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जन्मदिन: क्या कश्मीर समस्या का हल विनोबा भावे की उस पहल में छिपा है जिसकी तरफ हम देखना भी नहीं चाहते?

जन्मदिन: क्या कश्मीर समस्या का हल विनोबा भावे की उस पहल में छिपा है जिसकी तरफ हम देखना भी नहीं चाहते?

अव्यक्त

भारत की ओर से कश्मीर के सवाल का एक अहिंसक, सर्वमान्य और सम्मानजनक हल निकालने का जो प्रयास 1964 में हुआ, उसे अब तक का सबसे गंभीर प्रयास माना जा सकता है. तब इसके केंद्र में रहे तीन प्रमुख किरदारों का प्रचलित राजनीति से कोई खास लेना-देना नहीं था. सार्वजनिक जीवन में इन तीनों किरदारों की पहचान खालिस राजनेताओं के बजाय लोकनायकों के रूप में ज्यादा थी. उनकी अपील सियासी न होकर, रूहानी ज्यादा थी. ये तीन शख़्सियतें थीं- चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण. इस मसले से जुड़े दोनों ही शीर्ष सियासतदानों यानी नेहरू और शेख अब्दुल्ला ने इन तीनों को ही अपने मार्गदर्शक के रूप में चुनकर स्वयं को केवल संवादिया और माध्यम की भूमिका में ढालने का विनम्र साहस दिखाया था. आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा? क्या उन्होंने अपने लंबे सियासी जीवन के बाद सियासत की सीमाओं को भांप लिया था?

राजगोपालाचारी ने एकाधिक अवसरों पर कश्मीरियों के लिए आत्मनिर्णय और मानाधिकार से भरे जीवन का समर्थन किया था. आत्मनिर्णय और मानाधिकार या डिग्निटी का उनका दायरा महज राजनीतिक अधिकारों से कहीं आगे तक जाता था, क्योंकि एक कुशल राजनीतिक द्रष्टा और कर्मयोगी होने के बावजूद उनके जीवन का एक आध्यात्मिक पक्ष भी था. जयप्रकाश नारायण उस समय शायद उन गिने-चुने भारतीयों में से होंगे जिन्होंने भारत द्वारा कश्मीर में कराए गए आम चुनावों को ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ मानने से इन्कार कर दिया था. आज़ादी के बाद जब कांग्रेस सरकार ने शेख अब्दुल्ला को जेल में डाला, तो जेपी ने इसकी कठोर आलोचना करते हुए कहा था- ‘यह सोचने की बात है कि किस तरह बीते कल के स्वतंत्रता सेनानी लोग इतनी सहजता से साम्राज्यवादियों की भाषा बोलने लग जाते हैं.’

जहां तक इसके तीसरे किरदार यानी विनोबा भावे की बात है, तो उनका जीवन ही अहिंसा और प्रेम की साधना में बीता था. इसलिए कश्मीर जैसे विषय पर उनकी भाषा और उनका प्रयास दूर-दूर तक कहीं से राजनीतिक नहीं था. हालांकि इसके कहीं ज्यादा दूरगामी राजनीतिक प्रभाव भी हो सकते थे. समूचे देश को पैर से नापकर सबके हृदय में निश्छल प्रेम जगा देने वाला यह ‘बाबा’ पहले ही कश्मीर की यात्रा कर चुका था. मई 1958 के आखिर में महाराष्ट्र के पंढरपुर में हुए सर्वोदय सम्मेलन में विनोबा ने सार्वजनिक रूप से यह इच्छा प्रकट की थी कि वे कश्मीर की यात्रा पर जाना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें स्वयं वहां जाकर वहां के लोगों से मिलकर इस मसले को, उनके दुःखों को समझना है. लगभग एक साल बाद 22 मई, 1959 को उनके पैर कश्मीर की धरती को भी वैसी ही पदचापों से तरंगित कर रहे थे, जैसे वे अब तक भारत के दूसरे हिस्सों में करते रहे थे. कश्मीर में विनोबा की पदयात्रा लगातार चार महीनों तक चली थी.

कश्मीर में प्रवेश करने से पहले उन्होंने कहा था- ‘मैं एक शांति सैनिक के रूप में कश्मीर जा रहा हूं.’ विनोबा के साथ गए स्त्री-पुरुषों की टोली यह गीत गाती चलती -

शांति के सिपाही चले, क्रांति के सिपाही चले,

लेके खैरख्वाहि चले, रोकने तबाही चले.

वैर-भाव तोड़ने, दिल को दिल से जोड़ने,

काम को संवारने, जान अपनी वारने.. शांति के......

वहां पहुंचते ही उन्होंने कहा - ‘कश्मीर में मेरी अपनी कोई योजना नहीं है. मैंने सब भगवान् पर छोड़ दिया है. अगर भगवान् चाहेगा तो मैं यहां तीन काम करूंगा. मैं देखूंगा, मैं सुनूंगा और मैं प्रेम करूंगा. भगवान ने प्रेम करने की जितनी ताकत मुझे दी है, उस सारी ताकत को मैं यहां खर्च करना चाहूंगा. कम पड़ेगी तो मैं उससे और मांग लूंगा. मुझे बोलना ही पड़ा, तो प्रेम करने के लिए बोलूंगा. अधिक बोलूंगा ही नहीं.’ बिना शर्त रूहानी मुहब्बत के ऐसे पैगाम के साथ विनोबा कश्मीर पहुंचे थे.

विनोबा के कश्मीर पहुंचने पर वहां के तत्कालीन प्रधानमंत्री बख़्शी ग़ुलाम मुहम्मद ने उनसे मिलकर घोषणा की कि पूरे कश्मीर की सरकारी जमीन भूदान आंदोलन के लिए दान की जा सकती है. विनोबा ने इसका स्वागत करते हुए इसे एक व्यावहारिक लक्ष्य बताया था. चूंकि विनोबा कोई सरकारी आतिथ्य या आधिकारिक बंधनों से बंधे व्यक्तित्व नहीं थे, इसलिए उनसे मिलने वहां के सभी राजनीतिक पक्षों के लोग पहुंचे. सबने खुलकर अपनी बात रखी. शेख अब्दुल्ला उन दिनों जेल में थे. विनोबा उनसे भी जेल में मिले.

लेकिन विनोबा का असल काम था लोगों के बीच घूम-घूम कर प्रेम का संदेश फैलाना और हृदय जोड़ना. इसलिए वे कश्मीर के दुरूह से दुरूह इलाकों में पैदल निकल पड़ते. दूर-दराज के गांवों में जाते. लोगों के साथ खूब घुलते-मिलते. वे वहां ऐसे सुदूर गांवों तक में पहुंचे, जहां बाहर का कोई आदमी शायद ही कभी पहुंचता हो. वे घर-घर जाते, परिवार के सभी सदस्यों से बात करते और उनके सुख-दुःख जानते.

कश्मीर में जहां कहीं भी विनोबा गए, लोगों ने भूदान में अपनी जमीनें दान कीं. इसपर एक रोचक और कारुणिक प्रसंग भी है. एक दिन एक कश्मीरी भाई अपनी जमीन दान करने आए. उन्होंने कहा कि उनकी बेगम ने उन्हें भेजा है. दरअसल उस बहन ने किसी अखबार में विनोबा का फोटो देखा जिसमें वे किसी का हाथ पकड़कर किसी कठिन पहाड़ी रास्ते को पार कर रहे थे. उस फोटो को देखकर उस बहन को लगा कि यह शख्स गरीबों के वास्ते इतनी तकलीफ उठाता है, इसलिए इसे जमीन न दें तो ठीक नहीं होगा. विनोबा ने इस घटना पर कहा था- ‘जिस औरत को वह तस्वीर देखकर अंदर से यह सूझ आई कि हमें गरीबों के वास्ते कुछ करना चाहिए, उसके तमद्दुन (सभ्यता) में क्या कुछ कमी है! मैं मानता हूं कि पीरपंजाल की साढ़े तेरह हजार फुट की जिस ऊंचाई पर मैं चढ़ा था, उस पहाड़ से भी उस बहन की ऊंचाई ज्यादा है.’

अपनी यात्रा के निचोड़ के रूप में सार्वजनिक रूप से उन्होंने कहा था- ‘अगर कश्मीर के सवाल को हल करना है, तो राजनीतिक और साम्प्रदायिक दोनों पद्धतियां छोड़नी पड़ेंगी और आत्मिक या आध्यात्मिक पद्धति अपनानी होगी. ...राजनीति मनुष्यों को जोड़ने के बदले तोड़ने का काम करती है, और उसके कारण कड़ुवाहट और झगड़े पैदा होते हैं. विज्ञान युग में यह बहुत हानिकारक है. इसलिए अब विज्ञान के साथ आध्यात्मिकता को जोड़ने की बहुत आवश्यकता है. इस आध्यात्मिकता का अर्थ धर्म अथवा संप्रदाय नहीं है. आज के विज्ञान-युग में अब राजनीति और संप्रदाय के दिन लद चुके हैं.’

विनोबा कश्मीर में प्रायः कहते कि धर्म (मजहब) अलग चीज है और रूहानियत (अध्यात्म) अलग. मजहब हमें बांटता, तोड़ता और लड़ाता है, जबकि रूहानियत हमें एक-दूसरे से जोड़ती है. गणित को ही अपनी समस्त चिंतन का आधार बनाने वाले विनोबा ने कश्मीर यात्रा के दौरान अपने एक सार्वजनिक संबोधन में ही एक अनोखा समीकरण दिया था-

‘विज्ञान + राजनीति = सर्वनाश

विज्ञान + अध्यात्म = सर्वोदय’

कश्मीर यात्रा के दौरान विनोबा को कई बार युद्धविराम रेखा के निकट से गुजरने का अवसर मिलता. उन्हें सीमा के दोनों ही तरफ के सैन्य जवानों की स्थिति देखकर बड़ा दुःख होता. वे कहते कि देशभक्ति और निष्ठा तो ठीक है, लेकिन आपसी भय और अविश्वास के चलते दोनों ही तरफ के जवानों को दिन-रात चौबीसो घंटे अपना समय बेकारी में गुजारना पड़ता है. तभी किसी ने एक सफेद जीप की ओर इशारा करते हुए विनोबा को बताया कि वह देखिये, संयुक्त राष्ट्र संघ की जीप है. इस पर विनोबा की टिप्पणी थी, ‘अच्छा, तो यहां तीसरे तरह के निरुद्योग लोग भी मौजूद हैं.’ उन्होंने यह भी कहा कि यह युद्धविराम रेखा नाम ही एक मिथ्या और असंगत शब्द है, क्योंकि जब इसके दोनों तरफ हजारों सैनिक तैनात हों, तो यह वास्तव में युद्ध-के-लिए-तैयार-रहो रेखा हो जाती है.’

विनोबा प्रायः सालों पदयात्राएं ही करते रहते. लेकिन प्रधानमंत्री नेहरू जब-तब समय निकालकर कम से कम साल एक बार उनसे मिलने अवश्य जाते, चाहे वे जहां कहीं भी हों. ऐसा ही एक अवसर 2 अप्रैल, 1960 को आया जब हरियाणा के पट्टीकल्याण आश्रम में लगे विनोबा के शिविर की एक कुटिया में पंडित नेहरू और विनोबा की मुलाकात हुई. अन्य मामलों के बाद जब यह बातचीत कश्मीर के मसले पर पहुंची तो पंडित नेहरू ने कश्मीर के तत्कालीन प्रधानंत्री बख़्शी ग़ुलाम मुहम्मद की भ्रष्ट सरकार पर चुटकी लेते हुए कहा कि ‘कश्मीर में भी एक बीबीसी है. इसके माने है बख़्शी ब्रदर्स एंड कंपनी.’ विनोबा ने इस मसले के हल के लिए एबीसी. की सलाह दी. यानि अफगानिस्तान, बर्मा और सीलोन (श्रीलंका) के त्रिकोण को शामिल करते हुए भारत, पाकिस्तान और कश्मीर का एक कन्फेडरेशन बनना चाहिए. उनके मुताबिक अपने इतिहास और संस्कृति के स्तर पर ये देश एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं और कश्मीर के सवाल का शान्तिपूर्ण हल भी इसी में समाया हुआ है. विनोबा ने यह भी कहा था कि भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, रूस और अमेरिका ये छह देश किसी न किसी रूप में कश्मीर समस्या से जुड़े हुए हैं और ये सभी देश यदि कश्मीर को स्विटजरलैंड का दर्जा देने को तैयार हो जाएं, तो एक रास्ता निकल सकता है.

अब आखिर में कश्मीर मसले को सुलझाने की उस आखिरी गंभीर पहल की कहानी जिससे हमने बात शुरू की थी, और जिसमें विनोबा की भी अहम भूमिका थी. 1964 में जेल से अपनी रिहाई के तुरंत बाद शेख अब्दुल्ला ने विनोबा और राजगोपालाचारी से मिलने के अपने निर्णय की सार्वजनिक घोषणा की. मद्रास में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी से मिलने से पहले वे 3 मई, 1964 को नागपुर होते हुए विनोबा से मिलने बजाजवाड़ी पहुंचे. दोनों के बीच खुलकर कश्मीर से जुड़े हर पहलू पर बातचीत हुई.

शेख अब्दुल्ला ने इसी क्रम में जयप्रकाश नारायण से भी बातचीत की. इस पूरे प्रयास को नेहरू का समर्थन हासिल था. इन तीनों के साथ शेख अब्दुल्लाह की बातचीत से यह निष्कर्ष निकला कि भारत, पाकिस्तान और कश्मीर को मिलाकर एक कन्फेडरेशन या परिसंघ बने, और कश्मीर का विभाजन या अलगाव कभी भी केवल सांप्रदायिक बुनियाद पर न हो. शेख को यह विचार मंजूर था. वे तत्कालीन कश्मीर के जनमानस और समन्वयकारी संस्कृति से बखूबी वाकिफ थे. सांप्रदायिक आधार पर कश्मीर को खड़ा करने या कश्मीर की इस्लामी पहचान बनाने के किसी भी प्रयास के वे खिलाफ थे और इसलिए उन्होंने कश्मीर के उस समय के सबसे बड़े धार्मिक नेता मौलवी फारूक़ी को भी इसके लिए मनाने की कोशिश की थी.

इस दौर में नेहरू प्रायः अस्वस्थ रहने लगे थे. अब्दुल्ला ने नेहरू के साथ उनके आवास तीनमूर्ति भवन में काफी समय बिताया और जेपी, विनोबा और राजाजी से मिले विचारों के आधार पर एक दूरगामी समाधान तलाशने की कोशिश की. आखिरकार 24 मई, 1964 को शेख अब्दुल्ला पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान से मिलने पाकिस्तान गए. दो दिनों तक दोनों के बीच गहन बातचीत हुई. माना जाता है कि शुरूआती हिचक के बावजूद राष्ट्रपति अयूब प्रधानमंत्री नेहरू के साथ अगले महीने नई दिल्ली में एक ऐसी बैठक के लिए राजी हो गए थे जिसमें शेख अब्दुल्ला भी मौजूद रहते. लेकिन 27 मई को जब शेख अब्दुल्ला पाकिस्तानी हिस्से वाले कश्मीर के मुजफ्फराबाद के दौरे पर थे, तब उन्हें पंडित नेहरू के निधन का दुःखद समाचार मिला और वे तत्काल ही फफक कर रो पड़े. अगले दिन दिल्ली वापस आकर वे नेहरू के पार्थिव शरीर से लिपट कर भी बच्चों की तरह रोए थे.

आगे का इतिहास भारत-पाकिस्तान के बीच तीन युद्धों और लगातार युद्धरत परिस्थितियों का रहा है. तब से अब तक कश्मीर पर होनेवाले सभी प्रयासों का रंग सियासी ही ज्यादा रहा है. उसे इंसानी और रूहानी नजरिए से देखने के प्रयास कम ही हुए हैं. बेहिसाब खून बहा है. कोई बताए कि कश्मीर के सभी तबकों और हमारी सेनाओं के जख्म, दर्द, आंसू और चीत्कार का हिसाब किस सियासी नजरिए से हम कर पाएंगे. आज हमारे बीच ऐसे निर्भयी, निर्वैर और निष्पक्ष लोग शायद ही बचे हैं, जिनकी करुणा और संवेदना असंदिग्ध हो और जिन पर कश्मीर से जुड़े सभी पक्षों को भरोसा हो पाए. रूहानी व्यापकताओं को सियासी संकीर्णताएं लील गईं हैं. और हम अभी भी तेरा कश्मीर-मेरा कश्मीर-किसका कश्मीर, हार-जीत-कूटनीति, हिन्दुस्तान-पाकिस्तान-बलूचिस्तान, ये पार्टी-वो पार्टी-सर्व पार्टी और पैलेट गन की हां या ना में उलझे हुए हैं.(satyagrah.com)