भालचन्द्र जोशी की कहानीः सपने का टुकड़ा और चमड़े का बैग

 भालचन्द्र जोशी की कहानीः सपने का टुकड़ा और चमड़े का बैग

भालचन्द्र जोशी की कहानी ‘सपने का टुकड़ा और चमड़े का बैग’ में सपना एक बहुलार्थी शब्द की तरह प्रयुक्त हुआ है। कहानी के अलग-अलग पात्रों की आँखों में पलने वाले ये सपने जितने निजी और स्वपनिल हैं उतने ही सार्वजनिक और यथार्थपरक भी। पाश ने कहा था- ‘सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना’। आज का समय उससे भी एक कदम ज्यादा खतरनाक हो चुका है, क्योंकि वह सपना जो कभी देखने और पूरा करने की चीज़ हुआ करता था, जिसका रास्ता संघर्ष की पगडंडियों से गुजरता था, अब खरीद-फरोख्त की वस्तु में बदल चुका है। इस कहानी में स्वप्न के इन दोनों स्वरूपों की टकराहटों से उपजी ध्वनियाँ बहुत साफ सुनी जा सकती हैं। सपने के टुकड़े के गुम हो जाने की प्रतीकात्मकता जिस आवृत्तिमूलक बालाघात के साथ इस कहानी के स्थापत्य को खड़ा करती है, उससे अमूर्त भी मूर्तिमान हो उठता है। कल्पनाशीलता का एक ऐसा लालित्य जो पल भर को भी वास्तविकता की जमीन नहीं छोड़ता इस कहानी को पठनीय और मानीखेज एक साथ बनाए रखता है। परिहास और विडम्बना के धागों से बुने संवादों तथा पात्रों की मनःस्थितियों से गुजरते हुये पाठक जिस तरह अपने हिस्से के गुम हो चुके सपनों की तलाश करने लगता है, वह इस कहानी की बड़ी सफलता है। -  राकेश बिहारी


 सपने का टुकड़ा और चमड़े का बैग