प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है

सुदर्शन फाकिर का एक शेर हैं-

मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है 

क्या मिरे हक़ में फ़ैसला देगा 

इस समय मीडिया और सोशल मीडिया पर आ रही खबरों, व्हाट्सएप मैसेज को देखकर यही कहने का मन होता है। जनता के हक की बात कहने वाला मीडिया अब दृश्य से गायब होता जा रहा है। दर्शक, पाठक से उपभोक्ता में तब्दील होती जनता को धीरे-धीरे आम आदमी के सरोकार, दुख, दर्द, संघर्ष से दूर किया जा रहा है। हमारे व्हाट्सएप समूह जिन्हें हमारे दोस्तों-परिचितों, ऑफिस के सहयोगियों, रिश्तेदारों, रहवासी कॉलोनी समिति के साथियों ने आपसी संवाद, सूचनाओं के आदान-प्रदान और थोड़ी बहुत चुहलबाजी या जिस सोच या रुचि या प्रोफेशन के हम हैं, उसकी बातों को साझा करने के लिए बनाया था। वे धीरे-धीरे फॉरवर्ड मैसेज के जरिये वैमनस्यता फैलाने, झूठी जानकारी देने या किसी वर्ग विशेष को नीचा दिखाने के माध्यम भी बन रहे हैं। कोरोना को लेकर तब्लीगी जमात को बदनाम करने से लेकर राम मंदिर मुद्दा और शाहिन बाग आंदोलन और अभी मुम्बई फिल्म जगत की खबरों आदि के समय सोशल मीडिया पर जिस तरह के मैसेज, वीडियों जानकारी शेयर हुई उसे हमने खूब देखा। अभी भी लगातार बहुत सारे भ्रामक और नफरत फैलाने वाले मैसेज साझा हो रहे हैं।

हर बड़ी राजनीतिक पार्टी का एक आईटी सेल है। जो अब राजनीतिक असहमति से आगे बढ़कर, शत्रुता की हद पार करके चरित्र हनन की निचली पायदान पर उतर आए हैं।

फेसबुक और वाट्सएप से अब सामाजिक सौहार्द्र खत्म हो रहा है और अपनी आधी अधूरी जानकरी या अफवाह को प्राय: अंतिम सच की भाँति प्रकट करने की जिद आ गई है। फेसबुक पर व्यक्ति राजनीतिक आईटी सेल द्वारा टूल्स की भाँति उपयोग हो रहा है, उसे प्राय: खबर नहीं रहती है।

इसी तरह की अफवाहों को पहले मीडिया दरकिनार करती थी, अब उत्तेजना और आवेश के साथ परोसती है। परोक्ष में उस पर सच की मोहर लगाती है।

कला, साहित्य, संस्कृति, कर्मचारी संगठन, सामाजिक संगठन, मीडिया में होने के कारण मैं बहुत से व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ा हूं। मेरे ही जैसे हजारों, लाखों लोग हैं जो व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्ट्राग्राम आदि से जुड़े हुए हैं। ऐेसे सभी ग्रुपों में बहुत से लोग जाने-अजाने ऐसे मैसेज, जानकारी शेयर करते हैं जो उन्होंने नहीं बनाए। उन्हें ये व्हाट्सएप मैसेज कहीं से मिले, जिसकी वास्तविकता जाने बिना लोग तुरंत फॉरवर्ड करते हैं। ये मैसेज जंगल की आग की तरह फैलते हैं। यह अतार्किक चीजों का समय है। कोई भी सोचने-समझने की, रिसर्च करने की जेहमत नहीं उठाना चाहता। कोई किसी भी बात का परीक्षण नहीं करना चाहता। पुरानी कहावत है कि कौआ कान ले गया तो उसी के पीछे भागने लगे। पर ये कौए कान नहीं ले जाकर आपके दिमाग में घुस रहे हैं। सोशल मीडिया के जरिये ऐसी जानकारी जानबूझकर लोगों तक पहुंचाई जा रही है जो उन्हें उद्वेलित करे। जाति, धर्म, संप्रदाय, आरक्षण, महिला सशक्तिकरण, राजनीतिक नेतृत्व और नेताओं को लेकर क्रियेट की जाने वाली पोस्ट का मंतव्य एक ही होता है, वह है छवि खराब करना या बनाना। लोगों के बीच गलतफहमी पैदा करना या किसी की छवि चमकाना, गढऩा या उनका एजेंडे को आगे बढ़ाना।

आज से दो दशक पहले जब इतना आक्रमक और भ्रामक तेज मीडिया नहीं था, तब भी लोग कुछ दोहे, कोटेशन और बातों को दूसरे के नाम से उद्धारित करते थे। कबीर, गालिब, शेक्सपियर से लेकर महात्मा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोगों के नाम से बहुत सी कविताएं, कोटेशन आते जो उनके नहीं होते। अभी हाल ही में शशि थरूर ने मिर्जा गालिब के नाम से जो शायरी शेयर की :

ख़ुदा की मोहब्बत को फऩा कौन करेगा...?

सभी बन्दे नेक हों तो गुनाह कौन करेगा....?

ऐ ख़ुदा मेरे दोस्तों को सलामत रखना....

वरना मेरी सलामती की दुआ कौन करेगा....

जावेद अख्तर ने इसका खंडन करते हुए बताया कि यह मिर्जा गालिब की शायरी नहीं है। मिर्जा गालिब के नाम से इस साल कम से कम चार बार उनकी जयंती, पुण्यतिथि की पोस्ट वायरल हुई। जबकि उन तारीखों से उनका कोई लेना-देना नहीं था। इस तरह की पोस्ट किसी को हानि पहुंचाने या दुर्भावना से नहीं होती, केवल जल्दबाजी में दोस्तों के बीच शेयर करने की मंशा से भेजी जाती है। किन्तु इधर छवि बिगाड़ो, वैमनस्यता फैलाओ, लोगों को आपस में लड़ाओ, डराओ को लेकर बहुत सी पोस्ट आने लगी हैं। ऐसी पोस्ट तैयार करने बकायदा वॉररुम बने हुए हैं। अभी हाल ही में स्वामी अग्निवेश का निधन हुआ। उन्होंने ताजिदंगी बंधुआ मजदूरों सहित, पीडि़त, शोषितों के हक में, प्रजातांत्रिक मूल्यों के लिए लड़ाई लड़ी, किन्तु उनको लेकर भी लोगों ने सोशल मीडिया पर बहुत ही अभद्र टिप्पणियां की। महात्मा गांधी को लेकर भ्रामक पोस्ट आये दिन आती हैं, जिसमें उन्हें पाकिस्तान बनाने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है। नेहरू जी तो ऐसे लोगों के लिए सबसे ज्यादा साफ्ट टारगेट हैं। नेहरू जी की छवि किसी रोमियो, फ्लर्ट करने वाले व्यक्ति की बनाई जाती है। किसी भी व्यक्ति के भाषण से कोई अंश मिलाकर उसे गलत संदर्भ के साथ पोस्ट करना आईटी सेल से जुड़े लोगों का पसंदीदा कार्य है।

आधुनिक तकनीक का सहारा लेकर इस तरह से ऐडिटिंग की जाती है कि झूठ भी सच लगे। हिटलर के प्रचार मंत्री गोएवेल्स की ही तरह किसी झूठ को बार-बार कोड करने से वह सच लगने लगता है, यही फार्मूला लोग सोशल मीडिया पर अपनी बातों के लिए, सामान बेचने या छवि बनाने, बिगाडऩे के लिए अपना रहे हैं। गोएवेल्स ने 1933 में कहा था कि रेडियो सिर्फ 19वीं ही नहीं, 20वीं सदी में भी सबसे असरदार माध्यम रहेगा। अपने विरोधियों को राक्षस बताने जैसे तकनीकों, मिथकीय छवि की कहानियों और परंपराओं का सहारा लेकर हिटलर के करिश्माई व्यक्तित्व को सामने रखकर नाजियों को महिमामंडित किया जाता था। आधुनिक गोएवेल्स इसी आधुनिक तकनीक और प्राचीन तरीके के मिश्रण से लोगों के दिलोदिमाग में तरह-तरह के जहर घोल रहे हैं।

झूठ, फरेब और वैमनस्यता के इस सुनियोजित प्रचार को रोकने के लिए जिन प्रगतिशील, जानकार संतुलित समाज के लोगों को आगे आना चाहिए, वे चुप्पी साधे बैठे हैं। लेखकों, कलाकारों, वीडियो, वेबीनार, अपनी कविता, कहानी से ही खुश हैं। ऐसे लोगों ने अपने आसपास ऐसा घेरा बना लिया है जिसमें इन्हें केवल अपनी ही बातें सुनाई, दिखाई देती हैं। ये आमजन के बीच किसी तरह की बातें फैलाई जा रही हैं, उसका खुलकर प्रतिरोध नहीं करते। जो लोग अलग-अलग संगठनों में दफ्तरों, संस्थानों में रहकर काम करते हुए अपने सामूहिक हितों, मांगों के लिए नारे लगाते हैं कि हम सब एक हैं, हर जोर जुर्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है, कर्मचारी एकता जिंदाबाद के नारे लगाते हैं। अपने वेतन भत्ते, लोगों के लिए लामबंद होकर एकजुटता दिखाते हैं, ऐसे लोग अपने-अपने समूह में जातिगत, सांप्रदायिक और विध्वंसकारी पोस्टों का या तो समर्थन करते हैं या खामोश रहते हैं।

सरकार ने कोरोना वायरस महामारी के बारे में इंटरनेट पर फैलाई जा रही भ्रामक खबरों/रपटों पर गंभीर रुख अपनाया है। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने सोशल मीडिया कंपनियों से ऐसी खबरों को तत्काल अपने—अपने मंच से हटाने को कहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ट्वीट कर कहा है कि इंटरनेट पर फैली गलत जानकारियों से खुद को और अपने दोस्तों को गुमराह न होने दें। सही जानकारी साझा करके गलत जानकारी के विरुद्ध अभियान में योगदान दें।

जनसत्ता के संपादक रहे जयपुर के हरिदेव जोशी पत्रकारिता और जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलपति ओम थानवी का कहना है 'सोशल और अनसोशल हर तरह के लोग समाज में हैं, लेकिन ये कहना होगा कि बीते कुछ समय से (मीडिया में) थोड़ी सी अनसोशल एक्टिविटी बढ़ गई है बल्कि कहना चाहिए कि स्पॉन्सर्ड एक्टिविटी बढ़ गई है।Ó इसकी वजह यह है कि मीडिया खुद भी पेड एक्टिविटी में शामिल हो गया है। पेड न्यूज का दायरा बढ़कर पेड पार्टिसिपेशन तक आ गया है। सुशांत सिंह राजपूत खुदकुशी केस में मुख्य आरोपी रिया चक्रवर्ती ने सुप्रीम कोर्ट में सोमवार में याचिका दाखिल करते हुए पक्षपातपूर्ण मीडिया ट्रायल और उन्हें दोषी साबित करने की कोशिश का आरोप लगाया है। रिया चक्रवर्ती ने मीडिया ट्रायल को निजता का हनन बताया है ।

सरकार ने मीडिया पर आने वाली अनर्गल बातों को रोकने के प्रयास भी किया है। ब्रॉडकास्टिंग बिल 1997 और ब्रॉडकास्टिंग सर्विसेज रेगुलेशन बिल 2006 भी प्रस्तावित किया गया था, लेकिन यह अभी कानून में परिणित नहीं हो सका है। 1996 के विधेयक ने क्रॉस मीडिया स्वामित्व, विदेशी स्वामित्व का निषेध किया और प्रस्तावित किया कि किसी भी विज्ञापन एजेंसियों, राजनीतिक या धार्मिक निकायों और सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित निकायों को टेलीविजन चैनलों के लिए लाइसेंस नहीं दिया जाएगा। इसने ब्रॉडकास्टिंग अथॉरिटी ऑफ इंडिया की स्थापना की भी मांग की। वर्तमान में भारत में नेट न्यूट्रैलिटी को नियंत्रित करने वाला कोई विशिष्ट कानून या अधिनियम नहीं है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए स्टैंडर्ड तय करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। केंद्र सरकार ने कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है। केंद्र ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पहले डिजिटल मीडिया को देखना चाहिए। मुख्यधारा के मीडिया में प्रकाशन और प्रसारण तो एक बार का कार्य होता है, लेकिन डिजिटल मीडिया की व्यापक रूप से दर्शकों की भारी संख्या, पाठक संख्या तक पहुंच है और इसमें व्हाट्सएप, ट्विटर, फेसबुक जैसे कई इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के कारण वायरल होने की संभावना रहती है। कोरोना संक्रमण के बीच अफवाहों का बाजार भी गर्माया हुआ है। सोशल मीडिया के माध्यम से कोरोना पॉजिटिव को सरकार की ओर से डेढ़ लाख रुपये दिये जाने की अफवाह इन दिनों जोरों पर है।

हम सबकी खासकर उस समूह के एडिमिन और बाकी लोगों की जिम्मेदारी है की वे ऐसी किसी पोस्ट को, जानकारी को शेयर नहीं करें जिसकी प्रमाणिकता के बारे में उन्हे नहीं मालूम। बहुत सारे लोग जाने अंजाने उस गुनाह में शरीक हो रहे हैं जो वो करना भी नहीं चाहते। जिस सच को वास्तविकता को हम नहीं जानते, जो हमारा अपना अनुभव संसार नहीं है हम ऐसी बातें क्यों शेयर करें। अपने ही कातिलों को अपना मुंसिफ ना बनने दें।