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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - पुलिस की बनती, बिगड़ती छवियां

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - पुलिस की बनती, बिगड़ती छवियां

हमारे सिनेमा ने पुलिस का बहुत नुकसान किया है। अक्सर फिल्म में पुलिस का बड़ा अफसर अपराधी से मिला होता है या पुलिस घटनास्थल पर तब पहुंचती है जब हीरो सारे मामले का निपटारा कर चुका होता है। कुछ फिल्मों में पुलिस को रॉबिन हुड की तरह, चुलबुल पांडे की तरह दिखाया जाता है। गंगाजल जैसी कम ही फिल्में हैं जहां पुलिस की अंतरव्यथा, संघर्ष को दिखाया गया है। पुलिस या तो हीरो या विलेन। हममे से कोई ये नहीं सोचता कि पुलिस भी हमारे ही सिस्टम का एक हिस्सा है। जैसा समाज होगा, राजनीतिक परिदृश्य होगा वैसी ही पुलिस होगी। पुलिस सरकार की कानून व्यवस्था को संचालित करने वाला अग्रिम पंक्ति का वह चेहरा है जो हर घटना, स्थिति में सबसे पहले दिखाई देता है। कोरोना संक्रमण काल में कोरोना संक्रमित व्यक्तियों को खोजकर आइसोलेशन सेंटर, अस्पताल में लाने का काम हो या फिर कोरोना से बचाव के लिए किये जा रहे सुरक्षात्मक उपायों की अनदेखी करने वालों के खिलाफ कार्यवाही, समझाईश की बात हो। अकेले महाराष्ट्र में पुलिस के 51 जवानों की मौत कोरोना वायरस की चपेट में लोगों की मदद करने के दौरान संक्रमित होने से हुई। इस दौरान पुलिस पर 279 हमले भी हुए जिनमें से 86 लोग गंभीर रूप से घायल हुए। पुलिस दल पर बढ़ते हमलों को देखते हुए सरकार को कड़े कानून बताकर आईपीसी की धारा के तहत जो भी लॉकडाउन को तोड़ेगा या बाधा डालेगा उसे दो साल तक की सजा का प्रावधान है। इसके अलावा जो लोग पुलिस बल पर अटैक करने वालों पर 7 साल तक की सजा है। छत्तीसगढ़ के रायपुर स्थित पुलिस मुख्यालय के 9 जवान कोरोना संक्रमित पाये गये। इसके पहले मध्यप्रदेश में भी पुलिस बल बड़े पैमाने पर संक्रमित हुआ और दो पुलिस अधिकारियों की कोरोना से मृत्यु हुई।

हाल ही में तमिलनाडु में पुलिस की बर्बरतापूर्ण कार्यवाही देखने में आई। पुलिस ने पी. जयराज और बेनिक्स को 19 जून को तूतीकोरिन में उनके मोबाइल फोन की दुकान से गिरफ्तार किया गया। उन पर आरोप था कि दुकान को लॉकडाउन के दौरान अनुमति के घंटों से अतिरिक्त समय तक खुला रखा था। इसके चार दिन बाद अस्पताल में दोनों की मौत हो गई थी। परिवारवालों का आरोप था कि पुलिसवालों ने उन्हें बुरी तरह से पीटा। इस घटना के बाद पूरे तमिलनाडु सहित देश में एक बार फिर पुलिस के कामकाज, कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा होने लगी। देश के सुप्रसिद्ध कमल हासन और सुपरस्टार रजनीकांत ने इस हत्या का विरोध करते हुए कहा कि सरकार और मुख्यमंत्री जो पुलिस हत्याओं का आंख बंद करके समर्थन करते हैं, वे भी मुख्य आरोपी हंै। उन्होंने कहा कि इस अपराध को छुपाने की कोशिश करने वालों को सजा दी जानी चाहिए। कमल हासन ने कहा, पुलिस के अतिवादी रवैये का समर्थन कर तमिलनाडु सरकार आतंकवाद की अनुमति देती है।
पूरे देश में पुलिस के प्रति जनता के मन में एक अच्छी छवि बनी थी उसे तमिलनाडु की पुलिस की इस कार्यवाही से नुकसान पहुंचा है। तेनकाशी जिले के 25 वर्षीय ऑटो चालक कुमरेशन को पुलिस ज्यादती के चलते जान गंवानी पड़ी। तेनकाशी जिले के वी.के. पुदूर को पुलिस स्टेशन में 10 मई को बुरी तरह पीटा गया। करीब 47 दिन तक जीवन मौत से संघर्ष के बाद आखिर मौत की नींद सो गया। उसके पिता नवनीतकृष्णन का आरोप है कि पुलिस स्टेशन में दो पुलिसवालों ने उसके बेटे को बुरी तरह मारा-पीटा।

पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पार्टी के एक स्थानीय नेता 35 वर्षीय काजी नसीरूद्दीन को 18 जनवरी, 2013 को हुगली जिले में हिरासत में लिया गया। हालांकि पुलिस का यह दावा है कि धनियाखाली पुलिस थाने के शौचालय में गिरने से नसीरूद्दीन की मौत हो गई थी, जबकि नसीरूद्दीन की पत्नी मांजा बीबी का आरोप है कि उनके पति की मौत पुलिस की मारपीट से हुई। उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के कवारसी पुलिस थाने में 15 अप्रैल, 2012 को श्यामू सिंह की पुलिस हिरासत में मौत हुई।

पुलिस अभिरक्षा से होने वाली मौतें और प्रताडऩा संबंधी ये सारी कार्यवाहियां कानून में उल्लेखित नियमों के खिलाफ है। वर्ष 2010 से 19 के बीच पुलिस कस्टडी में 427 मौतें हुई। हमारे संविधान का 22वां अनुच्छेद सुरक्षा के तहत प्रत्येक व्यक्ति को जो सुरक्षा प्रदान की गई है उसके अनुसार किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार किए जाने का आधार बताए बिना हिरासत में नहीं किया जा सकता। गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को वकील से सलाह लेने तथा अपना बचाव करने की सुविधा होनी चाहिए। गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर गिरफ्तार व्यक्ति को निकटतम दंडाधिकारी के सामने पेश किया जाना चाहिए। हमारे देश में लागू दंड प्रक्रिया का मुख्य स्रोत दंड प्रक्रिया संहिता 1973 है। यह भारत में अधिकांश मूल अपराधिक कानून की प्रक्रिया प्रदान करता है। हमारी पुलिस जिसके जिम्मे कानून व्यवस्था को संभालने का दायित्व है। पुलिस बल कई बार अपने अधिकारों का दुरूपयोग करके ऐसी कार्यवाही करती है जिससे पुलिस और आमजनता के बीच जो संबंध होने चाहिए, वे सहज नहीं हो पाते।

पुलिस मित्र योजना, पुलिस सहायता केन्द्र, परामर्श केन्द्र के बावजूद लोग पुलिस के साथ सहज नहीं हो पाते। पुलिस का एक दूसरा चेहरा भी है जिसमें पुलिस बिना अपने जान की परवाह किये लोगों की मदद करती है। अपराधियों को सजा तक देती है। हैदराबाद में पुलिस जब बलात्कार, हत्या के अपराधियों का एनकाउंटर करके मार गिराती है तो उनके ऊपर फूल की वर्षा होती है। पुलिस जब कोरोना वॉरियर्स बनकर सामने आती है तो उनका जगह-जगह स्वागत होता है किंतु यही पुलिस जब तमिलनाडु में पिता-पुत्र बेगुनाह की बर्बरतापूर्वक पिटाई करके, उन्हें मार डालती है तो पूरा देश आक्रोशित हो जाता है। एक अध्ययन के अनुसार, पुलिस जिन लोगों को प्रारंभिक रूप से पूछताछ के लिए पकड़कर लाती है तो 74 प्रतिशत पुलिस वाले ये मानकर चलते हैं कि वे सब अपराधी हैं। पुलिस के निचले स्तर के अधिकारी, सिपाही को सही ढंग से प्रशिक्षण नहीं मिलना, उन पर काम का भार अधिक होना, राजनैतिक हस्तक्षेप होना आदि बहुत से कारण हैं जिनकी वजह से पुलिस पर स्टे्रस बहुत होता है। हमारे देश में मात्र मौजूदा पुलिस बल में से केवल 6 प्रतिशत लोगों की ही सही ट्रेनिंग हो पाती है। देश में पुलिस बल की कमी, प्रशिक्षण का अभाव, सही तरीके से काम के लिए वातावरण का नहीं मिलना और लोगों का कानून के प्रति मानव अधिकारों के प्रति सचेत नहीं होना ऐसे बहुत से कारण हैं जिनके चलते पुलिस की छबि बनती बिगड़ती रहती है।