प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-मीडिया का वर्तमान परिदृश्य और चुनौतियां

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-मीडिया का वर्तमान परिदृश्य और चुनौतियां


आज की जनधारा की 29वीं वर्षगांठ पर विशेष
हम अपने सभी पाठकों, दर्शकों के आभारी हैं, जिनकी ताकत और उत्साह से हम कठिन समय में भी अपना समाचार-पत्र, वेबपोर्टल और यूट्यूब चैनल चला पा रहे हैं। मीडिया में बहुत तेजी से बदलाव आया है। यह बदलाव केवल तकनीक के स्तर पर ही नहीं कथ्य और सोच के स्तर पर भी है। किसी समय जरूर यह कहा गया था कि-
खींचो न कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो
कोरोना  संक्रमणकाल ने कागज पर छपे अखबार को पीडीएफ में तब्दील कर दिया है। मोबाइल ने अब जनता को फोटोग्राफर, रिपोर्टर और अपनी खबर देने वाला सोर्स भी बना दिया है।

अब पत्रकारों को अपनी खबरों की ब्रेकिंग न्यूज के लिए नेताओं, सेलिब्रेटी के ट्वीटर अकाउंट की ओर देखना पड़ता है। नेता अब पत्रकारवार्ता बुलाने की बजाय ट्वीट करके अपनी बात कहने लगे हैं। सोशल मीडिया पर अपना वीडियो वायरल करने लगे हैं। खबरों के लिए अब बहुत से प्लेटफार्म है जिसके जरिये लोग खबरें ले-दे रहे हैं। धीरे-धीरे समाज में पत्रकारों का महत्व और विश्वसनीयता कम हुई है।

बड़ी पूंजी और संसाधनों के चलते मीडिया हाउस अब धीरे-धीरे कारपोरेट पूंजी के अधीन हो गये हैं। जो अखबार, वेब पोर्टल बचे हैं, वे भी आगे कितने साल तक संघर्ष कर पायेंगे, यह कहना मुश्किल है। अधिकांश इस समय आक्सीजन सिलेंडर पर हैं। सरकारी विज्ञापन इनके लिए ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। कुछ लोग हैं जो रेत में से भी तेल निकालने का हुनर जानते हैं। वे चाहे सूचना का अधिकार हो या जनहित याचिका या किसी भी तरह की मीडिया सबमें अपने लिए आपदा में अवसर तलाश लेते हैं। ये हमारे समय के वे चेहरे हैं जो हर जगह विद्यमान हैं। बावजूद इसके ये अच्छी बात है कि विनोद दुआ, पुण्य प्रसून बाजपेयी सहित बहुत से गंभीर पत्रकार अपनी वेबसाईट के जरिये अपने सब्सक्राईबर के जरिये अपनी बात बेबाकी से कह पा रहे हैं।

मीडिया के सामने चुनौतियां पहले भी कम नहीं थी किन्तु आज की तरह एजेंडा आधारित पत्रकारिता पहले नहीं हुई। सत्ता, प्रतिष्ठानों और पूंजी के दबाव के चलते आज स्वतंत्र मीडिया को बनाये, बचाये रखना मुश्किल हो रहा है। बाहर से बहुत शक्तिशाली, मुखर और तेज-तर्रार दिखने वाला मीडिया से जुड़ा पत्रकार अपने संस्थान में किसी कठपुतली की तरह है। जहां उसे वही बोलना, लिखना है, जो उसके हुकुमरान चाहते हैं। ऐसे में थोड़ी कुछ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं बची है, जहां अभी भी लोग पत्रकारिता को एक गंभीर पेशा और दूसरे की आवाज उठाने का माध्यम समझते हैं। अभी हाल ही में देश के वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने मीडिया से जुड़े एक आयोजन में कहा कि “पत्रकारिता विश्वविद्यालय आत्मघाती दस्ता तैयार कर रहे हैं। वहां पत्रकार नहीं, बल्कि दलाल तैयार किये जा रहे हैं। उन्होंने यह बात इस संदर्भ के साथ भी कही कि देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर में पत्रकारिता के छात्रों के लिए तैयार किए गए प्रश्नपत्रों में कुछ ऐसे प्रश्न किए गए हैं, जो एक विचारधारा विशेष के समर्थक प्रतीत होते हैं।”

सवाल यह है कि श्रवण गर्ग को ऐसा कहने की जरूरत क्यों पड़ी? अभी हाल ही में हमने देखा कि हमारा इलेक्ट्रानिक मीडिया कोरोना काल में जरूरी प्रश्नों की जगह ऐसे प्रश्नों और खबरों में लोगों को उलझा रहा है जिसका सरोकार व्यापक समाज में नहीं है।

मीडिया का आचरण बहुत हद तक सांप्रदायिक और अपराधिक किस्म का होता जा रहा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर मीडिया प्रशासकीय जेहाद नाम का कार्यक्रम बनाकर मुस्लिम समाज के प्रतिभावान छात्र-छात्राओं के भारतीय सेवा में चयन पर सवाल उठाते हुए यह साबित करने पर तुला हुआ है कि ये लोग यदि इसी तरह चयनित होकर प्रशासनिक सेवाओं में आते रहे तो, ये अपने पद का दुरुपयोग कर प्रशासनिक आतंकवाद पैदा करेंगे। इसके पहले भी हमारी मीडिया ने कोरोना संक्रमण के नाम पर तब्लीगी समाज के लोगों को मानव बम की तरह प्रस्तुत किया था। रामजन्म भूमि आंदोलन और बाबरी मस्जिद विवाद के बाद हमारे देश की मीडिया और उसके कार्य करने वाले बहुत से लोग की सोच कथित राष्ट्रवाद के नाम पर संकुचित हुई है। देश में होने वाली घटनाओं, खबरों को ये लोग एक विशेष नजरिये से देखते हैं।

हमारे देश में मीडिया और मॉस कम्युनिकेशन के बहुत से अच्छे संस्थान हैं जिनमें भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) दिल्ली मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज एमसीसी चेन्नई, मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर दिल्ली सेंट जेवियर्स कॉलेज मुंबई या लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर वीमेन एलएसआर दिल्ली और विवेकानंद इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज (VIPS) दिल्ली जैसे संस्थान शमिल हैं। सूचना क्रांति आने बाद से रोजगार मूलक शिक्षा की चाह में बहुत से लोगों ने मीडिया की पढाई को चुना। इस बीच में सरकारों ने खासकर भाजपा सरकार ने पत्रकारिता के विश्वविद्यालय खोले, जहां अपनी विचारधारा को पुष्ट करने वाले लोगों की नियुक्ति हुई। ये नये मीडियाकर्मी अपनी नौकरी और अपनी पहचान के लिए संघर्र्ष कर रहे हैं। ऐसे बहुत से संघर्षशील लोगों को सत्ता का गलियारा या शार्टकट का रास्ता रास आता है। शिक्षा के क्षेत्र में सरस्वती शिशु मंदिर को सफलतापूर्वक संचालित करने के बाद इस विचार से जुड़े लोगों ने मीडिया को शिक्षा के लिए चुना। आज मीडिया संस्थान में राष्ट्रवादी विचारधारा और भाजपा की ओर झुकाव रखने वालों की बाहुल्यता है।

हमारे समय में वफादारी दिखाने की होड़ में भक्ति और शक्ति के साथ गोदी मीडिया की भूमिका तो अब इतनी कलंकित हो चुकी है कि टीवी अब भूत का बक्सा लगता है। पहले चारण होते थे। फिर आजादी के बाद अखबारों ने भूमिका संभाली, लेकिन नेहरु युग तक अखबार की ईमानदारी इस तरह से बिकाऊ नहीं थी। इंदिरा गांधी की वापसी के बाद अखबारों की भूमिका भी क्षीण सी उम्मीद बचाकर संदिग्ध हो गई, लेकिन जिस तरह से बिकने को आतुर मीडिया इस समय लगता है वह कभी नहीं लगा, खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया।

इलेक्ट्रानिक मीडिया में अधिकांश चैनलों के पास न रीढ़ बची और न साहस। साम, दाम, दंड, भेद आदि से मीडिया झुक चुका है, बिक चुका है। इलेक्ट्रानिक मीडिया की विश्वसनीयता तो खत्म हो चुकी है। कुछ चैनलों की स्थिति तो बहुत हास्यापद हो चुकी है। जैसे मंच पर तीसरे दर्जे का वीर रस का कवि चीन और पाकिस्तान को ललकारता है, लगभग वही काम अब कुछ चैनलों ने राष्ट्रीय दायित्व की भांति संभाल लिया है। जनता या प्रतिरोध की आवाज के लिए अब चैनलों पर जगह नहीं है।

लोगों को जहां बोलना चाहिए वहां भी वे चुप रहते हैं। जहां दूर से प्रणाम करना चाहिए वहां लेटने लगते हैं। सत्ता का आकर्षण, दबाव इतना ज्यादा है कि जो अभिव्यक्ति की आजादी के सबसे बड़े लम्बरदार बनते हैं, वह अब उसके दरबारी हो गये हैं। ग्लैमर और कारपोरेट पूंजी से लबरेज नये मीडिया के पास अब गरीब आदमी के लिए कोई स्पेस नहीं बचा है।

हमारा मीडिया भी जनता को जरुरी मुद्दों से भटकाकर वो सब दिखा रहा है, जो उसके बुनियादी प्रश्न नहीं है। सवाल है हमारी अभिव्यक्ति की आजादी का। सवाल है अपने समय के सवालों से रुबरु होकर उसके शब्दों का खड़े होने का। यदि हमें जहां जरुरी है, वहां भी नहीं बोला, लब नहीं खोला तो हमारी चुप्पी आने वाले दिनों में बड़ा अंधेरा, बड़ी खामोशी लाएगी। जहां से हमें केवल एक ओर से आती हुई आवाजें सुनाई देंगी।

यह सही है कि डरा हुआ आदमी और डरी हुई सत्ता ज्यादा आक्रामक होती है। वह कमजोर को डराती है और अपना शक्ति प्रदर्शन अलग-अलग प्रतिबंधों, सजाओं के जरिये करती है। इस डराने के खेल में शमिल लौह कपाट के पीछे बैठा राजा सच से डरता है। राजा को जन की आवाज से डर लगता है क्योंकि सच की अनुगूंज इन्ही आवाजों में होती है। किसी भी राजा को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे जो आज चुप हैं कल बोलेंगे, जब वे जान जाएंगे कि लौह कपाट के पीछे भी आवाजें जा सकती है।

बकौल गजानन माधव मुक्तिबोध-

अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे। तोडऩे ही होंगे मठ और गढ़ सब। पहुँचना होगा दुर्गम पर्वतों के उस पार 
तब कहीं देखने मिलेंगी बाहें जिसमें कि प्रतिपल कांपता रहता? अरुण कमल एक।