प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-कोरोना से ज्यादा पढ़ाई-लिखाई, रोजी-रोटी की चिंता

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-कोरोना से ज्यादा पढ़ाई-लिखाई, रोजी-रोटी की चिंता


आर्थिक हालातों ने कोरोना वायरस से उपजी विपदा और भय को कम कर दिया है। तेजी से बढ़ते कोरोना संक्रमण के बीच भी लोग सामान्य जनजीवन चाहते हैं। व्यापारी संगठन से लेकर सरकार तक सब कुछ खोलने पर आमादा हैं। केन्द्र सरकार की गाइडलाइन के बावजूद बहुत से स्कूल खुले हुए हैं। बच्चों को शिक्षा देने के नाम पर ऑनलाइन क्लासेस ली जा रही है। स्कूल प्रबंधन कोर्ट के आदेश के बावजूद ट्यूशन फीस से कुछ ज्यादा ही वसूल करने के लिए किसी सूदखोर की तरह तगादा कर रहे हैं। बैंक लोन, ईएमआई से जो छूट मिली थी, वह भी इस महीने से खत्म हो गई है। कोरोना वायरस से उपजी विपदा के कारण सबसे ज्यादा संकट में वह नौकरीपेशा हैं जिसने बाजार की चकाचौंध और उपभोक्ता संस्कृति के दबाव में आकर बहुत सारी अनावश्यक चीजें ईएमआई से खरीदकर अपने घर में जगर-मगर कर ली थी। बच्चों के कथित उज्जवल भविष्य और ग्लोबल नौकरी, पैकेज की लालच में महंगे निजी स्कूलों में उनका एडमिशन कर लिया था। अब अगस्त महीने से ऐसे लोगों को नानी याद आ रही है।

कोरोना के चलते बच्चे घर में हैं और कमजोर नेटवर्क के भरोसे ऑनलाइन क्लास कर रहे हैं। बाजार खुल गये हैं पर नौकरी चली गई है, सैलरी आधी हो गई। ईएमआई का तगादा शुरू हो गया उस पर कमबस्ता बच्चों की स्कूल की फीस। आगे क्या होगा ? सब कुछ राम भरोसे है। स्कूल भी अपनी उपयोगिता और उपस्थिति दर्ज कराने ऑनलाइन एजुकेशन की वकालत कर रहे हैं। बच्चे और अभिभावक समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या करें? बच्चे स्कूल जाये या नहीं जाये फीस तो भरनी ही है।

देश में 31 अगस्त तक स्कूल बंद रहेंगे। केंद्र सरकार द्वारा 1 सितंबर 2020 से चरणबद्ध तरीके से स्कूल खोले जाने के आदेश दिये जा सकते हैं। जानकारी के मुताबिक, केंद्र सरकार ने तय किया है कि 1 सितंबर 2020 से 14 नवंबर तक चरणबद्ध तरीके में स्कूल कॉलेज खोल दिए जाएं। केंद्र सरकार 31 अगस्त तक इस संबंध में अपनी गाइडलाइन जारी कर देगी। हालांकि इस बारे में आखिरी फैसला राज्य सरकारों का होगा।
छत्तीसगढ़ में सरकार ने बच्चों के घर में ही पढऩे-लिखने की व्यवस्था करने के लिए पढ़ई तुंहर दुवार नामक कार्यकरम के अंतर्गत वेबसाईट बनाई है जिसका लाभ बच्चों को ऑनलाईन क्लास के जरिये मिल रहा है।

कोरोना संक्रमण को देखते हुए केंद्र सरकार द्वारा तैयार किए गए मसौदे के मुताबिक, स्कूल शिफ्ट में लगेंगे। पहली शिफ्ट सुबह 8 से 11 और दूसरी 12 से 3 बजे तक रहेगी। बीच में सेनिटाइजेशन के लिए एक घंटे का ब्रेक रहेगा। स्कूलों से कहा जाएगा कि वे 33 फीसदी टीचिंग स्टाफ के साथ काम करें। जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कोरोना संक्रमण कम है, वहां स्कूल जल्दी खुल सकते हैं। हालांकि इस बारे में पूरी तरह से फैसला राज्यों का होगा। गाइडलाइन के अनुसार, स्कूलों को महज 33 फीसदी स्टाफ के साथ काम चलाना होगा, तो सवाल है कि बाकी टीचर्स का क्या होगा? क्या स्कूल प्रबंधन उन्हें निकाल देगा या रोटेशन पर ड्यूटी लगाएगा। छत्तीसगढ़ के शिक्षकों ने इस दौरान स्व-प्रेरणा से बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के लिए अनेक नवाचारी प्रयास किये हैं। अनेक शिक्षकों ने गांवों में जाकर ग्राम समुदाय की सहायता से छोटे-छोटे समूहों में बच्चों को अनौपचारिक विधि से पढ़ाना प्रारंभ किया है। कुछ शिक्षकों ने लाउडस्पीकर के माध्यम से पढ़ाने का कार्य भी सफलतापूर्वक किया है। इस तरह की पढ़ाई की विधि और इसकी वैज्ञानिकता पर सवाल उठ रहे हैं। शिक्षाविद् इस तरह की पढ़ाई को ठीक नहीं बता रहे हैं। कुछ शिक्षकों ने ब्लूटूथ के माध्यम से पठन-पाठन सामग्री उपलब्ध कराने के प्रयास भी किए हैं। गूगल फार्म पर एकत्र जानकारी अनुसार राज्य के 54,000 से अधिक शिक्षक इन नवाचारों के माध्यम से अपने विद्यार्थियों को घर पर ही पढ़ाई जारी रखने में सहायता करना चाहते हैं। इस तरह के कार्य को प्रोत्साहित करने के लिए स्कूल ग्रांट आदि की राशि खर्च करने की अनुमति दी जायेगी। इस राशि का उपयोग बच्चों को पठन-पाठ की सहायता सामग्री जैसे वर्क बुक, कलरिंग बुक, क्रेयॉन, शैक्षणिक खिलौने आदि उपलब्ध कराने के लिए किया जायेगा। कोरोना से बचाव संबंधी केन्द्र तथा राज्य सरकार के सभी निर्देशों विशेषकर सैनिटाईजेशन, मास्क, सामाजिक एवं भौतिक दूरी बनाये रखने संबंधी निर्देशों का पालन अनिवार्य रूप से सुनिश्चित किया जाने कहा गया है किन्तु जब सामान्य दफ्तरों, बड़े स्कूलो और नागरिक दिनचर्या में इसकी अनदेखी हो रही है फिर स्कूलों से इस तरह की उम्मीद बेमानी है।

जिस तरह बंद स्कूलों को खोलने की कवायद हो रही है उसी तरह कोविड-19 के कारण विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया एवं क्लास रूम टीचिंग के बारे भी आवश्यक निर्णय लिया गया है। देश के अलग-अलग राज्यों में 12वीं बोर्ड तथा सीबीएसई के परीक्षा परिणाम घोषित हो चुके हंै। ऐसे में सितम्बर से चरणबद्ध तरीके से ऑनलाइन शिक्षण प्रारंभ करते हुए कोविड-19 के संक्रमण की स्थितियां सामान्य होने की स्थिति में क्लासरूम शिक्षण प्रारंभ करने पर विचार किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर विश्वविद्यालयों में होने वाली ऑनलाइन परीक्षाओं को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है। एक तरफ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने अंतिम वर्ष की ऑनलाइन परीक्षाएं आयोजित कराने के दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं तो दूसरी तरफ स्टूडेंट्स इसका विरोध कर रहे हैं। स्टूडेंट्स का कहना है कि पिछले सालों के प्रदर्शन, असाइनमेंट और प्रोजेक्ट के आधार पर अंतिम वर्ष या सेमेस्टर का मूल्यांकन करना चाहिए ताकि कोरोना महामारी के दौरान उन पर परीक्षा का दबाव ना पड़े।

दिल्ली, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु समेत कई राज्यों ने यूजीसी के दिशानिर्देशों का विरोध किया है। महाराष्ट्र में शिवसेना की यूथ विंग युवा सेना ने अंतिम वर्ष की परीक्षाएं कराने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। दिल्ली सरकार ने राज्य विश्वविद्यालयों में अंतिम वर्ष की परीक्षाएं रद्द कर दी है और कहा है कि पुराने सेमेस्टर के प्रदर्शन, इंटरनल असेस्मेंट या अन्य प्रगतिशील तरीकों से स्टूडेंट्स का मूल्यांकन किया जाएगा। यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष समेत 27 अन्य शिक्षाविदे ने यूजीसी को पत्र लिखकर परीक्षाएं आयोजित ना करने की अपील की है। इस पत्र में लिखा है कि जो लोग ये तर्क दे रहे हैं कि परीक्षा रद्द करने से डिग्रियों का मूल्य कम हो जाएगा उन लोगों को ये भी बताना चाहिए कि वर्चुअल एग्जाम से उनका कैसे मूल्य बढ़ेगा? परीक्षाओं के संबंध में जो सबसे बड़ी समस्याएं सामने आईं, वो हैं इंटरनेट कनेक्टिविटी और सिलेबस का पूरा ना होना। इस साल कोरोना की वजह से आईआईटी और नीट दोनों ही परीक्षाओं की तारीख़ पहले एक बार बदली जा चुकी है। अब आईआईटी की परीक्षा 1 से 6 सितंबर के बीच प्रस्तावित है। देशभर में आईआईटी के लिए 11 लाख छात्रों ने फॉर्म भरे हैं। जबकि नीट की परीक्षा के लिए 16 लाख छात्रों ने आवेदन दिया है। सरकार की गाइडलाइन के मुताबिक़, इस बार आईआईटी के लिए 600 सेंटर बनाए गए हैं, जो पहले 450 हुआ करते थे।

कोविड-19 से पूरे देश में जितने लोग संक्रमित नहीं हुए है जितनी मृत्यु नहीं हुई है उससे कहीं ज्यादा लोग इसके कारण उपजी स्थितियों के शिकार हो रहे हैं। देश का किसान, मजदूर, विद्यार्थी, नौकरीपेशा से लेकर व्यापारी तक की हालत पस्त है। यही वजह है कि बढ़ते कोरोना संक्रमण के बावजूद अब सब यथास्थिति को स्वीकार कर आगे की ओर बढऩा चाहते हैं। सब वर्चुअल दुनिया से निकल कर रियल दुनिया से दो चार होना चाहते हैं।