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सदाचार,सत्संग एवं नैतिकता की अनोखी पाठशाला

सदाचार,सत्संग एवं नैतिकता की अनोखी पाठशाला

लक्ष्मण किंगरानी

सिमगा, 13 सितंबर। शिक्षक ही है जो सही मायने में एक इंसान ,एक समाज और एक राष्ट्र का निर्माण करता है । वही शिक्षा ग्रहण करने की न तो कोई उम्र होती है न ही कोई सीमा । शिक्षा के क्षेत्र में एक सेवानिवृत्त व्यक्ति ने नैतिकता की ऐसी पाठशाला प्रारंभ की है जिसका लाभ सभी को प्राप्त हो रहा है ।  आज हम ऐसे ही एक विशेष व्यक्तित्व और विशेष विद्यालय की बात करेंगे जो निश्चित ही किसी प्रेरणा से कम नही है । बात सिमगा ब्लॉक के केशली गाँव की जहां पिछले 8 वर्षों से बाल संस्कार आश्रम के नाम से एक ऐसे विद्यालय का संचालन हो रहा है जहां सुबह से शाम तक बच्चो से लेकर बुजुर्ग तक सदाचार ,नैतिकता व सत्संग का पाठ पढ़ रहे है और इसका संचालन कोई संस्था या सरकार नही कर रही बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के द्वारा किया जा रहा है जो  8 वर्ष पहले विद्युत विभाग से सेवानिवृत्त हो चुके है और अपने पेंशन की राशि से इस विद्यालय का संचालन कर रहे है ।गाँव के ही निवासी अशोक मिश्रा जो कि पेसे से विद्युत सुपरवाइजर थे और वे सेवानिवृत्त होने के पश्च्यात कुछ ऐसा करने की सोचे कि जिसका लाभ आस पास के रहने वाले सभी जन को मिले और साथ ही उनका बाकी का समय घर मे न बैठ के किसी अच्छे कार्य मे बीते ।


अशोक मिश्रा बताते है कि मैं जब देखा कि आज के भौतिक व आधुनिक युग मे लोग बाहर के लोगो की तो छोड़ो अपने माँ बाप भाई बहन तक का सम्मान नही कर रहा ,सदाचार और नैतिकता कही दिखाई ही नही देता ,रिस्तो की मर्यादा खोते जा रही है अपने अपनो को ही मारने काटने से नही चूक रहे। युवा नशे की गिरफ्त में आते जा रहे है । जबकि आज की शिक्षक व शिक्षा नीति में भी सदाचार और नैतिकता की कमी देखने को मिलती है । इन्ही सब बातों को सोच कर निर्णय लिया कि क्यो न अपने जीवन को सार्थक बनाया जाए और बचे हुए समय का सदुपयोग गांव के लोगो को सदाचार की शिक्षा देने में बिताया जाए । जिसके लिये इन्होंने गाँव के बुजुर्गों व ग्रामीणों से चर्चा की और अपना विचार सबके समक्ष रखा ।जिससे ग्रामीण भी राजी हो गए । लेकिन समस्या संसाधनों की थी तब अशोक मिश्रा ने अपने सेवानिवृत्त होने के पश्च्यात प्राप्त राशि से एक भवन का निर्माण कराया जिसे नाम दिया गया बाल संस्कार आश्रम उसके बाद स्कूली बच्चे अपने स्कूल जाने से पहले यहां आ कर गीता ,भागवत,रामायण ,भजन व सदाचार के ज्ञान लेने पहुचने लगे ।


अशोक मिश्रा पेशे से शिक्षक तो थे नही लेकिन ब्राह्मण होने की वजह से शास्त्रों एवं धर्म का ज्ञान तो था ही इस लिए इन्हें बच्चो को पढ़ाने व अक्षरी ज्ञान देने में कठिनाई नही आई और समय चलता गया लोग जुड़ते चले गए आज समय ऐसे है कि कक्षा पहली से लेकर कालेज के बच्चे अपने अपने समय पर सप्ताह के तीन दिन यहां अपनी मर्जी से शिक्षा लेने पहुचे है साथ ही इन्हें पढ़ाने के बाद साम को आश्रम रूपी विद्यालय में गांव के बुजुर्ग भी पहुचते है जहां सत्संग व भजन कर इन्हें भी भक्ति व सदाचार का ज्ञान दिया जाता है ।


 आशोक मिश्रा बताते है कि यहाँ आने वाले सभी बच्चो से लेकर बुजुर्गों तक को सदाचार ,धर्म एवं संश्कार से संबंधित किताब भी दी जाती है और एक रंग की विषभूषा भी प्रदान की जाती है जिससे पढ़ने आने वाले लोगो के मन मे एक विचार धारा का प्रवाह हो सके । इस विद्यालय में अभी लगभग 120 बच्चे ,बड़े व बुजुर्ग पढ़ने पहुचते है जहां इन्हें योग भी सिखाया जाता है साथ ही स्कूल कालेज की तरह प्रतिवर्ष परीक्षा भी ली जाती है जिसमे मौखिक ,व्यवहारिक व लिखित परीक्षा ली जाती है और इन्हें प्रमाण पत्र भी दिया जाता है। और यहां पढ़ने आने वाले बच्चे इन्हें सर नही कहते बल्कि हरि ओम कह कर पुकारते है।तो कहा जा सकता है कि अशोक मिश्रा द्वारा अच्छे उद्देश्यों को लेकर कर किया जा रहा कार्य किसी प्रेरणा से कम नही जो निः स्वार्थ स्वयं के खर्च पर इनके अलावा हफ्ते के बाकी दिवश भी बेमेतरा में भी इसी तरह का एक और विद्यालय का संचालन करते है। जीवन के इस पड़ाव में लोग जहां अपने व अपने बच्चो के बारे में विचार करते है वही अशोक मिश्रा जैसे विरले ही लोग होते है जो पूरे समाज व देश के लिये सोचते है ऐसे समाजिक पुरोधा निश्चित ही सम्मान और बधाई के पात्र है।