कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः प्रेम तुम से जैसे पृथ्वी से

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः प्रेम तुम से जैसे पृथ्वी से


प्रेम करता हूँ तुम से

जैसे पृथ्वी से


सुनाई देती है तुम्हारी देह में

जलों की आहट

लिपटी रहती है मुझ से

तुम्हारे स्पर्श की गंध

समायी हो मेरी देह के आकाश में 

सूरज-जोत-सी


मैं अँकुराये बीज-सा

जड़ जमाता तुम्हारी देह में

रचती हो तुम मुझे

वृक्ष की तरह


तुम्हारी देह पर

फैलती मेरी शाखाएँ

अंक में भरने को आतुर

पूरी पृथ्वी को


तुम ही 

जरा-सी ओट देकर सूर्य को

मुझे छिपा लेती हो

अपनी देह की उजास में

अपने जल के बहाव में

अपनी गंध की गलियों में


प्रेम तुम से जैसे पृथ्वी से