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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - संत परंपरा और छत्तीसगढ़

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - संत परंपरा और छत्तीसगढ़

-सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक संत परंपरा पर आज से संस्कृति विभाग दो दिवसीय शोध संगोष्ठी आयोजित करने जा रहा है। हमारे देश में संत परंपरा, गुरु परंपरा का लंबा इतिहास है। हमारे समाज में जो धर्मगुरू, संत हुए हैं उन्होंने जनहित में धर्म सिद्धांत, सामाजिक सिद्धांत प्रतिपादित किए, किन्तु कालांतर में उनके अनुयायियों ने इसे कर्मकांड में तब्दील करके भौतिक और आर्थिक लाभ कमाने अनुयायियों के नाम पर अपनी ताकत बढ़ाने का माध्यम बना लिया। जैसे ही किसी धर्म, संप्रदाय के साथ कर्मकांड जुड़ते हैं तो वहां अर्थतंत्र काम करने लगता है। जिन लोगों ने मूर्तिपूजा, कर्मकांड का विरोध किया कालांतर में उनके नाम पर जगह-जगह उनकी मूर्ति और उनके नाम पर कर्मकांड होने लगे। धीरे-धीरे हो रहे इस अवमूल्यन ने संत परंपरा और धर्म की आध्यात्मिक ताकत को कम किया है। धर्म ध्वजा फहराने के नाम पर जगह-जगह अपनी ताकत का प्रदर्शन अतिक्रमण आम बात सी हो गई है। तेलंग स्वामी, फिनारामजी समर्थ, गुरुरामदास, शिरर्डी के सांईबाबा जैसे बहुत से संत हुए हैं। इनमें से अधिकांश संतों की परंपरा इनके अनुनायी वो सब कर रहे हैं जिसके ये संत विरोधी थे। हमारे अधिकांश संत समाज के वंचित वर्ग से आये हैं जिन्होंने अपने समय के अत्याचार, विसंगति और अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद की। कबीर, नानक, रैदास, संत ज्ञानेश्वर, संत नामदेव, सूरदास, तुलसीदास इसी परंपरा के संत हैं।

सवा दो करोड़ से अधिक की आबादी वाले छत्तीसगढ़ राज्य में संतों की परंपरा का लंबा इतिहास है। यहाँ संत गुरु घासीदास, संत कबीर, महाप्रभु वल्लभाचार्य, भक्त माता कर्मा के अनुयायियों की बहुत बड़ी संख्या है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, लोक गीतों में संतों की वाणी का समावेश हमेशा से रहा है। छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध पंथीगीत और नृत्य पूरी तरह से संत गुरु घासीदास को समर्पित एक प्रार्थना है। पंथी नृत्य के दौरान गाये जाने वाले गीतों के माध्यम से गुरुजी का संदेश को दोहराया जाता है-
जैतखाम के पुजारी, सतनाम के पुजारी
बना ले बाबा तोर नाम के पुजारी
भाव भक्ति ला मैं नई जानवँ
 मैं हौं अपढ़ अनाड़ी
बना ले बाबा तोर नाम के पुजारी

गुरु घासीदास का जन्म छत्तीसगढ़ की पावन धरती गिरौदपुरी में हुआ। उन्होंने छत्तीसगढ़ को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। उन्होंने तात्कालिक हिंदू धर्म की बुनियादी मान्यताओं को चुनौती दी और धर्म के ऐसे सीधे, सरल सिद्धांतों को बताया जो आम आदमी आसानी से समझ सके और अपने जीवन में अपना सके। यही वजह है कि सतनाम पंथ गरीब, ग्रामीण, खेतिहर, मजदूरों, गरीब किसानों, शोषित, दलित में बहुत लोकप्रिय हुआ और उन्होंने इसे अपने जीवन में उतारा। उन्होंने शराब पीना, मांस खाना, धूम्रपान करना जैसी बातों के लिए मना किया। जिसे सतनाम को अपनाने वालों ने स्वीकारा। छत्तीसगढ़ के सतनामी समाज की भावना का सम्मान करते हुए गिरौदपुरी में देश के सबसे ऊंचे जैतखाम का निर्माण किया गया है।

छत्तीसगढ़ में जहाँ एक ओर संत गुरु घासीदास के मानने वाले बड़ी संख्या में हैं वहीं दूसरी ओर आज से 600 साल पहले जन्मे संत कबीर को मानने वाला बड़ा वर्ग भी यहाँ है। कबीर पंथी कहलाने वाले समुदाय का दामाखेड़ा बड़ा तीर्थ स्थल है। संत कबीर को मानने वालों की तादाद को देखते हुए कवर्धा जिले का नाम कबीरधाम किया गया है। चाहे गुरु घासीदास हों या संत कबीर या फिर गहिरा गुरु सभी संतों में सामाजिक सुधार की बेचैनी थी। संतों के रास्ते अलग-अलग थे किंतु उद्देश्य एक था समाज सुधार। छत्तीसगढ़ की भूमि जिसे दक्षिण कौशल या माँ कौशल्या की जन्मभूमि के नाम से भी जाना जाता है, हमेशा से ही बहुत शांत और मनोरम स्थान रहा है। अपनी प्राकृतिक छटा घने वनों और यहाँ बसने वाले सीधे-सादे मेहनतकश लोगों की वजह से वह स्थान सभी को आकर्षित करता रहा है। वल्लभ संप्रदाय के गुरु महाप्रभुवल्लभाचार्य की जन्मस्थली होने का गौरव भी यहाँ की भूमि को मिला है। चंपारण जहाँ महाप्रभु वल्लभाचार्य जी का जन्म हुआ था वहाँ हजारों श्रद्धालु देश-विदेश से प्रतिवर्ष आते हैं। छत्तीसगढ़ का प्रयाग समझे जाने वाले राजिम में जहाँ तीन नदियों महानदी, सेंदूर और पैरीनदी का त्रिवेणी संगम है, राजीव लोचन का मंदिर हजारों सालों से जन-आकर्षण और श्रद्धा का केंद्र रहा है। पूरी दुनिया को शांति का पाठ पढ़ाने वाले गौतम बुद्ध का भी गहरा रिश्ता छत्तीसगढ़ से रहा है। सिरपुर में पुरातत्त्व विभाग द्वारा कराये गए उत्खनन से यह बात उभरकर सामने आई है। छत्तीसगढ़ में समाज सुधारकों के प्रभाव और लंबी परंपरा के रूप में सरगुजा के नजदीक गहिरा गुरु जैसे समाज सुधारक का आश्रम और उसके माध्यम से आधुनिक ज्ञान की शिक्षा लेते सैकड़ों वनवासी लड़के-लड़कियाँ दिखलाई पड़ते हैं। वहीं गायत्री शक्तिपीठ की बहुत सी शाखाएँ छत्तीसगढ़ में अपने ढंग से अलग-अलग स्थानों पर समाज सेवा के कार्य में लगी दिखती हैं।
आध्यात्मिक महापुरुषों के प्रभावशाली इस छत्तीसगढ़ की जमीन पर एक ओर जहां शदाणी दरबार है वहीं दूसरी ओर विवेकानंद आश्रम जैसी संस्थाएँ हैं जिसके माध्यम से स्वामी आत्मानंद जैसे समाज सुधारकों ने यहाँ के समाज जीवन में तब्दीली लाने के लिए बहुत काम किया। पंडित सुंदरलाल शर्मा जैसे लोगों ने अछूत जैसी सामाजिक बुराई के खिलाफ अछूतोद्धार जैसे कार्य की सबसे पहले शुरुआत की। दाऊ रामचंद्र देशमुख ने रंगमंच को अपना माध्यम बनाकर छत्तीसगढ़ में सामाजिक चेतना की अलख जगाई। मिनीमाता, खूबचंद बघेल जैसे बहुत से समाज सुधारकों ने यथार्थ की जमीन पर खड़े होकर अपने समय के सच का सामना करते हुए जनचेतना के लिए काम किया। मजदूरों के बीच किसी देवता की तरह समझे जाने वाले शहीद शंकर गुहा नियोगी ने भी छत्तीसगढ़ को अपनी कर्मभूमि बनाकर यहाँ के श्रमिकों, मजदूरों के जीवन में सुधार लाने के लिए बड़ा आंदोलन चलाया। शराब जैसी सामाजिक बुराई से श्रमिकों को दूर रखा।

चाहे गुरु घासीदास हों या फिर संत कबीर या महाप्रभुवल्लभाचार्य सभी ने अपने संदेशों, व्यवहार और कार्यों के माध्यम से अपने समय की विसंगतियों की ओर ध्यान दिलाया और समाज को इनसे दूर रखने की कोशिश की। छत्तीसगढ़ में रहने वाला रामनामी संप्रदाय से जुड़ा व्यक्ति अपने पूरे शरीर में रामनाम के गुदने गुदाता चला आ रहा है। मिट्टी से अपने जुड़ाव की वजह से रामनामी समुदाय के लोग हिंदू होने के बावजूद मृतक का शव जलाते नहीं उसे मिट्टी में गाड़ देते हैं ताकि पंचतत्वों से बनी यह देह उसी मिट्टी में समाहित हो जाए जिससे उसका निर्माण हुआ था। जीवन से मरण तक पूरे शरीर में रामनाम गुदवाने वाले लोग चुपचाप राममय रहते हैं उन्होंने बार-बार जय सियाराम चिल्लाकर यह बताने की कोशिश कभी नहीं की उनसे बड़ा रामभक्त दूसरा कोई नहीं। साधु-संतों, समाज सुधारकों की दीर्घकालिक परंपरा से संचालित होने वाले यहाँ के जनजीवन में अब धीरे- धीरे इलेक्ट्रानिक मीडिया के विस्तार और उससे प्रकट होने वाले धार्मिक प्रवचनकारों, धार्मिक नेताओं और धर्म के नाम पर होने वाली ऊल-जलूल बातों ने बेचैनी पैदा कर दी है। ऐसे प्रवचनकार, धार्मिक नेता जिनका समाज सुधार जैसे जीवन मूल्यों से सीधा कोई रिश्ता होता है, उनकी उपस्थिति और वक्तयों से कई बार समाज में उत्तेजना पैदा होने लगती है।

धर्म की व्याख्या अपनी सुविधा और समय को देखकर करने वाले बहुत से नए प्रभु पैदा हो गए हैं। नए धर्मगुरुओं और धर्म पर प्रवचन देने वालों और धर्म की बहुत ज्यादा दुहाई देने वालों का श्रम से कोई सीधा रिश्ता नहीं है। आकाश मार्ग से आने वाली तरंगों सेटेलाइट के जरिये लोगों के घरों में घुसपैठ करने वाले इन नए धर्माचार्यों का अपना कोई मौलिक चिंतन नहीं है। टीवी चैनलों के माध्यम से सुबह-सुबह लोगों को अध्यात्म और धर्म का रास्ता बताने वाले नए दौर के साधु और धर्म की दुहाई देने वाले नए समय के धार्मिक नेता धर्म का व्यापार बखूबी कर रहे हैं। धर्म इनके लिए धंधा है। ऐसा धंधा जिसमें घाटे की दूर-दूर तक कोई गुंजाइश नहीं। धर्म की सत्ता के चलते बहुत से प्रवचनकार, मीडियाकार, धार्मिक नेता बहुत ही पावर फुल हो गए हैं। आधुनिक संतों की सत्ता का यह नया दौर है। जहां राजनीति और धर्म दोनों का कॉकटेल खूब नशा और मज़ा दे रहा है। और इस कॉकटेल की खुमारी पूरे देश पर चढ़ाई जा रही है। साधु-संत अब राजनीतिक मसले सुलझाने लगे हैं। राजनीतिक बयानबाजियों से इन्हें कोई गुरेज नहीं है। मार्केटिंग की नई-नई तकनीक से लैस ये नए साधु-संत, धार्मिक नेता बाकायदा जनसंपर्क एजेंसियों की मदद से अपना प्रचार अभियान चलाते हैं। बड़े उद्योगपतियों, सेठ, साहूकारों, नेताओं का आतिथ्य स्वीकारते हैं, उनके खास मेहमान बनकर उन सभी सुख-सुविधाओं का उपभोग करते हैं जिन्हें अपने प्रवचन, भाषण में भोग विलास की वस्तु बताते नहीं थकते। पता नहीं क्यों कुंभनदास जैसे कवि समाज सुधारक संत को यह बात क्यों नहीं समझ में आई। वे नाहक ही कह गए-
संतन को कहा सीकरी सों काम,
आवत जात पनहियाँ टूटी बिसरि गयो हरिनाम
जिनके मुख देखत घिन उपजत तिनको करिबे परी सलाम।