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II प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की गुरू-पूर्णिमा पर केंद्रित विशेष टिप्पणी : गुरू और गुरूघंटालों का स्मरण

II प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की गुरू-पूर्णिमा पर केंद्रित विशेष टिप्पणी : गुरू और गुरूघंटालों का स्मरण
  • गुरू और गुरूघंटालों का स्मरण


    सुभाष मिश्र

यह ऑनलाइन गुरूओं का समय है। कोरोना संक्रमण के चलते अभी स्कूल कॉलेज, आश्रम, कोचिंग इंस्टीट्यूट और सभी तरह के प्रशिक्षण की संस्थाएं, रिहर्सल सब कुछ बंद है। जो कुछ है, वो सब वर्चुअल है। पिछले एक दो दशक में गूगल बाबा ने बहुत सारे गुरूओं का स्थान ले लिया है। अब ज्ञान प्राप्ति के लिए आपके हाथ में मोबाइल के जरिये व्हाट्अप यूर्निवसिटी, ऑनलाइन ज्ञान बांटने वाले गुरूओं की लंबी फेहरिस्त है। टाटा स्काई जैसे बहुत सारे डीटीएच प्लेटफार्म पर घर बैठे-बैठे खाना बनाने से लेकर अंग्रेजी सीखने, योग सीखने, डॉस, म्युजिक आदि सीखने की सुविधा उपलब्ध है। किसी भी एक लक्ष्य को अब गुरू द्रोणाचार्य से धनुरविद्या सीखने के लिए अंगूठा कटवाने की जरूरत नहीं है। आप अब नहीं कह सकते कि बिन गुरू ज्ञान कहां से पाऊं। 'गुरूपूर्णिमा' के अवसर पर अपने गुरूओं के साथ-साथ बहुत सारे गुरूघंटालों को भी याद करने का समय है। आधुनिक समय के विद्यार्थी को अब किसी प्रकार का संशय इस तरह का नहीं है जैसा पहले था कि:

गुरू गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पांव,
बलिहारी गुरू आपनी जिन गोविंद दियो बताए।


ऐसा कहा जाता है कि पहले गुरू आपके माता-पिता होते हैं जिनसे आप जाने-अजाने बहुत कुछ सीखते हैं। उनका डीएनए आपके भीतर होता है, जो आपसे बहुत कुछ करवाता है, बहुत कुछ आपके भीतर छोड़ जाता है। हम सबके भीतर अपने माता-पिता के जरिये अपने पुरखों की एक लंबी परंपरा, बोली, भाषा, खान-पान, कदकाठी सब कुछ आता है। माता-पिता के अलावा हम अपने परिवेश, आसपास, दोस्त—यारों से भी बहुत कुछ सीखते हैं। दोस्तयार हमें व्यवहारिक और अब तक रहस्यमयी बनी दुनिया से बाहर लाकर यथार्थ के जमीन पर सीधा खड़ा कर देते हैं। हम अपने दोस्तों से वो गालियों, वो बातें सीखते हैं जिसे और कोई नहीं सीखा सकता। मनोवैज्ञानिक का कहना है कि हमारे बचपन की बातों का सर्वाधिक प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है। जिनका बचपन जिस तरह के सुरक्षित, असुरक्षित वातावरण परिस्थिति में गुजरता है, उसकी छाया जीवन भर साथ होती है। हमारी बोली, भाषा उसके उच्चारण से बहुत बार लोग समझ जाते हैं कि हम किस क्षेत्र विशेष के रहने वाले हैं। बहुत सारे माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा अभिमन्यु की तरह गर्भ में रहते ही बहुत कुछ सीख जाए। वैज्ञानिक सोच और आसपास से अर्जित ज्ञान से बहुत सी माताएं गर्भावस्था में कला, साहित्य, संगीत आदि से अपने को जोड़े रखती हैं ताकि उनके गर्भस्थ शिशु पर उसका सही प्रभाव पढ़े।

हम सबके व्यक्तित्व पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है हमारी स्कूली शिक्षा और वहां पढ़ाने वाले हमारे गुरूओं का। किशोरावस्था आते-आते तक हमारे टीचर ही हमारे मॉडल होते हैं। जैसे-जैसे हमारी समझ, हमारा दायरा और दुनिया को देखने, समझने का अनुभव बढ़ता है, हमारे आदर्श भी बदलते हैं। हमारे आदर्श गढ़ने में हमारी फिल्में, हमारा साहित्य और हमारे आसपास फैली बहुत सी साहसिक कथाएं, चरित्र भी हमारे सहयोगी होते हैं। हमारे मॉडल समय के साथ बनते बिगड़ते हैं। बशीर बद्र का एक शेर है-
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिसको भी देखना, कई बार देखना।




गुरू पूर्णिमा के अवसर पर यदि हम इस गुरू—शिष्य परंपरा की बात करें तो हमें पता चलता है कि भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत गुरु (शिक्षक) अपने शिष्य को शिक्षा देता है या कोई विद्या सिखाता है। बाद में वही शिष्य गुरु के रूप में दूसरों को शिक्षा देता है। यही क्रम चलता जाता है। यह परम्परा सनातन धर्म की सभी धाराओं में मिलती है। गुरु-शिष्य की यह परम्परा अध्यात्म, संगीत, कला, वेदाध्ययन, वास्तु आदि। सभी क्षेत्रों में हो सकती है। भारतीय संस्कृति में गुरु को 'ब्रह्मा-विष्णु-महेश कहा गया है तो कहीं 'गोविन्द कहा गया है। गुरूओं को पांच श्रेणियों में बांटा गया है जिनमें गु' शब्द का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और रू' शब्द का अर्थ है प्रकाश ज्ञान। अज्ञान को नष्ट करने वाला जो ब्रह्म रूप प्रकाश है, वह गुरु है। पांच तरह के गुरूओं के बारे में बताया जाता है। 1.शिक्षक - जो स्कूलों में शिक्षा देता है। 2.आचार्य - जो अपने आचरण से शिक्षा देता है। 3.कुलगुरु - जो वर्णाश्रम धर्म के अनुसार संस्कार ज्ञान देता है। 4.दीक्षा गुरु- जो परम्परा का अनुसरण करते हुए अपने गुरु के आदेश पर आध्यात्मिक उन्नति के लिए मंत्र दीक्षा देते हैं। 5. गुरु- वास्तव में यह शब्द समर्थ गुरु अथवा परम गुरु के लिए आया है। गुरु और शिष्य के बीच केवल शाब्दिक ज्ञान का ही आदान—प्रदान नहीं होता था बल्कि गुरु अपने शिष्य के संरक्षक के रूप में भी कार्य करता था।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण जी ने गुरु-शिष्य परम्परा को 'परम्पराप्राप्तम योग बताया है। गुरु-शिष्य परम्परा का आधार सांसारिक ज्ञान से शुरू होता है, परन्तु इसका चरमोत्कर्ष आध्यात्मिक शाश्वत आनंद की प्राप्ति है जिसे ईश्वर-प्राप्ति व मोक्ष प्राप्ति भी कहा जाता है। भागवत गीता में कहा गया है कि जीवन को सुंदर बनाना, निष्काम और निर्दोष करना ही सबसे बड़ी विद्या है। इस विद्या को सिखाने वाला ही सद्गुरु कहलाता है। हमारी गुरूपूर्णिमा की परंपरा में चार वेदों और महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में यह पर्व मनाया जाता है। हमारी ज्ञान परंपरा और तार्किकता कहती है कि चाहे हमारे वेद-पुराण हों या महाभारत जैसे महाकाव्य, इसकी रचना किसी एक व्यक्ति ने नही की। चूंकि वेदव्यास इसके प्रमुख लेखक रहे हैं और हमारे वेद और महाभारत की कथाओं का हमारे जीवन में बहुत गहरा प्रभाव है इसलिए हम उन्हें गुरू के स्थान पर रखते हैं। हमारे देश में धार्मिक पुस्तकें पढ़ऩे में कम, पूजा के ज्यादा काम आती है। धर्म हमारी जीवन पद्धति और हमारी आस्था, विश्वास में इतने गहरे तक समाहित है कि हमें बहुत सारे गुरूघंटालों ने अभी तक धर्म के नाम पर ही छला है। फर्जी बाबाओं के प्रभाव, आभामंडल और उसके बाद परत-दर खुलते उनके कारनामों से परेशान होकर अखाड़ा परिषद इलाहाबाद ने बकायदा 14 बाबाओं को फर्जी करार देकर उनकी आलोचना की।

बहुतों के लिए आज गुरू महाराज, गुरू मां का दर्जा रखने वाले इन बाबाओं और राधे मां जैसी माताओं में अगाध श्रद्धा है। लोगों को धर्म के नाम पर, अंधविश्वास, चमत्कार के नाम पर सदियों से बेवकूफ बना रहे गुरूघंटालों की लंबी परंपरा रही है। आशाराम बापू से लेकर राधे मां, गुरमीत राम रहीम, आशीष नंदे, नारायण स्वामी, ओम स्वामी, निर्मल बाबा, धीमानंद महाराज, बृहस्पिति गिरी, रामपाल जैसे बहुत से नाम हैं। हमारे टीवी चैनलों पर रात में 12 बजे के बाद ऐसे चमत्कारी बाबाओं, गुरूओं के तरह-तरह के नुस्खे देखने, सुनने मिलते हैं। बहुत सारे आधुनिक गुरू, प्रवचनकार, बाबा स्वामी लोगों के पास गजब की वाक शक्ति होती है। वे अपने आपको मंत्र की सिद्धी वाला बताते हैं। लाइट, म्युजिक और रंगों के माध्यम से वे अपने आसपास ऐसा आभामंडल रचते हैं कि सामान्य आदमी, जिसमें औरतों की संख्या अधिक होती है, अभिभूत होकर उनके श्रीचरणों में पहुंच जाता है। मीडिया के जरिये हमारे बहुत से नेता भी आजकल इसी तरह का आभामंडल रचकर बड़ी संख्या में अपनी भक्त मंडली तैयार कर रहे हैं। ऐसे तमाम लोग जो भी करते हैं, उनके कहे अनुसार वे सब दूसरों की भलाई के लिए करते हैं। ऐसे तमाम गुरूघंटालों को भी गुरूपूर्णिमा पर याद करके उनसे सतर्क रहकर, दो गज की दूरी बनाए रखना जरूरी है। ये कोरोना वायरस से भी ज्यादा खतरनाक हैं। इनके द्वारा सदियों से फैलाया जा रहा संक्रमण समाज का बहुत अहित कर चुका है।

गुरू पूर्णिमा के अवसर पर हमें तमाम चमत्कारिक, वाकपुट, धार्मिक चाशनी में लपेटकर अपनी बात कहने वाले गुरूओं की पहचान करके उनसे उसी तरह की सोशल डिस्टेसिंग बनाने की जरूरत है, जैसी हम कोरोना से बचने के लिए इन दिनों बना रहे हैं। हमें कोरोना वारियर्स की तरह उन गुरूओं की याद रखनी होगी, जो हमें अपने ज्ञान, अपने अनुभव और अपने जीवन संघर्ष से हमारे बेहतर मनुष्य के साथ बेहतर दुनिया बनाने में मदद करते हैं। वे गुरू कोई भी हो सकते हैं, चाहे संत कबीर दास हों, महात्मा गांधी हों या स्वामी विवेकानंद। शहीद भगतसिंह हों या अब्दुल कलाम आजाद। हरिशंकर परसाई हों या विनोद शंकर शुक्ल. ऐसे गुरू हमें किताबों के जरिये, अपने काम के जरिये, अपने आचरण के जरिये बहुत कुछ सिखा जाते हैं। यह समय गुरूओं और गुरूघंटालों में फर्क को समझने का है। अच्छे—बुरे की समझ सीखने वाले, बेहतर दुनिया का ख्वाब दिखाने वाले सभी गुरूओं को नमन।

लेखक दैनिक आज की जनधारा तथा वेब मीडिया हाउस के प्रधान संपादक हैं