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कहीं दर्द न बन जाये दवा

कहीं दर्द न बन जाये दवा

प्रणव पारे
सितंबर 2018 में भारत सरकार ने करीब 328 दवाओं को प्रतिबंधित किया है जिनके उत्पादन और वितरण और उनके सेवन पर भी एक दिशा निर्देश जारी किए थे ताकि जन स्वास्थ्य के साथ हो रहे खिलवाड़ को रोका जा सके।

देश में दवाओं का एक बहुत बड़ा गोरखधंधा चल रहा है जिसमें प्रतिबंधित दवाओं को भी विवेकहीन और गैर जरूरी योगिकों(कॉम्बिंनेशन) के साथ मिलाकर बाजार में बेचा जा रहा है।

अकसर आप ग्रामीण क्षेत्रों में टायफाइड बिगड़ने की शिकायत सुनते है जीआई (पेट और आंतों से जुड़ी समस्या एक आम बीमारी है जो ठीक से जांच न होने के कारण बिगड़ जाती है इसके इलाज के लिए ग्रामीण क्षेत्रो के झोला छाप डॉक्टर टिनिडैजोल  और सिप्रोफ्लोक्ससिन की एफडीसी देने लगते है जो कि एक गैर जरूरी एफडीसी  है। जब मरीज़ की स्थिति बिगड़ती है तब टायफायड के इलाज में काफी कारगर दवा एंटी-बायोटिक सिप्रोफ्लोक्ससिन का दो हफ्ते का कोर्स भी कारगर नही होता क्योंकि मरीज का इम्यून सिस्टम इस दवा का आदी हो चुका होता है। इस बीमारी के इलाज के लिए टिनिडैजोल ही काफी होता है। नतीजा ये होता है कि सिप्रोफ्लोक्ससिन के खिलाफ शरीर प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है यानी इस दवा का शरीर पर असर खत्म हो जाता है।

 सामन्यतः एक स्टडी में पाया गया है कि चेहरे पे रैशेज और दाने आने पर कुछ डॉक्टर एफडीसी  क्रीम बेटनोवेट जीएम लगाने के लिए दे देते है। इस दवा में स्टेरॉयड, एंटी-बायोटिक और एंटी-फंगल दवाओं का मिश्रण होता है । यह मिश्रण किसी भी स्किन एलर्जी के लिए नहीं दिया जाता जबकि यह एक एलर्जी ही होती है, तत्काल दवा का असर तो हो जाता है,अब जब भी इस तरह की समस्या आती है, लोग बिना किसी परामर्श के इसका इस्तेमाल करते है।यदि भविष्य में कोई गंभीर एलर्जी हो जाये बहुत ज्यादा स्ट्रांग एन्टी बायोटिक ही एकमात्र विकल्प होता है।

इन दोनों ही मामलों में एफडीसी  दवाओं के कारण मरीज ने उन दवाओं का भी सेवन किया, जिनकी उन्हें जरूरत नहीं थी और नतीजा यह हुआ कि न चाहते हुए भी मरीज पर इन दवाओं का असर खत्म हो गया। एफडीसी  के नुकसान को देखते हुए ही केंद्र सरकार ने सितंबर 2018 को 328 एफडीसी दवाओं को बैन कर दिया था इनमें पेनकिलर, एंटी-बायॉटिक्स, डायबीटीज़, सर्दी-खांसी, सांस की बीमारी से लेकर पेट की समस्या तक से संबंधित दवाएं हैं। इन दवाओं से सेहत को होने वाले संभावित नुकसान को ध्यान में रखकर इन्हें बैन किया गया है। इनके अलावा, 6 दूसरी एफडीसी दवाओं पर भी बैन की सिफारिश की गई है। जिन दवाओं को बैन किया गया है, उनमें दो या ज्यादा दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है और बिना क्लिनिकल ट्रायल के ही इनको बाजार में उतार दिया गया था यानी एक तरह के ये गैर-कानूनी रूप से मार्केट में थीं। देश की टॉप ड्रग एडवाइजरी बॉडी 'दवा तकनीकी सलाहकार बोर्ड' (DTAB) ने इनके खतरे को सामने रखते हुए इन्हें बैन करने की सिफारिश सरकार से की थी। इन दवाओं को अलग-अलग कंपनियां ,अलग-अलग ब्रैंड नेम से बनाती थीं। कुल मिलाकर 6000 ब्रैंड की दवाओं पर बैन लगाया गया है लेकिन अब भी बहुत-सी खतरनाक दवाएं मार्केट में मौजूद हैं।

इसको समझने के लिए आपको सर्वप्रथम एफडीसी समझना पड़ेगा। एफडीसी  का फुल फॉर्म है फिक्सड डोस कॉम्बिनेशन दरअसल एक तरह से दवाओं का मिश्रण है । इसमें दो या ज्यादा बीमारियों की दवाओं को मिलाकर नई दवा तैयार की जाती है।

एफडीसी  दो तरह की होती हैं: रैशनल कॉम्बिनेशन और इररैशनल कॉम्बिनेशन। जिन दवाओं को बैन किया गया है, वे सभी इररैशनल कॉम्बिनेशन से बनी दवाएं हैं। इसका मतलब है जरूरत न होते हुए भी दवाओं का मिश्रण बनाया गया है। न इन दवाओं को कोई ट्रायल हुआ और न ही इनके साइड इफेक्ट्स के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध है जैसे कि निमेसुलाइड (Nimesulide) और डिक्लोफिनैक (Diclofenac) को मिलाकर बनाई गई एक दवा है। इसमें दोनों ही NSAIDs (नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इन्फ्लैमेटरी ड्रग्स) एजेंट माने जाते हैं। इन्हें एक साथ खाने से दोनों के साइड इफेक्ट्स बढ़ते हैं। इसी तरह पाचन से संबंधित शिकायत के लिए टिनिडैजोल (Tinidazole) अच्छी दवा है लेकिन बाजार में ज्यादातर इसे सिप्रोफ्लोक्ससिन (Ciprofloxacin) और कईं और दवाओं के मिश्रण के साथ बेचा जाता है। दूसरी कैटिगरी है रैशनल कॉम्बिनेशन से बनी एफडीसी  दवाओं की, जो कई बीमारियों के इलाज के लिए कारगर हैं। इसका मतलब है सिर्फ जरूरी दवाओं को बिल्कुल सही अनुपात में जरूरत के हिसाब से मिलाया गया है। इनका पूरा ट्रायल हुआ है। जैसे कि फोलिक एसिड और आयरन के मिश्रण से बनी एफडीसी  दवा, जोकि खून की कमी के साथ कईं और बीमारियों में भी बहुत फायदेमंद है। कुछ बीमारियों जैसे कि मलेरिया, टीबी या एचआईवी/एड्स के इलाज के लिए एफडीसी दवाओं की इजाजत दी गई है। डायबीटीज़ के लिए मेटमॉर्फिन हाइड्रोक्लोराइड के साथ सिटागलिप्टिन फॉस्फेट और ब्लड प्रेशर के लिए भी कुछ एफडीसी दवाओं को जरूरत होती है और ये दवाएं सरकार और डब्ल्यूएचओ, दोनों से अप्रूव्ड हैं लेकिन ज्यादातर बीमारियों के लिए एफडीसी  या कॉम्बिनेशन दवाओं की जरूरत नहीं होती।

https://cdsco.gov.in/opencms/opencms/en/consumer/List-Of-Banned-Drugs/भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी गैजेट नोटिफिकेशन में ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक 1940 के एक्ट में 26 a धारा के अनुसार इसकी बिक्री एवं उत्पादन पर प्रतिबंध है दिए जा रहे लिंक पर क्लिक करने पर पीडीएफ डाउलोड का विकल्प है । पाठकों के लिए लिंक दी जा रही है । आप इस पीडीएफ में प्रतिबंधित एफडीसी  एवं अन्य दवाओं के नाम देख सकते है ।

एफडीसी  बनाने में फायदा ही फायदा
अनुमान है कि हमारे देश में एफडीसी दवाओं का बाजार करीब 3000 हजार करोड़ रुपये का है। सवाल है कि अगर ये दवाएं नुकसानदेह हो सकती हैं तो फिर इतनी बिकती क्यों हैं? इसकी बड़ी वजह है इनकी आसानी से उपलब्धता और कम कीमत होना। भारत जैसे देश मे तकरीबन पांच हज़ार से ज्यादा तहसीलें है और 6 लाख अट्ठाइस हज़ार से भी ज्यादा गांव है जनसंख्या की दृष्टि से डॉक्टरों का अनुपात गंभीर रूप से कम है जिसके कारण झोला छाप डॉक्टर इन प्रतिबंधित दवाओं की बिक्री के सबसे बड़े चेनल के रूप में स्थापित हो गए है वहीं हिमाचल प्रदेश के बद्दी और गुजरात के अहमदाबाद में दवाओं की छोटी बड़ी उत्पादन इकाइयां कुकरमुत्ते की तरह उग आई है जो बड़ी आसानी से कई तरह के कॉम्बिनेशन बना कर बाजार में उतार देती है । दरअसल ये एक बहुत ही बड़ा नेटवर्क है जिसका काम सरकार की ठीक नाक के नीचे चलता है ।

- इनमें ओवर द काउंटर  दवाओं की तादाद भी खासी है। ये वे दवाएं होती हैं, जिनके लिए डॉक्टर के परचे की जरूरत नहीं होती। इन्हें लोग सीधे केमिस्ट से खरीद कर इस्तेमाल कर लेते हैं।
- अलग-अलग दो या तीन दवाओं का खर्चा उठाने के बजाय मरीज एक ही दवा खरीदना पसंद करता है।
- कई डॉक्टर भी इन्हें लिखते हैं। आम लोगों को इन दवाओं के नुकसान के बारे में जानकारी नहीं होती इसलिए वे डॉक्टर द्वारा लिखी या फिर खुद केमिस्ट से खरीदकर यह दवा ले लेते

इररेशनल कॉम्बिनेशन ही क्यों ?
जब ये दवाएं जरूरी नहीं हैं तो फिर कंपनियां इन्हें बनाती क्यों हैं? इसकी कुछ वजहें सामने आती हैं:
- कई बार कंपनियां नई दवा तैयार करने का दावा करने के लिए नई दवा बनाती हैं।
- नैशनल लिस्ट ऑफ असेंशियल मेडिसिंस के अंदर आनेवाली दवाओं के दाम सरकार तय कर देती है। कॉम्बो वाली दवाएं इसमें शामिल नहीं हैं। प्राइज कंट्रोल से बचने के लिए कंपनियां इस लिस्ट में शामिल दवा के साथ दूसरी दवा मिलाकर नई दवा बना देती हैं। इस नई दवा पर प्राइज कंट्रोल नहीं होता। मसलन अगर लिस्ट में पैरासिटामोल 500 एमजी है लेकिन कंपनी पैरासिटामोल 650 एमजी बेच रही है या फिर किसी दूसरी दवा के साथ मिलाकर बेच रही है तो उसकी कीमतों पर सरकारी कंट्रोल नहीं रहता। इसका फायदा सीधे-सीधे कंपनी को मिलता है।
- कंपनियों को भी इन्हें बनाना सस्ता पड़ता है। फिर ये चूंकि पहले से टेस्ट किए गए सॉल्ट पर बनती हैं इसलिए फटाफट तैयार हो जाती हैं। ऐसे में नया सॉल्ट खोजने और उससे दवा तैयार करने के मुकाबले इन्हें बनाना ज्यादा सहूलियत भरा होता है।
भारत जैसे विशाल देश मे सरकारी विभागों की लापरवाही का खमियाजा अक्सर भोली भाली जनता को भुगतना पड़ता है वही फार्मा कंपनियों और डॉक्टरों के द्वारा "दवा लिखवाने के कपटपूर्ण" व्यवसाय ने पूरे तंत्र में जैसे भांग घोल दी है, ड्रग कण्ट्रोल विभाग और उनके निरीक्षकों क्या ये पता नही होगा? निश्चित तौर पर पता होगा लेकिन सरकारी नोटशीट में उलझे सरकारी आदेशों की सुध कौन लेगा ? कौन है जो बिल्ली के गले में घंटी बाँधेगा ?बहरहाल जागरूक जनता का डॉक्टर से और सवाल उठना "कि आपको दी जाने वाली दवा का ड्रग कॉम्बिनेशन क्या है ? बहुत बड़ी तब्दीली ला सकता है , उठिए, बढिये और सही सवाल सही व्यक्ति से सही वक्त पर कीजिये , हो सकता है वो आपकी तरफ एक बार सिर उठा कर अचरज से देखे, आपको उसकी आँखों मे शायद सही गलत का जवाब मिल जाये। यक़ीन मानिए ये सवाल "एक बार तो उन्हें अंदर तक जरूर हिला देगा।
(पद्म प्रबोधिनी फॉउंडेशन)