कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः इबादत रह जाती है शेष

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः इबादत रह जाती है शेष


स्वार्थरहित जीवन की

कविता में बसी अयोध्या

परमार्थ की प्रेमकथा में

बसी हुई है मथुरा

मृत्यु का मार्ग प्रकाशित करती

कई जन्मों से काशी


हृदय की गहराई में सरजू

नयनों में यमुना नहीं सूखती

मस्तक से उतरी गंगा में

आज तक नहीं मिटा प्रतिबिम्ब

जलती हुई चिताओं का


नहीं सूखती किसी देह में

भागवत इतिहासों की धारा

स्मृति में नहीं उजड़ते नगर

बसते रहते हैं कई बार

सदियाँ बीतीं थक गये सितमगर

ढोते अपनी लूट-मार का इतिहास


इबादत रह जाती है शेष

सुबह-शाम की रौशनियों में

किस का देश, कहाँ परदेस

कौन पराजित कौन विजेता

प्रत्येक दिशा में काशी-काबा

प्रकाश पर किस का दावा

आग सभी ने तापी

खुली ग्यान की वापी

हम पाये राम रहीम


मेरी प्रार्थना में राम जैसे हिन्द के इमाम

घनश्याम के गेसू जैसे फ़ारसी की लाम

ख़ाक-सी यह ज़िन्दगी जैसे काशी धाम


जीते-जी सब हों उदार

किसी एक पर क्यों हो यह भार

कोई कब तक रोता रहे अकेले में

किस से माँगे और किसे दे सन्मति


किसी की सुनता नहीं आसमान

जहाँ खो जाता है कीर्तन

वहीं ढूँढे न मिले अजान