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पश्चाताप की राख से बनीं 'अगरबत्ती' से उपजा स्त्रियों का शोकगीत, मुक्तिबोध राष्ट्रीय नाट्य समारोह का समापन, दिसंबर में हबीब तनवीर स्मृति नाटय स्पर्धा

पश्चाताप की राख से बनीं 'अगरबत्ती' से उपजा स्त्रियों का शोकगीत, मुक्तिबोध राष्ट्रीय नाट्य समारोह का समापन, दिसंबर में हबीब तनवीर स्मृति नाटय स्पर्धा

रायपुर. छत्तीसगढ़ फ़िल्म एंड विजुअल आर्ट सोसाइटी द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय मुक्तिबोध राष्ट्रीय नाट्य समारोह के अंतिम दिन रायपुर के मुक्ताकाशी मंच पर आशीष पाठक लिखित और स्वाति दुबे द्वारा निर्देशित नाटक अगरबत्ती ने अपनी शानदार और मर्म स्पर्शी प्रस्तुति से स्त्रियों की व्यथा, शोषण और जातिगत व्यवस्था की बारीकियों को उजागर कर ऐसा शोकगीत रचा जो दर्शकों की संवेदना को भीतर तक झकझोर गया. पश्चाताप की राख से बनीं अगरबत्ती से उपजे स्त्रियों का यह शोकगीत बहुत अरसे तक ज़ेहन में बना रहेगा और डिस्टर्ब करेगा.

सिर्फ महिला पात्रों पर केंद्रित नाटक अगरबत्ती में जाति, लिंग, वर्ग, मतभेद और राजनीति की दिलचस्प कहानी दिखाई गई. इस नाटक का कथानक फूलन देवी के बेहमई नरसंहार की पृष्ठभूमि पर आधारित है. यह नाटक जातीय प्रेरणा से हुई फूलनदेवी की हत्या पर भी प्रश्न उठाता है. इस तरह की घटनाएं भारत और दुनिया के लिए एक सबक ही नहीं एक सवाल की तरह सामने आईं, क्योंकि इस तरह के सवालों का जवाब आज तक नहीं दिया गया.



'मैं फूलन देवी, बीहड़ में बची, दिल्ली में मारी गई. पापी नातेदार हैं तो भी पापी हैं, ठाकरन को मारो है ठकरास नहीं मरी अबे. ये वे संवाद हैं जो स्वाति दुबे द्वारा निर्देशित नाटक 'अगरबत्ती' में बोले गए. संस्कृति विभाग के मुक्ताकाशी मंच में अगरबत्ती की खुशबू, सफेद साड़ी पहने महिलाएं और लोरी की मीठी आवाज...यह नजारा नाटक की विषयवस्तु को सहज ही प्रस्तुत कर रहा था.

बेहमई हत्याकांड में मारे गए ठाकुरों की विधवाओं के पुनर्वास के लिए लघु उद्योग निगम के मार्फत सरकार ने अगरबत्ती का एक कारखाना खुलवाय.जेल में बंद चंबल की रानी को खत्म किए बिना अपने पति की अस्थिभस्म का तर्पण न करने को संकल्पित लालाराम ठकुराइन कल्ली की मदद के इंतजार में सभी को संगठित कर रही है. दमयंती वहीं एक बहस को जन्म देती है कि मारे गए सभी पुरुष ही क्यों थे, वो भी सारे नहीं कुछ.

इस बहस का सिलसिला इस दुर्लभ सत्य तक पहुंचता है कि पापी अगर नातेदार भी तो भी पापी है. लालाराम ठकुराइन इस बहस में अकेली पड़ जाती है और अंततः बचपन की क्रूर यादों के साथ सिर्फ औरत रह जाती है. अन्य आठ औरतों के साथ अपने पति की अस्थिभस्म को अगरबत्ती के मसाले में मिला देती है. प्राकृतिक न्याय के सिद्घांत की तरह बेहमई की अस्थिभस्म मिल जाती है. शेष बच जाती हैं सिर्फ नौ औरतें...,वर्ण और जेंडर से मुक्त औरतें और सुलगती अगरबत्ती. प्रस्तुति समागम रंगमंडल के कलाकारों ने दी.

सामंतवाद, पितृसत्ता और जातिगत शोषण का फोड़ा फूट गया था, इस नाटक में बखूबी अभिनीत किया गया. गोलियों की आवाज के साथ फूलन ने आत्मसमर्पण किया और जेल गईं. विधवा रथ यात्रा को लेकर गंभीर मतभेद पैदा हो गए और लगभग सभी बेहद स्वार्थपरक थे. राजनीति ने इस घटना और जातीय समीकरण को अपने पक्ष में साधना शुरू कर दिया. तीव्र भावुकता भारतीय राजनीति का वो उपकरण है, जो सत्ता के शीर्ष पर पल में पहुंच सकता है. इसका गंभीर विमर्श से कुछ भी लेना-देना नहीं होता. अगरबत्ती नाटक इस गंभीर विमर्श को पुनः पैदा करने का प्रयास है, जो वास्तविक घटना और भूगोल के धरातल पर काल्पनिक पात्रों और घटनाओं के रंग से रची गई नाट्य प्रस्तुति है.

अगले महीने हबीब तनवीर नाटय स्पर्धा
नाटक के समापन के बाद मुख्य अतिथियों फ़िल्म व नाट्य निर्देशक जयंत देशमुख तथा आलोक चटर्जी ने कलाकारों को प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया। छत्तीसगड़ फ़िल्म आर्ट विजुअल सोसायटी की निदेशक श्रीमती रचना मिश्रा ने बताया कि पांच दिवसीय नाट्य समारोह में पहले दिन द्रौपदी, दूसरे दिन प्रेम पालिटिक्स, तीसरे दिन तितली और चौथे दिन अग्नि और बरखा का मंचन किया गया. दिसंबर महीने में संस्था द्वारा जनमंच में हबीर तनवीर स्मृति नाटय प्रतियोगिता का आयोजन रखा गया है. इसमें नवोदित कलाकारों को अभिनय का प्रशिक्षण तथा नाटय प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी.

आभार प्रदर्शन व संचालन मुक्तिबोध राष्ट्रीय नाट्य समारोह के आयोजक श्री सुभाष मिश्र ने किया.