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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र बता रहे हैं कि -फिजूलखर्ची पर अंकुश जरूरी

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र  बता रहे हैं कि -फिजूलखर्ची पर अंकुश जरूरी

कुछ न कहो ,कुछ भी न कहो , क्या कहना है , क्या सुनना है  तुमको पता है मुझको पता है , सबको पता है देश की आर्थिक स्थिति ख़राब है ।कोरोना अभी जाने वाला नही है । वैक्सीन आने में टाईम है । आ भी गया तो पहले अमीर देशों और अमीर लोगो को मिलेगा । आत्मनिर्भरता के इस दौर में काम धंधा मंदा है सबको पता है ।लोग तक़लीफ़ में है सबको पता है ।तालाबंदी के कारण अधिकांश लोगों की आर्थिक रूप से कमर टूट गयी है सबको पता है ।12 करोड़ लोग बेरोजगार हो गये हैं सबको पता है ।प्रवासी मज़दूर अपना काम धंधा छोड़कर अपने घर गाँव लौट गए हैं सबको पता है । अधिकांश मददगार समाजसेवी संगठन , सरकारें थक कर अपने -अपने सुरक्षित स्थानो में लौट गयी हैं सबको पता है ।यह अनलॉक यानी खुलेपन का समय है ।यह आत्मनिर्भरता और आत्मसंयम का समय है ।यह खुले हाथों लूटाने का नही ,फ़िज़ूल खर्ची कम करने का समय है ।लोगों ने तालाबंदी के बीच कम आवश्यकताओं में जीना सीख लिया है ।अब सरकार की बारी है कि वह भी ग़ैर उत्पादक व्यय , कार्यो को बंद करे ।निगम मंडल और सरकारी खर्चो से चलने वाली संस्थाओं में नई राजनीतिक नियुक्तियां नही करे । सुरक्षा और आर्थिक सत्कार के नाम पर होने वाले व्यय को नियंत्रित करें । ऐसे सभी कार्य और कारणों को समेटा जाए जिनके बिना भी काम चल सकता है ।यदि जल्दी ही मितव्ययता को लेकर कड़े कदम नही उठाये गये तो मांगने और आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला पहले की तरह ही जारी रहेगा । चुनाव नजदीक आते -आते इसकी रफ्तार तेज होगी । कोई कोरोना के लिए कांग्रेस को , कोई केन्द्र को दोषी ठहरायेगा ।और कोई नही मिला तो पाकिस्तान , चीन तो हैं ही ।

राज्य सरकारें केंद्र से मदद माँग रही हैं और केंद्र अब तक की गई मदद को उपलब्धि बताकर प्रचारित कर रहा है । तालाबंदी के बाद से देश की आर्थिक स्थिति तेज़ी से ख़राब हुई है ।आय के साधन एकदम से कम हुए हैं ।मदद के हाथ जो तेज़ी से बढ़े थे , वे थम से गये हैं ।कोरोना के संभाविक संक्रमण से बहुत से कामकाजी लोग ,अवसाद की मुद्रा में घर में हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं ।पिछले 3 महीनों में करोड़ों लोगों ने अपना रोज़गार, नौकरी गंवायी है ।20 लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज की खनक भी अब कहीं दिखाई ,सुनाई नहीं देती ।राज्य सरकारें लगातार केंद्र से मदद की गुहार कर रही हैं ।केंद्र से उन्हे पैसा मिला तो है किंतु वह उनकी माँग की पूर्ति नहीं कर पा रहा है ।आज ही दिल्ली सरकार ने केंद्र से पाँच सौ करोड़ की मदद माँगी है ।दिल्ली सरकार के पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने की राशि नहीं है ।सरकारों ने मितव्ययिता के लिए कठोर क़दम उठाने का ऐलान किया है ।पहला ही निर्णय में  बजट में 30% की कटौती की गई है ।सरकारी लोगो के महँगाई भत्तो में रोक के रूप में कड़े और अप्रिय क़दम उठाए गए हैं ।अब छत्तीसगढ़ सरकार ने वेतन वृद्धि पर भी रोक लगायी है ।पता चला है की छत्तीसगढ़ सरकार के द्वारा शासकीय कर्मचारियों की वेतन कटौती का कोई प्रस्ताव फ़िलहाल नहीं है । उच्च अधिकारियों का कहना है की किसी भी स्थिति में वेतन कटौती की नौबत नही आयेगी ।वे ज़रूर इस बात के उपायों में लगे हुए हैं जिनके माध्यम से भविष्य में वित्तीय संकट की स्थिति निर्मित न हो ।पैसा कहाँ से रोका जाये ,कहाँ से आए शासकीय धन के लीकेज को रोका जाए इसको लेकर गंभीर कवायदें जारी हैं ।मुख्यमंत्री के स्तर पर सरकारी दफ्तरों में पड़ा कचरा , गारबेज की बिक्री तक पर नजर रखी जा रही है । फिलहाल रद्दी / कबाड़ ख़रीद के माफ़िया द्वारा इसे औने पौने दाम पर ख़रीद कर मंहगे में  जाता है ।कचरे को भी वाजिब दाम पर खुली निविदा से बेचा जाए इसकी भी मशख्त जारी है ।सरकार ऐसे ऑफिसरों को भी चिन्हित कर रही है जहाँ एक से काम और जिम्मेदारी के लिए ज्यादा अधिकारी पदस्थ हैं ।ऐसे अतिशेष और बिना काम के अधिकारियों , कर्मचारियों के युक्तियुक्तकरण की कवायद भी जारी है ।पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के वित्त विभाग ने इस संबंध में 1 सर्कुलर जारी कर बहुत से निर्देश जारी किये हैं ।

राज्य शासन द्वारा मितव्ययिता एवं वित्तीय अनुशासन की दृष्टि से जो निर्देश जारी किये हैं उनके अनुसार -
राज्य सरकार ने रिक्त पदों पर नियुक्ति के संबंध में - स्थापना व्यय में वृद्धि को नियंत्रित रखने की दृष्टि से सभी शासकीय विभागों / सार्वजनिक उपक्रमों / निकायों में नवीन पद सृजन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई गई है ।

पूर्व मुख्य सचिव एस के मिश्रा की अध्यक्षता में गठित छत्तीसगढ़ राज्य प्रशासनिक सुधार आयोग की अनुशंसा प्रतिवेदन के खंड 1 की अध्याय दो में  वित्तीय अनुशासन  के संबंध में  जो सुझाव एवं  अनुशंसाएं दी गई हैं इनका  पालन  करने से  वित्तीय खर्च में कमी  हो सकती है। अध्याय 9 में शासन से संबंधित संस्थाएं ,सार्वजनिक उपक्रम बोर्ड, मंडल आदि के संबंध में परीक्षण एवं अनुशंसा की गई है इसमें कहा गया है कि अधिकतर उपक्रमों तथा मंडल बोर्ड पर विभागीय पर्यवेक्षण एवं नियंत्रण की कमी है, जिसके कारण अनावश्यक व्यय हो रहा है। आयोग ने कुछ निगम मंडल बोर्ड के संबंध में प्रस्ताव दिया है कि इन्हें या तो समाप्त कर दिया जाना चाहिए या  इनका पुनर्गठन किया जाना चाहिए जैसे कि छत्तीसगढ़ अधोसंरचना विकास निगम को तथा बायोफ्यूल विकास प्राधिकरण को समाप्त करने की अनुशंसा की गई है। छत्तीसगढ़ राज्य निवेश प्रोत्साहन बोर्ड तथा छत्तीसगढ़ राज्य शिक्षा आयोग को भी समाप्त करने की अनुशंसा की गई है। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ राज्य युवा आयोग के बनाए रखने के संबंध में भी पुनर्विचार किए जाने की अनुशंसा की गई है। निगम मंडल बोर्ड आदि में वित्तीय अनुशासन आवश्यक है। इस दृष्टि से निगम मंडल को सार्वजनिक उपक्रम विभाग के स्थान पर वित्त विभाग के अधीन किया जाना चाहिए यदि आयोग की अनुशंसा के अनुसार कार्रवाई की जाए तो वित्तीय व्यय में पर्याप्त बचत होगी। सरकार बजाय अपने कर्मचारियों के वाजिब हक में कटौती करने के , ऐसा कुछ करती है तो यह दीर्ध कालिक उपाय होगा ।
इसी तरह सरकारी दफ्तरो में मितव्यियता को लेकर बहुत से कदम उठाने पर व्चार किया जा सकता है ।
शासकीय अवकाश नियम के विभिन प्रावधानों के अनुसार कोरोना काल में विशेष अवकाश जो स्वेच्छा से लोक सेवक ले सकते हों जिनके अवकाश से सरकार के आवश्यक कार्य पर कोई विशेष असर न पड़ता हो उन्हें उन्हें आधे या 40 प्रतिशत वेतन कटौती का प्रस्ताव चर्चा कर उन्हें घर पर कुछ माह रुक कर कार्य पर आने या वर्क फ्रॉम होम का फार्मूला बनाकर  लागू करने पर भी विचार किया जा सकता है।
इसी तरह ऐसे कई ऐसे निगम मंडल आयोग हैं, जिनका कोई मैदानी काम अभी चलने की स्थिति नहीं है उन्हें भी या तो समाप्त कर दिया जाये वहां के स्टाफ को जहां मानव संसाधन की कमी है , वहां मध्यप्रदेश राज्य परिवहन CIDC के अतिशेष कर्मचारियों की तरह समायोजित कर लिया जाये ।
कोरोना कालखंड  में वैसे भी सरकार 50% अधिकारी कर्मचारियों के साथ कार्यालय खोल रही है। बहुत से लोग आफिस आने में , सुरक्षित रहकर काम करने में डर महसूस कर रहे हैं , ऐसे में सरकार एक विशेष कोरोना  अवकाश स्कीम लागू करें जिसमें अपेक्षा से 20 से 25% वेतन कटौती के साथ जो अधिकारी कर्मचारी लंबी अवधि तक अवकाश लेना चाहें ले सकते हैं। यह विशेष अवकाश 2 वर्ष तक का होना चाहिए तथा यह अवकाश अधिकारी कर्मचारी के सेवा में व्यवधान नही माना जायेगा ।  यह अवकाश 50 से 62 वर्ष की आयु के लोगों के लिए दिया जा सकता है, जो वरिष्ठ अधिकारी कर्मचारियों के स्वास्थ्य आदि के लिए उपयुक्त होगा। सेवानिवृत्ति उपरांत संविदा नियुक्ति पर कार्य करने वाले सभी लोगो को कोरोना से बचाने और आफिसों को संविदा वाले ऐसे लोगो से बचाने के लिए , ये संविदा तुरंत समाप्त की जाये ।
कहावत है की हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते हैं । अभी ना तो केन्द्र में चुनाव हैं ना छत्तीसगढ़ में । ऐसे में दोनो ही सरकारों को दीर्धकालिक उपायो और आपदा की स्थिति को देखकर निर्णय लेने की जरूरत है और ऐसा ही बाकी सरकारों के लिए भी जरूरी है वरना सब कुछ लुटाकर होश में आये तो फिर क्या ?