कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः जीतनराम-हारनराम

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः जीतनराम-हारनराम


उन लोगों को नहीं समर्पित संविधान

जो जात-बरन में रहते हैं

ताक़तवर की शरण ढूँढते

कई शरणों को गहते हैं


उन लोगों को नहीं समर्पित संविधान

जो केवल अधिकार माँगते रहते हैं


यह कैसी बेबसी

आवाज़ नहीं बच रही उठाने को

हाथ-पाँव बच नहीं रहे

कर्तव्य निभाने को


उन लोगों को नहीं समर्पित संविधान

जो देशबंधु ही नहीं रहे


सोचो, भारत के हुनरमंद लोगो

तुम को अपनी मुट्ठी में भर के

तुम्हारे जात-बरन का सौदा कर के

जीतनराम जीत जाते हैं

तुम को बेबस छोड़

कितनी बार राजपाट पाते हैं

लोकतंत्र के भाग फूट जाते हैं


बेबस जन के तारनराम 

कहीं ढूँढे न मिलते

बेबस तन के हारनराम

मन मसोसकर रह जाते हैं