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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-सबके अपने-अपने राम

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-सबके अपने-अपने राम



भारतीय जनमानस की धार्मिक आस्था, विश्वासों और विशेषकर सर्वव्यापी राम की मौजूदगी को लेकर सभी राजनीतिक पार्टियां समवेद स्वर में रामनाम धुन बजा रही हैं। कभी धर्मनिरपेक्षता का झंडा लेकर चलने वाली कांग्रेस हो या दलित वोटों की राजनीति करने वाली मायावती हो या समाजवादी तेवर के साथ मुस्लिम-यादव वोट बैंक की चिंता करने वाली समाजवादी पार्टी। भाजपा तो राम पर अपना कॉपीराईट मानकर चलती है। कांग्रेस को आज याद दिलाना पड़ रहा है कि राजीव गांधी ने राममंदिर का ताला खुलवाया था। नरसिंहाराव की अनदेखी और मौन समर्थन की वजह से ही कार सेवकों के हौसले बुलंद हुए थे और उन्होंने बाबरी मस्जिद गिराई थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंचालक मोहन भागवत के साथ अयोध्या में भव्य राममंदिर निर्माण की शिलाएं स्थापित कर दी। उम्मीद की जा रही है कि अयोध्या के रास्ते पूरे देश में रामराज्य जल्दी आएगा। हम सब गोस्वामी तुलसीदास की तरह कह सकेंगे दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।

भगवा रंग से रंगी अयोध्या नगरी में आयोजित शिलान्यास समारोह का मूल थीम ही हिन्दुत्व वाला भगवा रंग था। कोरोना संक्रमण के चलते अधिकतर साधु-संत ही समारोह में मौजूद थे। अपनी वेशभूषा के प्रति अतिरिक्त रूप से सजग देश के प्रधानमंत्री भी आज समयानुकूल वेशभूषा में शोभायमान थे। पूरे देश में आज राममंदिर को लेकर जिस तरह का उत्साह प्रतिक्रिया देखी गई वो आने वाले समय में भारतीय राजनीति में एक निर्णायक घटना साबित हो सकती है। राम मंदिर को मिले बहुसंख्यकों के समर्थन और उत्साह के कारण सारी राजनीतिक पार्टियां जो दबे-छिपे धर्म की बात करती है आज खुलकर समर्थन के लिए विवश दिख रही है।

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को अयोध्या के विकास के साथ जोड़ा जा रहा है। हमारे देश के सारे प्रमुख धार्मिक स्थल चाहे वो तिरूपति हो, शिर्डी हो, उज्जैन हो, मथुरा हो, काशी हो, रामेश्वर हो, प्रयागराज हो, इलाहाबाद हो चाहे समूची देवभूमि उत्तराखंड ही क्यों न हो वहां किस तरह का विकास हुआ है, ये किसी से छिपा नहीं है। केवल मंदिर के आसपास कुछ बाजार, सड़कों और अधिकतम एयरपोर्ट, रेल्वे स्टेशन, कुछ होटलें, कुछ धर्मशाला। ये किसी भी जगह के सर्वांगीण विकास के प्रतिमान नहीं है। भगवान राम की जन्मस्थली अयोध्या, केवल राममंदिर बन जाने से विकसित हो जाये, लोग श्रद्धा भाव से आयेंगे तो क्या इसके पहले के सालों में यहां विकास क्यों नहीं हुआ? आजादी के बाद भाजपा के उत्तरप्रदेश के शासन काल में अयोध्या का विकास क्यों नहीं हुआ? जो भाजपा राम का नाम लेकर उत्तरप्रदेश से लेकर देश की सत्ता पर काबिज हो गई, उसे इतने सालों से रामजन्मभूमि अयोध्या के विकास की याद क्यों नहीं आई। ऐसी ही याद मायावती, मुलायम सिंह, अखिलेश यादव को भी नहीं आई। अब प्रधानमंत्री के शिलान्यास के बाद तीन-चार साल में बनने वाले राम मंदिर से अयोध्या का समूचा विकास, रोजगार के अवसर कैसे सृजित हो जायेंगे?

बहुसंख्यक हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण रोकने के लिए आज हमारे देश की सभी राजनीतिक पार्टियां अपने एजेंडे में धार्मिक आस्थाओं और विश्वासों, स्थलों, तीज-त्यौहारों को प्रमुखता दे रही है। राजनीतिक पार्टियां मिथकों के सहारे धर्म की ध्वजा को फहराना चाहती है। वे जानती हैं कि आस्था हमेशा तर्क से ज्यादा बड़ी होती है। भारतीय जनमानस को धर्म के आधार पर बहलाया-फुसलाया जा सकता है। मेरे सपनों का भारत में महात्मा गांधी कहते हैं कि 'हिन्दू मुस्लिम एकता और अहिंसक उपायों अर्थात विशुद्ध आत्मत्याग के जरिए सच्ची स्वाधीनता और आत्माभिव्यक्ति हासिल करके भारत वर्तमान अंधकार से बाहर निकलने का मार्ग दिखा सकता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज शिलायान्स भाषण में कहा कि राम हमारे मन में गढ़े हुए हैं, हमारे भीतर घुल-मिल गए हैं। कोई काम करना हो, तो प्रेरणा के लिए हम भगवान राम की ओर ही देखते हैं। राम आज भी हमारे मन में बसे हैं, हमारी संस्कृति का आधार हैं। राम मंदिर हमारी संस्कृति का आधुनिक प्रतीक बनेगा, हमारी शाश्वत आस्था का प्रतीक बनेगा, हमारी राष्ट्रीय भावना का प्रतीक बनेगा और ये मंदिर करोड़ों-करोड़ लोगों की सामूहिक संकल्प शक्ति का भी प्रतीक बनेगा। इस मंदिर के बनने के बाद अयोध्या की सिर्फ भव्यता ही नहीं बढ़ेगी, इस क्षेत्र का पूरा अर्थतंत्र भी बदल जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। हमने तब भी देखा था कि कैसे सभी देशवासियों ने शांति के साथ, सभी की भावनाओं का ध्यान रखते हुए व्यवहार किया था। आज भी हम हर तरफ वही मर्यादा देख रहे हैं। प्रधानमंत्री की बातों पर यकीन करें तो आने वाले दिनों में अयोध्या में बड़े पैमाने पर ऐसे काम होंगे जो वहां के अर्थतंत्र को बदलेगा।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन राव भागवत ने कहा, आज पूरे देश में आनंद की लहर है। सदियों की आस पूरे होने का आनंद ही सबसे बड़ा आनंद है। जैसे-जैसे मंदिर बनेगा, राम की अयोध्या भी बननी चाहिए। हमारे मन में मंदिर बनना चाहिए और कपट को छोडऩा चाहिए। भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जिस आत्मविश्वास की आवश्यकता थी। जिस आत्मभान की आवश्यकता थी उसका भी शुभारंभ हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट से निर्णय आने के बाद भाजपा और उससे जुड़े संगठनों ने जिस तरह से मंदिर निर्माण को लेकर रणनीति बनाई और इसे अपने एजेंडे के अनुसार हिंदू आस्था के साथ जोड़ा, उससे सारे राजनीतिक दल भौंचक होकर राम की शरण में जाने को मजबूर हो गए हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा कि राम-मंदिर निर्माण की नींव रखी जा रही है, जिसका काफी कुछ श्रेय सुप्रीम कोर्ट को ही जाता है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने राम मंदिर को लेकर कहा- मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम सर्वोत्तम मानवीय गुणों का स्वरूप हैं। वे हमारे मन की गहराइयों में बसी मानवता की मूल भावना हैं। राम प्रेम हैं, वे कभी घृणा में प्रकट नहीं हो सकते, राम करुणा हैं। राम न्याय हैं, वे कभी अन्याय में प्रकट नहीं हो सकते। छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल ने कहा, जय सिया राम। भगवान राम की जन्मभूमि को कर्मभूमि छत्तीसगढ़ की ओर से सादर प्रणाम। राम सबका भला करें। हमें पुरुषोत्तम के आदर्शों का पालन करने की शक्ति दें। शिवसेना प्रमुख उद्धव बालासाहेब ठाकरे ने अयोध्या यात्रा के दौरान शिवसेना पार्टी की ओर से राममंदिर निर्माण में 1 करोड़ रुपए का योगदान देने का संकल्प किया था। यह 1 करोड़ की संकल्प राशि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट में 27 जुलाई को आरटीजीएस कर दी गई है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि भगवान राम का आशीर्वाद हम पर बना रहे। उनके आशीर्वाद से हमारे देश को भुखमरी, अशिक्षा और गऱीबी से मुक्ति मिले और भारत दुनिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बने। आने वाले समय में भारत दुनिया को दिशा दे। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने ट्वीट कर कहा कि वर्तमान व भविष्य की पीढ़ी भी मर्यादा पुरूषोत्तम के दिखाए मार्ग के अनुरूप सच्चे मन से सबकी भलाई व शांति के लिए मर्यादा का पालन करेंगी। वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) ने इस कार्यक्रम को एक खुशी का पल बताया। कहा राज्यसभा में शिवसेना के सांसद संजय राउत ने ट्वीट किया, 'बाला साहेब का सपना साकार।

सवाल यह है कि क्या राममंदिर बन जाने के बाद रामनवमीं के जुलूसों में जिस तरह से उन्माद की शक्ति का प्रदर्शन होता है, वह मर्यादित हो पायेगा। क्या नई पीढ़ी को राजनीतिक राम वाले हिंसक प्रतीकों से जोडऩे की बजाय आध्यात्मिक राम, सबके राम से जोडऩे के लिए प्रेरित किया जायेगा। क्या राजनीतिक दल इसके बाद मथुरा काशी के मंदिरों का मसला वो नहीं उठायेंगे। वो लोग जो अभी भी बाबरी मस्जिद की बात कह रहे हैं वक्त की नजाकत और शांति सद्भाव के लिए कोर्ट के फैसले का सम्मान करेंगे। क्या तुलसी, कबीर, रहीम, गुरूनानक की परंपरा में यह कहने का साहस हमारे राजनीतिक दल कर पायेंगे कि-
राम रहीमा एकै है रे काहे करौ लड़ाई
या फिर-
राम रहीमा एक है, नाम धराया दोई
कहे कबीर दुइ नाम सुनि, भरम परो मत कोई