कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः पढ़ती नहीं, देखने वाली जनता

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः पढ़ती नहीं, देखने वाली जनता


लिखने से कुछ न होगा

शायद दिखने से कुछ हो

किसी के बाहर आने से कुछ हो


कौन पढ़ रहा लिखे हुए को

लिखने वाला नहीं जानता

कौन देखता दिखे हुए को

दिखने वाला नहीं जानता


कहे मीडिया

जनता सब कुछ देख रही है

कोई कैसे जाने

वह लिखा हुआ भी पढ़ती है

मगर मीडिया दिखा रहा जो

उसे देखने वाली जनता

बाहर आने वाले को कैसे देखेगी


कहाँ है पढ़ने वाली जनता

कुछ गढ़ने वाली जनता तो रहती ही है

भले सुने न कोई कुछ कहती ही है

सितमगरों से लड़ने वाली जनता

कहाँ बैठकर सब कुछ देख रही है

कहाँ खो गयी जनता


इंटेलेक्चुअल हुए फेसबुकिया

अपनी ही सेल्फी में डूबे

नहीं रहे आउटलुकिया

सेमीनारी होकर जन के कुछ तो पास थे

अब वेवीनारी होकर जन से कितने दूर हैं

बाहर आकर कहें तो कोई जाने

जनता कैसे किसको अपना माने