प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- सुविधा का समीकरण

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- सुविधा का समीकरण


यह सुविधाओं के समीकरण बिठाने का समय है। जब आपका मन चाहे और जैसी आपकी सुविधा हो वैसा कर लो। 'जैसी चले बयार, पीठ को तैसी कीजिए की तर्ज पर जब आपके समीकरण गड़बड़ाने लगे, आपके लिए गये फैसले आपको अपनी सुविधा के अनुकूल न लगे तो अपनी सुविधा देखकर इसे बदल लो। चाहे फिर विधायक पद से इस्तीफा देने का मामला हो या नौकरी छोड़कर राजनीति में जाना और फिर वापस नौकरी में आने की बात हो या फिर अपने अनुकूल पद नहीं मिलने पर पार्टी से बगावत करके पार्टी की सरकार गिराने की कोशिश और फिर गणित गड़बड़ाने पर पार्टी में वापस लौटने की बात हो। कसमें-वादे, प्यार-वफा, पार्टी निष्ठा, पार्टी लाइन की सोच सब बेमानी है। सबसे महत्वपूर्ण है अपने लिए सुविधा का संसार जुटाना। पहले के दौर में प्रगति का पैमाना धनात्मक हुआ करता था पर अब ये सोच गुणात्मक प्रगति में बदल गई। अब लोग दो और दो चार नहीं सीधा 8,16, 32 चाहते हैं। यह सोच जल्दी में शिखर पर तो ले जा सकती है पर जब इसका तिलस्म टूटता है तो फिर आदमी सीधा जमींदोज होता है।

हाल की घटनाएं इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है, एक है सचिन पायलट और दूसरे हैं शाह फैसल और तीसरे हैं मध्यप्रदेश में कांग्रेस पार्टी के विधायकों का इस्तीफा देकर बीजेपी के लिए बहुमत की राह आसान करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थक विधायक। तीनों युवा हैं और तीनों को भारतीय राजनीति, प्रशासनिक क्षेत्र में लंबे समय तक रहना है। 37 साल के शाह फैसल ने कश्मीर में हो रही कार्यवाही और कश्मीरी आजादी के नाम पर साल 2019 में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) से अपना इस्तीफा देकर एक क्षेत्रीय पार्टी जम्मू एंड कश्मीर पीपल्स मूवमेंट (जेकेपीएम) ज्वाइन की थी। वो इस पार्टी के पहले प्रेसीडेंट बने। वो राज्य से पहले उम्मीदवार थे, जिन्होंने सिविल सेवा परीक्षा में टॉप किया था। उनका इस्तीफा अभी स्वीकार नहीं हुआ और उनका इस बीच राजनीति से मोहभंग हो गया। डॉक्टर से ब्यूरोक्रेट और फिर राजनीति में आए शाह फैसल अपने लिए सुविधा का समीकरण तलाश रहे हैं। उन्ही की तरह बिहार के वर्तमान डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय है। 2009 में आईपीएस पद से इस्तीफा देकर राजनीति ज्वाइन की थी, फिर 9 महीने बाद गुप्तेश्वर पांडेय ने बिहार सरकार से कहा कि वो अपना इस्तीफा वापस लेना चाहते हैं और नौकरी पर वापस आना चाहते हैं। नीतीश कुमार की सरकार ने इस्तीफा वापिस कर दिया और गुप्तेश्वर पांडेय की नौकरी में वापसी हो गई।
इसी तरह कांग्रेस के दिवंगत नेता राजेश पायलट के बेटे सचिन पायलट हैं जो कुछ दिनों पहले तक राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष और प्रदेश के उपमुख्यमंत्री थे। अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और कथित अनदेखी के चलते इन्होंने 18 विधायकों के साथ राजस्थान हाईकोर्ट के समक्ष एक याचिका दायर की है, जिसमें भारत सरकार को भी पक्षकार बनाने की अपील की गई थी। सचिन पायलट और उनके समर्थन में आये विधायकों ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से मिलकर अपनी बात रखी थी और सुलह कर लिया। सचिन पायलट तेजतर्रार राजनीतिक प्रवृत्ति के हैं, और समझते हैं कि सत्ता की भूख में महामारी के इस दौर में ही अपनी ही सरकार को पटकने की जल्दबाज़ी में उनका नुकसान होगा। वे भी सुविधा का समीकरण तलाश रहे हैं।

भारतीय राजनीति में दलबदल की घटनाएं आज से नहीं हो रही हैं, ये पहले भी था किंतु मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों जो हो रहा है, वह चौंकाने वाला है। कांग्रेस की वैचारिक पृष्ठभूमि से चुनकर आये विधायक अप्रत्यक्ष लाभ के लिए अपने पदों से इस्तीफा देते जा रहे हैं। पहली खेप में सिंधिया समर्थकों के रूप में 22 विधायकों ने कांग्रेस छोड़कर सरकार गिरा दी और लाभ के पदों पर काबिज हो गये। सरकार बनने के बाद भी यह सिलसिला निरंतर जारी है।

एक और कांग्रेस विधायक ने गुरुवार को इस्तीफा दे दिया और बाद में भाजपा में शामिल हो गए, जिससे विधानसभा में कांग्रेस की ताकत 89 हो गई। मंधाता के विधायक नारायण पटेल के इस्तीफे को स्वीकार कर लिया। 17 जुलाई को नेपानगर विधायक सुमित्रा देवी कासडेकर ने भी इस्तीफा दे दिया था और भाजपा में शामिल हो गए थे। इसके कुछ दिनों बाद कांग्रेसी कुंवर प्रद्युम्न सिंह लोधी ने ऐसा किया था, बाद में उन्हें राज्य नागरिक आपूर्ति निगम लिमिटेड के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया और कैबिनेट रैंक दी गई। वर्तमान में पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के 19 समर्थकों सहित 22 कांग्रेस विधायकों के साथ 230 सदस्यीय सदन में 27 विधानसभा सीटें खाली पड़ी हैं, जिन्होंने 15 महीने की कमलनाथ सरकार को गिराते हुए मार्च में इस्तीफा दे दिया था। अभी विधानसभा में भाजपा की ताकत 107 विधायकों की है। भाजपा यहां सुविधा का समीकरण तलाश रही है। भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना शायद ऐसे ही विधायकों की तोडफ़ोड़, खरीद-फरोख्त से पूरा होगा।

यह समय टेक्नॉलॉजी, सोशल मीडिया और आत्म केंद्रीयता का है। आधुनिक टेक कंपनियां हमारे दैनिक जीवन के हर क्षण की जानकारी बटोरने पर केंद्रित है। वे हमें अच्छी तरह पहचान गई हैं। वे जानती हैं कि हम कौन हैं और हमें क्या कुछ पसंद है। स्मार्ट अल्गोरिद्म कंपनी हमारी इच्छाओं के आधार पर हमें विभिन्न श्रेणियों में छांटने में सक्षम है। वे हमें वही चीजें और सेवाएं मुहैया कराती हैं, जो विशेष रूप से हमारी पसंद और प्राथमिकताओं के अनुकूल हो। यही वह बात है, जो हमें उनकी तरफ खींचती है, हमें उनसे जोड़े रखती है। आज हर कारोबार का मूल बिंदु है 'पर्सनलाइजेशनÓ, यानी अपने हिसाब से ढालना। पर्सनलाइजेशन का एक नकारात्मक पहलू भी है। हम सेवा मुहैया कराने वाली कंपनियों को अपने बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी जुटाने की इजाजत आसानी से दे देते हैं, ताकि उनकी बेहतर सेवा पा सकें, पर यह हमारे विरुद्ध ही हथियार बन सकती है।

यह सुविधाभोगी समय है। यह कम समय पर ज्यादा पाने की लालसा का शार्टकट समय है। हर कोई जल्दी में है, यही वजह है कि सारी सोच पूंजी, पॉवर और बाजार के बीच फंसकर रह गई है। समाज जीवन में मूल्यों का तेजी से हृास हुआ है, जिसका प्रतिबिंब हमें राजनीति ब्यूरोक्रेसी में साफ दिखाई देता है। पूंजीवादी तंत्र ने विचारधारा, सत्यनिष्ठा, जीवनमूल्यों को हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया है। चारों ओर झूठ, कपट और माया का बोलबाला है। डॉक्टर, इंजीनियर बनने के लिए बहुत ही कड़े काम्पिटिशन से एडमिशन पाने वाले डॉक्टर, इंजीनियर अपने क्षेत्र में सीमित संख्या वाले संस्थानों से उच्च शिक्षा के बाद ग्लैमर और पॉवर की लालसा में अपनी मूल पढ़ाई लिखाई को छोड़कर अफसर बनना चाहते हैं। ऐसे युवाओं के पास आज नेताजी, भगतसिंह जैसा कोई रोल मॉडल नहीं है, ना ही उन्हें अपना गोल मालूम है। असेम्बली में बम फेंककर बहरों को सुनाने वाले भगतसिंह के पास एक साफ सोच और दर्शन था। भगत सिंह क्रांतिकारी देशभक्त ही नहीं बल्कि एक अध्ययनशील विचारक, कलम के धनी, दार्शनिक, चिंतक, लेखक, पत्रकार और महान मनुष्य थे। भगतसिंह के राजनीतिक दस्तावेज पढ़ते हुए हैरानी होती है कि इतनी कम उम्र में राजनीतिक मुद्दों की उनमें बहुत स्पष्ट समझ मिलती है। आज की पीढ़ी में भटकाव दिखाई देता है। विरोध का जो स्वर है वह सामूहिकता के लिए कम व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के लिए अधिक है।