प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-किसानों की लड़ाई संसद से सड़क तक

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-किसानों की लड़ाई संसद से सड़क तक


किसानों के नाम पर इस समय देश की राजनीति में अच्छा खासा बवाल मचा हुआ है। देश का किसान उस तरह से संगठित नहीं है, जैसे किसी जाति-संप्रदाय, धर्म से जुड़े लोग संगठित होते हैं। यही वजह है कि हमारा किसान हर बार ठगा जाता है। कृषि उपज मंडी, समर्थन मूल्य, कर्ज माफी के बावजूद किसान आत्महत्या को मजबूर हैं। किसानों की बेहतरी के नाम पर ताबड़तोड़ तरीके से लोकसभा और राज्यसभा में प्रस्तुत और पारित बिलों को लेकर जहां राज्यसभा से 8 सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित किया गया है, वहीं बहुत से किसान संगठन संसद से सड़क तक की लड़ाई पर उतर आये हैं। किसानों को भय है कि इस बिल से मंडी व्यवस्था खत्म हो जायेगी। निजीकरण को बढ़ावा मिलेगा। मंडी के बाहर व्यापारी किसानों से उसके उत्पाद को औने-पौने दाम पर खरीदेंगे। कोई भी व्यापारी कभी भी तीन दिन के भीतर किसान को भुगतान नहीं करेगा। व्यापारी किसानों के उत्पाद को अपने पैसे के बूते पर जमाखोरी करेगा। किसानों का मानना है कि व्यापारी टैक्स बचाने के लिये खरीदी के मामले में हेराफेरी करेगा। अब बिल को लेकर बहुत सारी बातें साफ नहीं है। यदि किसान जब उसी फसल को बाजार में लेने जायेगा तो उसे वही फसल दुगुने-तिगुने दाम पर मिलेगी। किसानों की यह आशंका निर्मूल नहीं है। कोरोना संक्रमण काल में भी अधिकतर व्यापारी लॉकडाउन को देखते हुए जरूरी चीजें जिनमें आलू-प्याज, लहसुन जैसी चीजें भी शामिल हंै, कई गुना महंगे दाम पर बेच रहे हैं।

दुष्यंत कुमार का एक शेर है -
भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ दिल्ली में है ज़ेर-ए- बहस ये मुद्दआ.....

कांग्रेस और बहुत सी पार्टियों ने मिलकर पूरे देश में नए कृषि कानून के खिलाफ मोर्चा खोला है। जिस बिल को भाजपा लेकर आई है। उसी तरह के विधेयक को कांग्रेस पूर्व में लेकर आई थी फिर इस बिल में ऐसा क्या है जिसका विरोध आज कांग्रेस कर रही है? लोकसभा चुनाव के अपने 2019 के घोषणा-पत्र में यह उल्लेख किया था कि वे कैसे कृषि उपज बाजार समिति के अधिनियम को निरस्त करेंगे और कृषि उपज सहित निर्यात और अंतरराज्यीय व्यापार को सभी प्रतिबंधों से मुक्त करेंगे। 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले, कांग्रेस ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि कांग्रेस शासित राज्यों को एपीएमसी अधिनियम से फलों और सब्जियों को डी नोटिफाई करना चाहिए। इसके बाद कांग्रेस ने कर्नाटक, असम, हिमाचल प्रदेश, मेघालय और हरियाणा के राज्यों पर शासन किया, जिसमें फल और सब्जियां शामिल हैं। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने 2014 में राज्य के कृषि विपणन कानूनों को उदार बनाने के लिए राज्यों को मॉडल एपीएमसी अधिनियम 2003 को अपनाने के लिए राजी करना शुरू किया।

मोदी सरकार ने किसानों को लाभ देने और कृषि क्षेत्र में बदलाव के लिए 14 सितंबर 2020 को तीन अध्यादेशों को बदलने के लिए जिन तीन विधेयक को पास करवाया है उनमें पहला कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020 दूसरा कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक, 2020 और तीसरा आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020। पहला बिल एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने के लिए है जहां किसानों और व्यापारियों को मंडी से बार फसल बेचने की आजादी होगी। दूसरा बिल कृषि करारों पर राष्ट्रीय फ्रेमवर्क के लिए है। ये कृषि उत्पादकों की बिक्री, फार्म सेवाओं, कृषि बिजनेस फर्मों, प्रोसेसर्स, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा विक्रेताओं और निर्यातकों के साथ किसानों को जुडऩे के लिए सशक्त करता है। तीसरे बिल में अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज-आलू को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटाने का प्रावधान है। माना जा रह है कि  विधेयक के प्रावधानों से किसानों को सही मूल्य मिल सकेगा, क्योंकि बाजार में स्पर्धा बढ़ेगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन बिल को किसानों को नये अधिकार देने वाला बताते हुए इसे 21वीं सदी के भारत की जरूरत बताया। उन्होंने कहा है कि यह बदलाव किसान और कृषि उपज मंडियों के खिलाफ नहीं है, बल्कि देश के उन ताकतवर गिरोह से किसानों को छुटकारा दिलाने के लिए है, जो अब तक उनको मजबूरी का फायदा उठाते रहे हैं।

नए विधेयक में किसानों को अपनी उपज को कहीं पर भी बेचने की छूट दी गई है। इससे मंडियों की अहमियत पर असर पड़ेगा। हालांकि, पंजाब-हरियाणा में मंडियों को नेटवर्क अधिक है, लिहाजा इन राज्यों में किसान संगठनों की नाराजगी ज्यादा देखने को मिल रही है। किसानों के सामने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को लेकर भी भ्रम की स्थिति हैं, जिसको लेकर भी विरोध-प्रदर्शन जारी है।
इन विधेयकों को देश के किसानों के खिलाफ बताते हुए आम आदमी पार्टी से सांसद संजय सिंह ने कहा कि देश के किसानों जाग जाओ। भाजपा की सरकार ने आपकी जिंदगी को अडाणी-अंबानी को गिरवी रख दी है। जाग जाओ और इस काले कानून का विरोध करो। हम संसद में प्रदर्शन कर रहे हैं और आप इसके बाहर करो।

पंजाब कांग्रेस ने सोमवार को राज्य में तीन कृषि विधेयकों के खिलाफ प्रदर्शन किया। पार्टी का आरोप है कि इन विधेयकों से किसान समुदाय 'बर्बाद हो जाएगा। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने 'किसान विरोधीÓ विधेयकों को लेकर भाजपा नीत केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और केंद्र सरकार के पुतले जलाए। इसके विरोध में पंजाब में ख़ुद बीजेपी की सहयोगी पार्टी अकाली दल ने पार्टी का साथ छोडऩे का फ़ैसला किया है। हरियाणा में सीएम मनोहर लाल खट्टर ने सफाई दी है कि ये बिल किसान विरोधी नहीं है।

विपक्ष का आरोप है कि सरकार कृषि मंडी की व्यवस्था हटाना चाहती है जिससे देश की खाद्य सुरक्षा ख़त्म हो जाएगी। इसके साथ सरकार किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से वंचित रखना चाहती है।

राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा कि मोदी जी ने किसानों की आय दुगनी करने का वादा किया था लेकिन मोदी सरकार का काला क़ानून किसान-खेतिहर मज़दूर का आर्थिक शोषण करने के लिए बनाया जा रहा हैं। ये ज़मींदारी का नया रूप है और मोदी जी के कुछ मित्र नए भारत के 'ज़मींदार होंगे। कृषि मंडी हटी, देश की खाद्य सुरक्षा मिटी।

बिल को लेकर कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं कि अगर ये सवाल है कि किसान इसका विरोध क्यों कर रहे हैं तो ये समझिए कि उन्हें ये लगता है कि ये उनके हित में नहीं है लेकिन बाज़ार इसका विरोध नहीं कर रहा क्योंकि इससे उन्हें लाभ है। देशभर के 52 किसान संगठनों की अगुवाई करने वाला अखिल भारतीय किसान महासंघ आईफा के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने कहा कि केंद्र सरकार ने हाल ही में कृषि सुधार के नाम पर जो अध्यादेश लागू किए है वह किसानों के हित में नहीं हैं।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से लेकर कृषि में ढांचागत सुधार की जो बातें कही गई है उससे किसानों को तत्काल कोई फायदा नहीं है। कृषि सुधार के नाम पर ये सभी अध्यादेश किसानों के हित में नहीं होकर कार्पोरेट और उद्योग घरानों के हित में तैयार किया हुआ लगता है। किसानों को किसी तरह के अनुबंध या कॉन्ट्रैक्ट में बांधना उचित नहीं है। हमारे किसान भोले-भाले और ईमानदार हैं और इसलिए वे कमजोर भी होते हैं। कोई भी अनुबंध सबल पक्ष के हित में ही जाता है। कमजोर पक्ष को अनुबंध की शर्तें मानने लिए बाध्य होना पड़ता है।

पूरा देश धीरे-धीरे निजीकरण की चपेट में है। कोरोना काल में प्रायवेट अस्पतालों की छूट, बड़े प्रायवेट स्कूलों की फीस के नाम पर दादागिरी, एस्टेब्लिशमेंट व्यय के नाम पर लोगों की छंटनी ऐसी बहुत सारी बातें है, जो आने वाले समय की शंका को मजबूत करती है। अब किसान इसकी चपेट में है। लोगों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि जब देश की जीडीपी गिर रही है तब अडाणी-अंबानी की आय कैसे बढ़ रही है।