breaking news New

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - नमस्ते ट्रंप

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - नमस्ते ट्रंप

-सुभाष मिश्र

अमेरिका के व्हाईट हाउस से अंतत: डोनाल्ड ट्रंप की बिदाई हो गई। दो महाअभियोग और बहुत से आरोप-प्रत्यारोप, बड़बोलेपन से जुड़े ट्रंप के समर्थकों ने उन्हें बनाए रखने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। अमेरिका को दुनिया का सबसे पुराना गणतंत्रिक राष्ट्र, सिरमौर समझा जाता है, किन्तु वहां व्यप्त बहुत सी विसंगतियां बताती है कि बामुश्किल अमेरिका के जनतांत्रिक इतिहास में पहली बार कोई महिला उपराष्ट्रपति के रूप में व्हाइट हाउस पहुंची है। इसी तरह बराक ओबामा के रूप में एक अश्वेत राष्ट्रपति भी व्हाइट हाऊस पहुंचे थे। श्वेत-अश्वेत और महिला-पुरूष का भेद यहां लाल कारपेट के नीचे साफ दिखाई देता है। यदि हम अपने देश के संदर्भ में बात करें तो हमें यहां की तस्वीर थोड़ी उदार और समावेशी दिखाई देती है। हमारे यहां इंदिरा गांधी जैसी ताकतवर महिला प्रधानमंत्री से लेकर प्रतिभा पाटिल जैसी राष्ट्रपति, नजमा हेपतुल्ला, सुमित्रा महाजन जैसी महिलाएं लोकसभा और राज्य सभा में दिखाई देती हैं। इसके अलावा क्षेत्रीय क्षत्रप के रुप में ममता बैनर्जी, मायावती, वसुंधरा राजे जैसी महिलाएं भी उपस्थित है। अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम जैसे राष्ट्रपति और मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्री दिखाई देते है। एक सामान्य परिवार से आने वाले नरेंद्र मोदी देश के सबसे सशक्त और चर्चित प्रधानमंत्री के रूप में काबिज है। ये अलग बात है कि हमारे लोकतंत्र में भी धनतंत्र की गहरी पैठ हो गई है। बिना पैसे के और पार्टी सपोर्ट किसी का सांसद, विधायक बनाना एक दुस्वप्न सा है। भारतीय लोकतंत्र भी अर्थतंत्र की गिरफ्त में है, जिसे कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियां, बड़े उद्योग घराने चलाना चाहते हैं।

अमेरिका की जनता ने डोनाल्ड ट्रंप को व्हाईट हाऊस से नमस्ते करके बड़ी मुश्किल से ही सही विदा कर दिया। इसके पहले हमने उनकी शान में इंडिया में नमस्ते ट्रंप का आयोजन कर, बिना कोरोना संक्रमण की परवाह किये, 24 फरवरी 2019 को उनका गुजरात की पावन भूमि पर ऐतिहासिक स्वागत किया। अपने देश की सीमा से परे जाकर हमारे माननीय प्रधानमंत्री जो विश्वनेता बनने की चाहत रखते हैं, ट्रंप को जीताने अमेरिका तक गये, किन्तु उनका जादू नहीं चला। ट्रंप को विदा होना पड़ा। दरअसल यह किसी एक व्यक्ति की विदाई नहीं, ये विदाई एक अराजक व्यवस्था के प्रतिनिधि की बिदाई है, जो बड़बोला और घमंडी है। अमेरिका में हाल ही में ट्रंप के समर्थकों द्वारा किये गये आंदोलन को देखकर यहां की भक्त मंडली की याद आ गई, जो बात-बेबात किसी वेब सीरिज, किसी फिल्म, किसी सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाडऩे वाली घटना को बढ़ा-चढ़ाकर उसे राष्ट्रीय अस्मिता, संस्कृति, धर्म से जोड़कर बवाल करने पर आमदा रहती हैं।

पहले रूस हमारा मित्र था और अमेरिका से हम सम्मानजनक दूरी का रिश्ता रखते थे। इसके बावजूद अमेरिका पूरी दुनिया में अपना रौब जमाता, ह्यूमन राईट के नाम पर दादागिरी करने से बाज नहीं आता। 1948 में जब कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान का हमला हुआ तो अमेरिका ने पाकिस्तान का साथ दिया। 1961 में जब गोवा को भारत में मिलाया गया, तो अमेरिका ने कहा गोवा को पुर्तगाल का एक स्टेट है। 1965 में भारत-पाक युद्ध में अमेरिका ने एक बार फिर पाकिस्तान का साथ दिया। 1971 भारत-पाक युद्ध और बंग्लादेश निर्माण के समय अमेरिका ने सातवां बाड़ा भेजने की धमकी दी। अमेरिका की बढ़ती ताकत और रूस के घटते प्रभाव तथा चीन, पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों से संभावित खतरों को देखते हुए हमने अमेरिका के साथ अपने संबंधों में मधुर बनाए रखने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। अमेरिका संसार का साहूकार बनकर बहुत से देशों को उधार देता है, जिसके कारण बहुत से देश चाहकर भी उसके बारे में कुछ नहीं कह पाते। डालर हमारे देश की मुद्रा की कीमत तय करता है। बर्गर, पिज्जा और अमेरिकन लाइफ स्टाईल हमारे नए देश इंडिया के युवाओं की पहचान है। हर पढ़े-लिखे मध्यमवर्गीय परिवार के दिल में एक अमेरिका बसता है। ट्रंप के कार्यकाल में ये अमेरिका थोड़ा पहुंच से दूर हो रहा था, शायद अब दिन फिरें।

अमरीका में सत्ता परिवर्तन न केवल नई आशा लाया है बल्कि अमरीकियों के घावों पर मलहम भी लगाता है। दुनिया भर के देशों और भारत जैसे रणनीतिक साझेदारों के सामने चार साल के उतार-चढ़ाव और विदेश नीति की अनिश्चितता भी दूर करता है। वाशिंगटन और नई दिल्ली को अब रिश्तों को गहरा और व्यापक बनाना है ताकि उसका पूरा सामर्थ्य हासिल हो सके।

ट्रंप की विरासत में बहुत कुछ ऐसा है जिसे दुरुस्त करने की जरूरत है। बाइडेन से सबसे ज्यादा उम्मीद तो यही है कि वह कुछ करें या ना करें लेकिन जो गड़बडिय़ां ट्रंप ने की हैं बस उन्हें ठीक कर दें। बेशक ट्रंप के चार साल बहुत हंगामे भरे रहे। डॉनल्ड ट्रंप (2017-2021) भले ही हिलेरी क्लिंटन को उनसे ज्यादा वोट मिले लेकिन जीत ट्रंप की हुई। अमेरिका और मेक्सिको के बीच दीवार बनाने और अमेरिका को फिर से ग्रेट बनाने के वादे के साथ ट्रंप चुनावों में उतरे थे। उनके कार्यकाल में अमेरिका पेरिस जलवायु संधि से और विश्व स्वास्थ्य संगठन से दूर हुआ। इसके पहले बराक ओबामा (2009-2017) आर्थिक मंदी से कराहती दुनिया में ओबामा ताजा झोंके की तरह आए। देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति ने इराक और अफगानिस्तान से सेना वापस बुलाई, लेकिन उन्हीं के कार्यकाल में अरब जगत में खलबली मची, इस्लामिक स्टेट बना और रूस से मतभेद चरम पर पहुंचे। वह भारत की गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति भी बने। इस बार हमारी गणतंत्र परेड में किसी देश के राष्ट्रपति शामिल नहीं हो पा रहे हैं। किसान 26 जनवरी के अवसर पर ट्रैक्टर रैली निकालकर अपना विरोध प्रदर्शन करना चाहते हैं। सरकार नये कृषि कानूनों को डेढ़ साल के लिए स्थगित करने को तैयार है, पर किसान काले कानूनों को वापस लेने की मांग पर डटे हुए हैं।
जॉर्ज डब्ल्यू बुश (2001-2009)-2001 बुश के सत्ता संभालने के बाद अमेरिका और पूरी दुनिया ने 9/11 जैसा अभूतपूर्व आतंकवादी हमला देखा। बुश के पूरे कार्यकाल पर इस हमले की छाप दिखी। उन्होंने अल कायदा और तालिबान को नेस्तनाबूद करने के लिए अफगानिस्तान में सेना भेजी।

बाइडेन ने कुल 15 कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर किए। वो पिछले चार सालों की ट्रंप की नीतियों को तेज गति के साथ पलटना चाहते हैं। सिर्फ दो राष्ट्रपतियों ने ही अपने कार्यकाल के पहले दिन कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर किए थे, वह भी एक-एक। लेकिन अमेरिका इस वक्त कोरोना वायरस महामारी के गंभीर संकट से गुजर रहा है, और देश की अर्थव्यवस्था की हालत नाजुक है।

बाइडेन ने नस्लभेद को लेकर भी कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किया है। जिसके तहत संघीय एजेंसियों को नस्लभेद को खत्म करने को कहा गया है।  बाइडेन ने 2020 की जनगणना से संबंधित ट्रंप के दो आदेशों को भी रद्द कर दिया है।

कमला हैरिस ने अमेरिका की 49वीं उपराष्ट्रपति के रूप में बुधवार को पहली महिला उप-राष्ट्रपति पद की शपथ लेकर इतिहास रच दिया। वो अमेरिका की पहली महिला, पहली अश्वेत और पहली एशियन अमेरिकन मूल की उप-राष्ट्रपति बनी हैं। उनके पद पर चयनित होने को दुनिया भर में लिंग और नस्लभेद के खिलाफ लड़ाई में बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। हम इसलिए खुश हैं कि भारतीय मूल की मॉ की वे बेटी हैं। जब किसी दूसरे देश में कोई जब किसी दूसरे देश में कोई भारतीय मूल का व्यक्ति कोई बढ़े पद पर सुशोभित होता है, तो हम अपने आपको गौरवानित महसूस करते है, किन्तु यदि वह भारतीय किसी ऐसे धर्म, संप्रदाय जाति से है जिसे हम पसंद नहीं करते, तो हम उसकी चीजों, उपलब्धियों और उनकी निष्ठा पर संदेह करके, उसे राष्ट्रद्रोही तक करार देने में पीछे नहीं हटते। घर का जोगी जोगडा आन गांव का सिद्ध।

अमेरिका की ओर पूरी दुनिय की नजर है। लोग बाकी देशों के राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति को भले ही ना जानते हों, किन्तु अमेरिका को लेकर सबकी उत्सुकता बनी रहती है। अमेरिका का डालर और डंका कब किस पर भारी पड़ जाए, ये कोई नहीं जानता।