प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-भूपेश बघेल के नागपुर में विरोध-प्रदर्शन के मायने

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-भूपेश बघेल के नागपुर में विरोध-प्रदर्शन के मायने


छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पार्टी की रणनीति के अनुसार कृषि विधेयक का विरोध नागपुर में दर्ज कराया। भूपेश के नागपुर में विरोध प्रदर्शन के कई मायने हैं। नागपुर विदर्भ का केन्द्र बिन्दु है और सबसे बड़ी बात वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का मुख्यालय है, जिसके दिशा-निर्देश और अनुशासन से भाजपा और उसके अनुषांगिक संगठन संचालित होते हैं। भाजपा के इस बौद्धिक और शक्ति संपन्न केंद्र में जाकर किसानों के हित की बात करते हुए भाजपा की नीतियां पर हमला करना दरअसल आरएसएस पर हमला करना ही है। भूपेश बघेल अपने तेवर से लगातार ये काम करते रहे हैं। वे उन फूलछाप या कमलछाप कांग्रेसियों में से नहीं हैं, जो दोनों जहान को साधे रहते हैं। कांग्रेस में बहुत सारे नेता ऐसे हैं, जिनकी सोच भाजपा के बहुत ही नजदीक की है। यही वजह है कि जब सत्ता का लालच खिलता है, तो बहुत से लोग अपनी ही पार्टी से बगावत करके उसकी सरकार गिराकर भाजपा में जाकर संघ के नागपुर कार्यालय में उपस्थिति दर्ज कराते हैं। वहीं भूपेश बघेल के तेवर हमेशा से आरएसएस के खिलाफ तीखे रहे हैं।

10 महीने पहले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आरएसएस को हिटलर और मुसोलिनी से प्रेरित संगठन बताया था। उन्होंने कहा कि आरएसएस के लोग हिटलर और मुसोलिनी को प्ररेणा मानते हैं, उन्हीं से प्ररेणा लेकर काली टोपी और खाकी पेंट पहनते हैं और ड्रम बजाते हैं। यह भारत की वेशभूषा और वाद्ययंत्र नहीं है, लेकिन इसे ही लेकर वे चलते हैं।

भूपेश बघेल का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुख्यालय वाले शहर नागपुर में जाकर विरोध का स्वर मुखर करना कुछ अलग ही मायने रखता है। कांग्रेस की राजनीति में अपना अलग तेवर रखने वाले भूपेश बघेल जो स्वयं एक किसान हैं, विधेयक से होने वाले प्रभाव की जमीनी हकीकत से वाकिफ हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आर्थिक क्षेत्र में काम करने वाले संगठन स्वदेशी जागरण मंच ने सरकार को सुझाव देते हुए कहा कि केंद्र सरकार को एमएसपी की गारंटी वाला नया बिल लेकर आना चाहिए। सरकार इन्हीं तीन बिलों में एमएसपी की गारंटी का जिक्र करना चाहिए था। अगर तीन बिलों में यह व्यवस्था नहीं हो सकी, तो फिर सरकार को चौथा बिल लाकर किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी देनी चाहिए।
लोकसभा के दस दिन के छोटे सत्र में 25 विधेयक पारित किये गये, जिनमें से कृषि संबंधी विधेयकों को लेकर सबसे ज्यादा विरोध हो रहा है।
किसानो से जुड़े बिल के साथ ही उपजीविकाजन्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता 2020, औद्योगिक संबंध संहिता 2020 और सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 को भी मंजूरी दी गई। इस विधेयक के पारित हो जाने के बाद इसके तहत आने वाली कंपनियों को बंद करने की बाधाएं खत्म होंगी और अधिकतम 300 कर्मचारियों वाली कंपनियों को सरकार की इजाजत के बिना कर्मचारियों को हटाने की अनुमति होगी। कोरोना संक्रमण और आर्थिक मंदी के कारण वैसे ही पिछले समय में बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की छंटनी हर सेक्टर में हुई है। अब कर्मचारियों को हटाने, कंपनी बंद करने में व्यवसायियों को कानूनी कोई डर नहीं रहेगा। आने वाले दिनों में बेरोजगारी और बढ़ेगी। भूपेश बघेल ने इस विधेयक को किसानों के लिए काला कानून बताते हुए इसे संघीय ढांचे पर हमला बताया है। कांग्रेस और अन्य दलों से राष्ट्रपति से इन विधेयक को मंजूरी नहीं देने की बात कही है। आवश्यक वस्तु अधिनियम खत्म करने से जमाखोरी की आशंका और कृषि क्षेत्र में बड़े निजी व्यापारियों की घुसपैठ को लेकर पूरे देश में अलग-अलग क्षेत्रों में प्रदर्शन हो रहे हैं। वहीं भाजपा और उसकी समर्थक पार्टियां, विचारक इन विधेयकों को सुधारवादी बताते हुए कृषि क्षेत्र में भारी ग्रोथ होने की संभावना व्यक्त कर रहे हैं। उनका मानना है कि निजी क्षेत्र के आने से पूंजी का प्रभाव बढ़ेगा, खरीदारों में स्पर्धा होगी, जिसका लाभ किसानों को मिलेगा।

संसद के दोनों सदनों में कोरोना संक्रमण के बावजूद बहुत गहमागहमी रही। सरकार भी जल्दी में अपने विधेयक पारित कराना चाहती थी, जिसमें वह सफल रही। मोदी सरकार में अपनी बातों को लेकर एक तरह की हठधर्मिता और जिद देखी जाती है, जिसे उनके समर्थक मजबूत सरकार के रूप में देखते हैं। वहीं विपक्ष के लोग इसे तानाशाही करार देते हैं। आज नरेन्द्र मोदी का कद पार्टी से बड़ा है। यही वजह है कि चुनाव में भाजपा पीछे और नरेन्द्र मोदी का नाम आगे था।

अमेरिका की टाइम मैग्जीन ने दुनिया के जिन सौ प्रभावशाली व्यक्तियों की सूची जारी की है, उसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम भी शामिल है और उनके साथ-साथ शाहीनबाग में नागरिक कानून के खिलाफ आंदोलन करने वाली 82 वर्षीय दादी बिलिकस बानों का नाम भी है। टाइम मैग्जीन अपनी इस टिप्पणी के साथ मोदी का उल्लेख किया है। 'भारत के ज्यादातर प्रधानमंत्री हिन्दू समुदाय से रहे हैं, लेकिन सिर्फ मोदी इस तरह का काम कर रहे हैं, जैसे उनके लिए कोई और मायने ही नहीं रखता। उनकी राष्ट्रवादी भाजपा ने कुलीनता को ताक पर रख दिया। खासतौर से मुसलमान को निशाना बनाया।

आरएसएस की पृष्ठभूमि और विचारधारा से आने वाले देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लंबे समय तक संघ की कार्यशैली पर ही काम करते रहे हैं। सामान्यत: सत्ता के कार्यक्रमों में मंच साझा नहीं करने वाला आरएसएस जो बहुत लंबे समय तक अपने को एक संघ सांस्कृतिक संगठन बताती रही, अब खुलकर भाजपा की सत्ता के साथ दिखाई देती है। अभी हाल ही में राममंदिर शिलान्यास समारोह में सरसंघ संचालक मोहन भागवत उपस्थित रहे।

1925 को विजयादशमी के दिन अपने पांच मित्रों के साथ आर.एस.एस. दैनिक कार्यक्रम प्रारंभ करने वाले आर.एस.एस के संस्थापक डॉ. केशवराम बलिराम हेडगेवार का जन्म एक अप्रैल 1889 को नागपुर में हुआ। कलकत्ता से मेडिकल की पढ़ाई करने वाले डॉ. हेडगेवार ने 1927 में 15 अप्रैल से 15 जून तक बीस स्वयंसेवकों के साथ जो दो महीने का प्रशिक्षण शिविर संचालित किया था। फिर वहीं से स्वयंसेवकों की फौज बनना शुरू हुई, जिसके अग्रणी सिपाही के रूप में हमें आज मोदीजी, अमित शाह और उन जैसे बहुत से नेता दिखाई देते हैं। अपने बौद्धिक केन्द्र नागपुर से संचालित होने वाली भाजपा ने जनता पार्टी के समय से जो अपनी राजनीतिक यात्रा का आगाज किया है, वह आज देश के अधिकांश राज्यों में सत्ता के रूप में दिखाई दे रही है। किसानों, मजदूरों, बुद्धिजीवियों, वनवासियों, व्यापारियों सहित समाज को प्रभावित करने वाले हर वर्ग में अलग नाम से इनके अनुषांगिक संगठन मौजूद हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आर्थिक क्षेत्र में काम करने वाले अनुषांगिक संगठन स्वदेशी जागरण मंच ने सरकार को सुझाव देते हुए कहा कि केंद्र सरकार को एमएसपी की गारंटी वाला नया बिल लेकर आना चाहिए। सरकार इन्हीं तीन बिलों में एमएसपी की गारंटी का जिक्र करना चाहिए था। अगर तीन बिलों में यह व्यवस्था नहीं हो सकी तो फिर सरकार को चौथा बिल लाकर किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी देनी चाहिए। नरेन्द्र मोदी की सरकार आज जिस स्वतंत्रता से निर्णय ले रही है, उसके पीछे आरएसएस का खुला समर्थन है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसे अवसरवादियों को बखूबी पहचानता है और कभी भी उन्हें अपना सहोदर भाई नहीं मानता। संघ अपनी निष्ठा पर परखकर लोगों को, ठोक बजाकर अपने अनुकूल पाकर ही प्रमोट करता है। बहुत सारे कमतर लोग भी बड़े-बड़े संस्थानों, स्थान पर इसलिए काबिज हैं की उनकी या उनके परिवार के सूत्र आरएसएस की विचारधारा से जुड़े हैं। किसी समय अपनी सादगी और सहज जीवन पद्घति के लिए होलटाईमर के रूप में संगठन को अपनी सेवाएं देने वाले इस संगठन और विचारधारा से जुड़े लोग अब सत्ता की नजदीकी से वो सारी सुविधाएं और पॉवर का उपभोग करना चाहते हैं जिससे कभी वे परहेज करते थे।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कृषि संबंधी विधयकों को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि अब सरकार की नजर किसानों की जमीन पर है। अब कोई भी अपने गोदाम में कितना भी सामान रख सकता है। कुछ लोग भारत में अनाजों के, दलहन-तिलहन के मूल्य पर नियंत्रण करेंगे। इससे आम उपभोक्ता पर जबरदस्त मार पडऩे वाली है। अब तक आपने एयरपोर्ट बेच दिया, रेलवे स्टेशन बेच दिया और अब आपकी नजर किसानों की जमीन पर है। किसान बिल को लेकर जिस तरह का उग्र आंदोलन पंजाब, हरियाणा और यूपी में हो रहा है, वैसा आंदोलन मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में नहीं है। कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियां किसानो के मुद्दे पर एकजुट होकर आंदोलन कर रही हैं। समूचे विपक्ष, आंदोलनकारी किसान मजदूरो का मुकाबला नरेन्द्र मोदी की उस मजबूत सरकार से है जिसके साथ देश का बहुत बड़ा मीडिया खड़ा है। मीडिया की नजर और प्राथमिकता, ब्रेकिंग न्यूज में 25 सितम्बर का किसान आंदोलन नहीं दीपिका पादुकोण की तीन साल पुरानी उस व्हाटसअप चैट पर है जिसमें हशिश, गांजे का जिक्र है। टीवी स्क्रीन से अब देश का आम आदमी और उसकी लड़ाई गायब है। देश की बाकी जनता कोरोना से बचाव के नाम पर घर में बैठकर वो सब देख रही है, जिसे कुछ लोग मीडिया के जरिये दिखाना चाहते हैं।

सवाल यह है कि भूपेश बघेल जो नागपुर में किसानों के हक में अपनी आवाज बुलंद करने जा रहे हैं, वे किस हद तक यहां के बौद्धिकों को प्रभावित कर पायेंगे। अभी तक बिखरा हुआ विपक्ष और कारपोरेट के लिए काम करने वाले नेताओं के चलते मोदी सरकार के सारे बिल, विधेयक, कानून चाहे उनका जनता में कितना ही विरोध क्यों ना हुआ हो लागू हो गये हैं। देश का एक बड़ा वर्ग जमीनी हकीकत जानने के बाद भी चुप है या फिर भक्तिरस में डूबा हुआ है।