिजुआना, एक्टेक्सी, सिलोसाइविन मशरूम, फेनसिलेडाईन मोमोटिल, पारवनस्पास, कफ सिरप आदि मादक दवाएं आती हैं।

मादक द्रव्यों के बढ़ते हुए प्रचलन के लिये आधुनिक जीवन पद्धति और समाज में इसकी स्वीकारिता और सहाय उपलब्धि को जिम्मेदार माना जाता है। नशे की बढ़ती लत की वजह माता-पिता की अति-व्यस्तता जीवन पद्धति है, जिसमें बच्चों में अकेलापन आता है। मानसिक परेशानी के कारण भी व्यक्ति नशे की आदत डाल लेता है। बेरोजगारी नशे की और उन्मुख होने का एक प्रमुख कारण है। तनाव, अवसाद एवं मानसिक रुप से बीमार लोग नशे के आदि हो जाते हैं। बहुत सारे लोग सोचकर नशा लेते हैं कि नशा तनाव को दूर करता है। पुरानी दुखद घटनाओं को भूलने के लिए लोग नशे का सहारा लेते हैं। लोग सोचते हैं कि ड्रग्स लेने से वे फिट एवं तंदुरुस्त रहेंगे, विशेषकर खिलाड़ी इसी कारण मादक द्रव्यों की चपेट में आ जाते हैं।

कई तरह के नशे से होने वाली तबाही के आंकड़े बहुत ही भयावह हंै। ग्लोबल एडल्ड टोबेको सर्वे आफ इंडिया की रिपोर्ट बहुत ही चौंकाने वाली है। भारत में तंबाकू के द्रव्यों का सेवन करने वालों में खैनी का प्रयोग सबसे ज्यादा किया जाता है। करीब 13 फीसदी लोग इसका सेवन करते हैं। 2009-10 के सर्वे के अनुसार, भारत में तब 12 करोड़ लोग तंबाकू का सेवन कर रहे थे। अपराध ब्यूरो रिकार्ड के अनुसार बड़े-छोटे अपराधों, बलात्कार, हत्या, लूट, डकैती, राहजनी आदि तमाम तरह की वारदातों में नशे के सेवन का मामला लगभग 73.5 फीसदी तक है, और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध में तो ये दर 87 फीसदी तक पहुंची हुई है। 2014 में नारकोटिक्स ड्रग्स एक्ट के तहत 43,290 केस दर्ज किए गए, जिसमें सबसे अधिक पंजाब में 16,821, उत्तरप्रदेश में 6,180, महाराष्ट्र में 5,989, तमिलनाड में 1,812, राजस्थान में 1,337, मध्यप्रदेश में 1,027 तथा सबसे कम गुजरात में 73, गोवा में 61 तथा सिक्किम में 10 केस दर्ज किए गए।

हमारे स्कूल, कालेज बुरी तरह से नशे की गिरफ्त में हंै। छोटे शहरों में जहां गांजा, भांग, शराब का नशा आम है तो वहीं बड़े शहर में हेरोइन और ब्राउन शुगर जैसे नशें का चलन है। हुक्का बार के जरिये भी हमारे युवा बहुत सा नशा करते हैं। हाल ही में किये गये एक सर्वे में नशाखोरी का 65 प्रतिशत युवाओं में है।

हमारे देश में संविधान के अनुच्छेद-47 के अनुसार चिकित्सकीय प्रयोग के अतिरिक्त स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पदार्थ व वस्तुओं के उपयोग को निषिद्ध करने के लिए 1985 में नशीली दवाएं व मनोविकारी पदार्थ कानून एनडीपीएस एक्ट बनाया गया। नशे के बढ़ते कारोबार को रोकने में सभी सरकारें लगभग फेल रही हैं। नशे से जुड़े लोगों पर तभी शिकंजा कसा जाता है, जब वे सरकार की आंखो में खटकने लगते हैं। यदि जिस तरह से सुशांत सिंह राजपूत प्रकरण के बाद नशे को लेकर जो कार्यवाही की जा रही है। यह कार्यवाही कम मीडिया में ऐसी खबरों को सनसनीखेज बनाये रखने की कार्यवाही अधिक है। यदि हमें युवाओं में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को रोकना है, तो मुंहदेखी या किसी अवसर विशेष या समूह विशेष को देखकर नहीं बल्कि समग्रता में इस बारे में सोचकर कार्यवाही करने की जरूरत है।