breaking news New

अतंरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस: भारत का प्रजातंत्र खतरे में

अतंरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस: भारत का प्रजातंत्र खतरे में

जीतेश्वरी

सुकरात के महान शिष्य प्लेटो ने ईसा पूर्व की चैथी शताब्दी में ही ’दि रिपब्लिक’ जैसे ग्रंथ की रचना कर प्रजातंत्र की आधारशिला रख दी थी। यूरोप के पूनर्जागरण ने सम्पूर्ण यूरोप में जिस ज्ञानोदय युग का शुभारंभ किया उसने राज्यसत्ता और चर्च दोनों को चुनौती दी, जिसके फलस्वरूप यूरोप में सर्वप्रथम प्रजातंत्र की नींव पड़ी। इंग्लैण्ड में 17वीं शताब्दीं में ही लोकतंत्र का उदय हो गया था। 

प्रजातंत्र के विषय में अब्राहम लिंकन की इस परिभाषा को हमेशा याद रखा जाना चाहिए ’ लोकतंत्र (प्रजापंत्र) जनता का, जनता के लिए, जनता का शासन है’। प्रजातंत्र एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था है जिसमें जनता अपने लिए सरकार का चुनाव करती है। जनता द्वारा चुनी हुई सरकार जनता की प्राथमिकताओं का ध्यान रखती हैं। प्रजातंत्र में सभी मनुष्य के अधिकार बराबर होते हैं, न कोई बड़ा होता है और न कोई छोटा होता है। सभी धर्म और मजहब के लोगों को बराबर का दर्जा दिया जाता है। स्त्री और पुरूष दोनों को अपने निर्णय लेने की स्वतंत्रता रहती है। 

आज सम्पूर्ण विश्व में संसदीय व्यवस्था कायम है। इस संसदीय व्यवस्था के द्वारा ही सम्पूर्ण देशों में शासन संचालित किए जाते हंै। संसदीय व्यवस्था में प्रतिनिधियों का चुनाव वहां की जनता के द्वारा किया जाता है। संसदीय व्यवस्था ही प्रजातंत्र का आधारस्तंभ है। न्यायपालिका और कार्यपालिका संसदीय व्यवस्था के परिचायक हैं तथा वे इसमें कारगर भूमिका का निर्वहन भी करते हंै। मीडिया प्रजातंत्र का चैथा आधार स्तंभ माना जाता है। प्रजातंत्र के इन चार आधार स्तंभों में से कोई भी स्तंभ अगर कमजोर हुआ तो प्रजातंत्र की इमारत का सुरक्षित रह पाना असंभव है। कोई भी देश या कोई भी सरकार अगर इनमें से किसी को भी खंडित करने का प्रयास करता है तो निसंदेह वह उस देश की प्रजातंत्र के लिए घातक घातक है। 

भारत के संदर्भ में रोमिला थापर, इरफान हबीब, अरूंधति राय, रामचंद्र गुहा जैसे बुध्दिजीवियों का मानना है कि भारत में प्रजातंत्र आज खतरे में है। भाजपा के सत्तारूढ़ होने के पश्चात् भारत में धार्मिक कट्टरता और असहिष्णुता जिस तेजी से बढ़ी है वह प्रजातंत्र के लिए बेहद खतरनाक है। माबलींचिंग जैसी घटनाओं, गौरी लंकेश, कलबुर्गी जैसे बुध्दिजीवियों की हत्याओं से हमारा लोकतंत्र शर्मशार हुआ है। न्यायपालिका की स्थिति यह है कि सवौच्च न्यायालय के चार न्यायधीशों को प्रेस वार्ता बुलाकर यह कहना पड़ा कि न्यायपालिका सहित देश का प्रजातंत्र भी खतरे में है। 

कश्मीर से आर्टिकल 370 और 35ए को हटा दिए जाने के पश्चात् कश्मीर में प्रजातंत्र को ही जैसे समाप्त कर दिया गया है। आज आलम यह है कि कन्नन गोपीनाथन और शशिकांत सेंथिल जैसे आईएएस अधिकारियों को त्यागपत्र देकर अपनी बात कहने की जरूरत पड़ रही है।

आज प्रजातंत्र दिवस पर भारत में प्रजातंत्र पर हो रहे हमलों को, उस पर मंडराते हुए खतरों को भी समझे जाने की आवश्यकता है।