प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - गोबर बना कमाई का जरिया

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - गोबर बना कमाई का जरिया

गोबर जैसी चीज से भी 46 हजार से भी अधिक लोग 15 दिनों में एक करोड़ 65 लाख रूपये कमा सकते हैं, ऐसा उन्होंने पहले नहीं सोचा होगा, लेकिन जब उनके बैंक खाते में ऑनलाइन यह राशि अंतरित होकर पहुंच चुकी है, तब उन्हें विश्वास हो गया है कि हमारी संस्कृति में गौ-पालन का क्या महत्व है। हमारे पूर्वज घर में पशुधन पालकर उनकी बच्चों की तरह देखभाल क्यों करते हैं। क्यों एक लेखक कहानी के जरिये गाय के लिए कहता है 'नंदिनी तुम बनकर रहो, मेरे हृदय की नंदिनी। क्यों बच्चों को गाय को गौमाता की तरह पूजने की सीख ही जाती है। दरअसल हमारी समूची ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी है, हमारे पशु धन।

मुंशी प्रेमचंद के मशहूर उपन्यास गोदान का होरी क्यों एक गाय की इच्छा के साथ जीता है? क्यों उसकी गाय के चले जाने से उस पर दुख का पहाड़ टूट पड़ता है। ऐसी बहुत सारी बातें हैं जिनको ध्यान में रखकर छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल ने यह योजना बनाई है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां 46964 गोबर विक्रेताओं से एक करोड़ 65 लाख रूपये का गोबर खरीदा गया। वहीं शहरीय क्षेत्र में गोधन न्याय योजना में अभी तक दस हजार पशुपालकों ने शहरी क्षेत्र में गोबर विक्रय हेतु पंजीयन कराया है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपनी इस अनूठी योजना को लेकर बहुत उत्साहित है। इस योजना से ग्रामीणों, किसानों और पशु पालकों के जीवन में बदलाव आयेगा।
इसे बहुआयामी योजना को ग्रामीण क्षेत्र के बहुत सारे लोगों के हितों का ध्यान रखकर बनाया गया है। इस अवधारणा को यदि समझा जाये तो इसमें लाभान्वित पशुपालक जिन्हें 2 रूपये प्रति गोबर से सीधा लाभ होगा। पर्यावरण की साफ -सफाई, मिट्टी की उर्वरता, आवारा पशुओं से मुक्ति के जरिये लाभ होगा। गोठान प्रबंध समिति को वितीय मदद से ग्रामीण के रूप में उपस्थित चरवाहा प्रतिनिधि, महिला और पुरूष प्रतिनिधि को अप्रत्यक्ष लाभ होगा। पशुधन विचरण एवं खुली चराई पर रोक लगेगी। जैविक खाद के उपयोग को बढ़ावा एवं रासायानिक उर्वरक उपयोग में कमी आयेगी। खरीफ एवं रबी फसल सुरक्षा एवं द्विफसलीय क्षेत्र विस्तार होगा। स्थानीय स्तर पर जैविक खाद की उपलब्धता होगी। स्थानीय स्व सहायता समूहों को रोजगार के अवसर मिलेंगे। भूमि की उर्वरता में सुधार, विष रहित खाद्य पदार्थों की उपलब्धता होगी और सुपोषण होगा।

गोधन न्याय योजना को लेकर बहुत सी कमियां और बहुत से सवाल भी उठे है। योजना में अभी तक डेयरी संचालकों, गोठान ग्रामो के किसानो की सहभागिता मिली है, जबकि आमजन योजना से वंचित है। राज्य सरकार द्वारा वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन हेतु गाईडलाईन के बावजूद गोठानो में अपने मनमर्जी से स्ट्रक्चर तैयार किये जा रहे है। ऊंचाई दो फीट की बजाय कही-कही 3 से 4 फीट रखी जा रही है। एक गोठान की क्या क्षमता है, इसमें कितने जानवर होगे, कितना गोबर खरीदा जायेगा, कितने वर्मीकम्पोस्ट टांके निर्मित होगे, कितना उत्पादन होगा, इसका भी कोई स्पष्ट आंकलन या मापदण्ड निर्धारित नहीं है।

योजना में वित्तीय पूर्ति किस तरह से की जाएगी, इस संबंध में कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है। गोबर की खरीदी और वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन कही ओर किया जा रहा है। गोठानो में पूर्व से नाडेप खाद तैयार की जा रही है, इसकी ब्रिकी के संबंध में कोई निर्देश नहीं दिये गये है। गोबर की खरीदी और ब्रिकी के लिये जीएसटीएन नंबर आवश्यक है। जिसके अभाव में बिल पास करने में कठिनाईयां संभावित है। सरकार को वर्मीकम्पोस्ट की ब्रिकी बढ़ाने और इसे नियमित बनाये रखने हेतु भण्डार क्रय नियमो में छूट देनी चाहिये। कुछ गोठान ग्रामीण या शहरी बस्ती से दूर बनाये गये है, जहां पशु नहीं रहते है। अधिकारियो की टीम या किसी अन्य मॉनिटरिंग टीम आने पर पशुओ को जबरिया लाया जाता है। राज्य सरकार द्वारा उर्वरको, सिटी कम्पोस्ट पर किसानो को सब्सिडी दी जाती है। इसी तरह वर्मीकम्पोस्ट पर भी न्यूनतम सब्सिडी देनी चाहिये ताकि किसानो का जैविक खाद के उपयोगिता की ओर रुझान बढ़ें। राज्य में पूर्व से ही तैयार किये जा रहे वर्मीकम्पोस्ट की ब्रिकी के विषय में कोई निर्देश नहीं है।

गोठानों में गोबर का उपयोग केवल वर्मी कंपोस्ट बनाने के लिए किया जाना प्रावधानित है। उपलब्ध या निर्मित की जा रही अधोसंरचना के पूर्ण भराव के बाद शेष गोबर के वैकल्पिक उपयोग को बढ़ावा देने का प्रावधान किया जाना चाहिए। शासन द्वारा कृषको को अत्यधिक लाभ से संबंधित व्यक्तिगत सफलताओ के कुछ उदाहरणों को प्रसारित किया जा रहा है। क्या स्वयं के पशुओं से इतना गोबर उत्पादन वास्तविकता में हो रहा है, इस पर परीक्षण भी आवश्यक है। वर्मी कम्पोस्ट की गुणवत्ता क्या निर्धारित मापदंडों के अनुरूप है? क्या किसी जिला विशेष में एक ब्रांड नेम से विक्रय किया जा रहा कम्पोस्ट (जो वस्तुत: विभिन्न गोठानो से अलग-अलग लाट के रूप में प्राप्त होगा) का समस्त लाट निर्धारित गुणवत्ता रखता है? ये सुनिश्चित करने की क्या व्यवस्था है? वर्मी कम्पोस्ट का विक्रय सहकारी समितियों के माध्यम से किया जाएगा। चूंकि रासायनिक उर्वरकों की तुलना में कम्पोस्ट की आवश्यकता बहुत अधिक होगी, अत: पूर्व अनुसार फसल उत्पादकता प्राप्त करने क्या कृषक इन्हें रासायनिक खाद के विकल्प के रूप में स्वीकार कर सकेंगे? इससे उत्पादन लागत में वृद्धि होगी अथवा कमी? इन सब बिंदुओं पर विस्तृत अर्थशास्त्रीय विवेचना आवश्यक होगी।

भूपेश बघेल सरकार की इस योजना से आरएसएस के भी जुडऩे की मंशा को लेकर प्रचारक भुनेश्वर साहू ने कहा कि 'यदि सरकार चाहे तो हम उसके इस अभियान में पूरी कंसल्टेंसी दे सकते हैं। हमारे पास गाय के गोबर और गौमूत्र से वर्मीकम्पोस्ट और कीटनाशक बनाने की विशेषज्ञता है, जिसका इस्तेमाल हम किसानों को उचित प्रशिक्षण देकर पिछले कई महीनों से कर रहे हैं। हमने प्रदेश भर में 4 नवंबर 2019 को गौ ग्राम स्वावलंबन अभियान की शुरुआत की। अन्य प्रचारक सुबोध राठी कहते हैं, 'हम सरकार द्वारा ग्रामीणों के विकास और उनको आर्थिक तौर पर मजबूत करने की हर मुहिम में मदद करने को तैयार हैं। ग्रामीण आर्थिकी के लिए गोबर और गौमूत्र का बिजऩेस मॉडल हो सकता है।

वहीं विपक्ष जिसका काम हर योजना, कार्य की आलोचना करना होकर रह गया है। गोबर इकोनॉमिक्स की संज्ञा देकर इसका मजाक उड़ाया था। पूर्व कैबिनेट मंत्री अजय चंद्राकर ने अपने एक ट्वीट में कहा था कि गोबर के महत्व को देखते हुए अब इसे राज्य का प्रतीक चिन्ह बना देना चाहिए। नेता धरमलाल कौशिक ने कहा कहा कि प्रदेशवासियों के सपनों को गुड़ गोबर कर रही है। बेरोजगारों और खोखले दावों के बीच जनता के साथ न्याय नहीं, अन्याय कर रही है। भूपेश सरकार ने 15 महीनों में सब गुड़ गोबर कर दिया।

गोधन न्याय योजना के बारे में कोई कुछ भी कहे यह योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बदलाव के लिए मिल का पत्थर साबित हो सकती है, बशर्ते इसका सही ढंग से क्रियान्वयन हो। आर्थिक तंगी से जूझ रही छत्तीसगढ़ सरकार ने अपनी प्राथमिकता वाली इस योजना के लिए उसने गोठानों में वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन हेतु कुल 332. 68 करोड़ रूपये का अनावर्ती व्यय तथा प्रथम दो चक्र हेतु 154.81 करोड़ का आवर्ती व्यय के पूर्ति की स्वीकृति दी है। अब गुड़ गोबर नहीं बल्कि गोबर अब गुड़ होने जा रहा है। चूंकि यह हमारे राज्य की सबसे आनोखी और अनुकरणीय योजना है इसलिए हमें प्रारंभ में ही इन सारी बातों का ख्याल रखना होगा।