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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-नई शिक्षा नीति कुछ जरूरी पहलू

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-नई शिक्षा नीति कुछ जरूरी पहलू


नई शिक्षा नीति का लगभग 480 पृष्ठों का मसौदा पेश किया गया है जिसके आधार पर उस पर विस्तृत बहस होनी है किन्तु केंद्र सरकार की ओर से 29 जुलाई को जो ड्राफ्ट, पॉवर पाइंट प्रेजेन्टेशन के रूप में प्रस्तुत किया गया है, उससे पूरे देश में नए सिरे से बहस छिड़ गई है। भाजपा नई शिक्षा नीति का श्रेय लेते हुए कांग्रेस को अब तक हुई शिक्षा की दुर्गति को लेकर कोस रही है, वहीं कांग्रेस इसे केंद्रीकरण की नीति बताते हुए समान स्कूल प्रणाली पर चुप्पी को लेकर सवाल उठा रही है। दोनों ही पार्टियां और उसके नेता शिक्षा के संबंध में डब्ल्यूटीओ की नीति और सरकार द्वारा उसे उसकी स्वीकार्यता या उसे लागू करने की बाध्यता के बारे में चुप्पी साधे हुए हैं।

प्राचीनकाल की गुरुकुल संस्कृति पर गर्व करने वाली भाजपा, डब्ल्यूटीओ द्वारा निर्धारित शिक्षा-मानकों को और उन पर आधारित मसौदे को राष्ट्रीय हितों के अनुरूप बता रही है। इस नीति की दिशा शिक्षा के निजीकरण और उसे व्यापार की वस्तु बना देने की ओर है। मैकाले द्वारा लागू की गई शिक्षा प्रणाली जिसके अवशेष आज तक जीवित हैं, उनके बारे में कोई बात नहीं कर रहा है। देश के भीतर रचे-बसे भेदभाव को दूर करने का जो एकमात्र तरीका कॉमन स्कूल सिस्टम (सीएसएस) अवधारणा है, उसके बारे में भी यह शिक्षा नीति मौन है। इस मसौदे से मैकाले द्वारा निर्मित इंडिया और भारत की खाई कम नहीं होगी बल्कि बढ़ेगी क्योंकि उच्च शिक्षा में स्वायत्तता की अवधारणा अकादमिक स्वायत्तता तक सीमित नहीं है, वह दरअसल, वित्तीय स्वायत्तता के लिए रास्ता खोल देगी। इसका अर्थ शिक्षण संस्थानों को अपने संसाधन स्वयं जुटाने होंगे। साफ  है कि सरकार शिक्षा से हाथ खींचने की तैयारी कर रही है।

नई शिक्षा नीति के लिए अक्टूबर 2015 में सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में कमेटी बनी। कमेटी  ने अपनी रिपोर्ट 27 मई, 2016 को सौंपी। 2016 में नई शिक्षा नीति की चर्चा हुई। जून 2017 में इसरो के प्रमुख रहे वैज्ञानिक के कस्तूरीगन अध्यक्ष बनाए गए। 31 मई, 2019 कस्तूरीगन कमेटी ने अपना प्रतिवेदन सौंपा। जनता और विशेषज्ञों से दो माह का समय देकर उनसे सुझाव मांगे गए। शिक्षा नीति के लिए 65 हजार सुझाव मिले। 29 जुलाई 2020 को नई शिक्षा नीति की घोषणा हुई किंतु संसद में बहस के बिना उसे जारी कर दिया गया।  शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि यह नीति बच्चों के लिए अच्छी है। 3 से 6 साल की आयु में ग्रहणशील अच्छी होती है, बच्चों में ग्रहण करने की क्षमता 35 फीसदी ज्यादा होती है, बच्चे इसी आयु में सीखते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने पहली बार 3-6 वर्ष के बच्चों को शामिल किया गया है।  नई शिक्षा नीति में 10+ को खत्म करके 5+3+3+4 के फार्मूले से पढ़ाने का प्रावधान किया जा रहा है, उसे 8 वर्ष के बच्चों पर फोकस किया गया है। 11 से 14 साल में प्रयोगवादी क्षमता विकसित करने की बात कही गई है जो कि बहुत ही अच्छा है। 9वीं से 12वीं कक्षा यानी 14 से 18 वर्ष को सेकेंडरी स्टेज माना जाएगा। नवमीं से पसंदीदा विषयों को चुनने की छूट होगी, जो एक सकारात्मक पहल है। प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को पेशेवर शिक्षक बनने प्रोत्साहित करने मुहिम पर जोर देकर चार साल के बीएड का कोर्स करने पर छात्रवृत्ति देने का प्रावधान किया जा रहा है।

नई शिक्षा नीति में प्रमुख रूप से जो बातें समाहित की गई हैं उनमे छात्रों के रूचि के विषय पढाए जाएंगे, पेशेवर शिक्षा पर जोर होगा। विद्यार्थियों बहुत से विकल्प मिलेंगे, स्थानीय विषयों का समावेश होगा। प्रायमरी स्तर पर द्विभाषीय शिक्षा होगी, बस्ते का बोझ कम होगा, रट्टू तोता बना रही है, शिक्षा से मुक्ति मिलेगी, प्रोजेक्ट आधारित शिक्षा पर जोर दिया गया है, श्रम को महत्ता बढ़ेगी, अंग्रेजी की दासता से मुक्त होगी शिक्षा, दसवीं बोर्ड को हटा दिया गया है, 9 वीं से 12वीं तक 4 सालों में विषय चुनने की आजादी रहेगी, 5वीं तक मातृभाषा में शिक्षा यथासंभव 8वीं तक किया जा सकेगा, 6वीं से बच्चे कोचिंग सिस्टम भी सीख सकेंगे और फिर किसी संस्थान में इंटर्नशिप भी कर सकेंगे। शिक्षा नीति के क्रियान्वयन के लिए रोडमैप तैयार कर लिया गया है, अमल के लिए 2035 तक की समयसीमा तय की गई है, सकल नामांकन दर को बढ़ाकर 50 फीसदी तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। अभी 26 फीसदी है। 75 फीसदी प्रावधानों को 2024 तक लागू करना ही नीति में करीब 60 फीसदी बदलाव के प्रस्ताव है जिनमें से दो साल में 20 फीसदी हो पाएंगे। 22 में 7 प्रावधान को और 2023-24 में 23 प्रावधानों को लागू करने की योजना हो, 2030 तक हर जिले में एक मल्टी सब्जेक्ट हाई इंस्टीट्यूट बनाने का लक्ष्य है, 2040 तक सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को मल्टी सब्जेक्ट इंस्टीट्यूट और 2050 तक स्कूल और उच्च शिक्षा प्रणाली के माध्यम से 50 फीसदी शिक्षार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा में शामिल करने की योजनाएं, शिक्षकों के लिए नेशनल प्रोफेशनल स्टैंडर्ड तैयार किया जाएगा।

कॉलेज अपना करिकुलम तय कर सकेंगे, मल्टी फैकल्टी यूनिवर्सिटी होगी, बीच में पढ़ाई छोडऩे वालों को भी सर्टिफिकेट मिलेगा, एक साल में सर्टिफिकेट, दो साल में डिप्लोमा, तीन साल में डिग्री, पांच साल का बैचलर, एक साल का पीजी, एम. फिल से मुक्ति, कालेज में मल्टीपल एंट्री और एग्जिट (स्तरीय प्रवेश एवं निकाय) यानी बीच में पढ़ाई छोड़कर जाने पर भी सर्टिफिकेट डिप्लोमा मिलेगा, विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए द्वार खोल दिए हैं। नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन को लेकर लोगों के मन में मौजूदा सरकार की नीयत को लेकर जो संदेह है उसका कारण बीच-बीच में सरकार के स्तर पर उठाए जाने वाले कदम हैं। अभी हाल ही में सीबीएसई ने कोविड-19 के बाद उत्पन्न विशिष्ट परिस्थितियों और शिक्षण दिवसों की संख्या में आई कमी का हवाला देते हुए 9वीं से 12वीं के पाठ्यक्रम में 30 प्रतिशत की कटौती की है। कक्षा नवमीं के राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रम से डेमोक्रेटिक राइट्स तथा स्ट्रक्चर ऑफ  द इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन। कक्षा दसवीं के राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रम से डेमोक्रेसी एंड डाइवर्सिटी, कास्ट रिलीजन एंड जेंडर एवं चैलेंजेस टू डेमोक्रेसी जैसे महत्वपूर्ण अध्यायों को हटा दिया गया है। कक्षा ग्यारहवीं के पॉलिटिकल साइंस के पाठ्यक्रम से फेडरलिज्म, सिटीजनशिप, नेशनलिज्म और सेक्युलरिज्म जैसे अध्याय हटा दिए गए हैं। एनसीईआरटी के पूर्व डायरेक्टर कृष्ण कुमार ने एक साक्षात्कार में कहा- 'पुस्तकों से अध्यायों को हटाकर बच्चों के पढऩे और समझने के अधिकार को छीना जा रहा है। सीबीएसई ने जिन अध्यायों को हटाया है उनमें अंतर्विरोध है।  आप संघवाद के अध्याय को हटाकर संविधान बच्चों को पढ़ाएं- ये कैसे होगा? आप सामाजिक आंदोलन के अध्याय को हटाएं और इतिहास पढ़ाएं - ये कैसे होगा?  इतिहास सामाजिक आंदोलनों से ही तो जन्म लेता है। ये कटौती बच्चों में रटने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देगी। सीबीएसई ने अपनी सफाई में कहा है कि कक्षा 9 से 12 के पाठ्यक्रम में 30 प्रतिशत की कटौती करने हेतु उसका युक्तियुक्तकरण किया गया है। कोई भी नीति बनाई तो बहुत बढिय़ा जाती है, सवाल उसके क्रियान्वयन को लेकर होता है, नीयत को लेकर होता है। ऊपर से देखने पर नई शिक्षा नीति का यह मसौदा बहुत अच्छा मालूम पड़ता है। इसके घातक दुष्परिणामों जो छोड़ भी दें तो इसके अच्छे प्रावधानों का निर्धारित समयावधि में क्रियान्वयन हो तो भी गनीमत होगी। आशंका यही है कि यह महज दस्तावेज होकर न रह जाएं। फिलहाल इसको लेकर लोगों के मन में जो भ्रम, संशय और खुशफहमी है वे दूर हों और व्यावहारिक क्रियान्वयन में ईमानदारी हो तो तो शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव की उम्मीद की जा  सकेगी लेकिन बदलाव की दिशा को लेकर संशय तब भी बना रहेगा।