श्रीकृष्ण जन्माष्टमी : राममनोहर लोहिया की नजर में श्रीकृष्ण

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी : राममनोहर लोहिया की नजर में श्रीकृष्ण


कृष्ण पर राममनोहर लोहिया का यह दुर्लभ, नायाब, मौलिक, भविष्यमूलक और जनाभिमुख लेख  पढ़िए
-राममनोहर लोहिया

कृष्ण की सभी चीजें दो हैं, दो मां, दो बाप, दो नगर, दो प्रेमिकाएं, या यों कहिए अनेक। जो चीज संसारी अर्थ में बाद की या स्वीकृत या सामाजिक है, वह असली से भी श्रेष्ठ और अधिक प्रिय हो गयी है। यों कृष्ण देवकीनन्दन भी हैं, लेकिन यशोदानन्दन अधिक। ऐसे लोग मिल सकते हैं जो कृष्ण की असली मां, पेट-मां का नाम न जानते हों, लेकिन बाद वाली, दूध वाली, यशोदा का नाम न जानने वाला कोई विरला ही होगा। उसी तरह, वासुदेव कुछ हारे हुए से हैं, और नन्द को असली बाप से कुछ बढ़कर ही रुतबा मिल गया है। द्वारका और मथुरा की होड़ करना कुछ ठीक नहीं, क्योंकि भूगोल और इतिहास ने मथुरा का साथ दिया है। किन्तु यदि कृष्ण की चले तो द्वारका और द्वारकाधीश, मथुरा और मथुरापति से अधिक प्रिय रहे। मथुरा से तो बाललीला और यौवन-क्रीड़ा की दृष्टि से, वृन्दावन और बरसाना वगैरह अधिक महत्वपूर्ण हैं। प्रमिकाओं का प्रश्न जरा उलझा हुआ है। किसकी तुलना की जाए, रुक्मिणी और सत्यभामा की, राधा और रुक्मिणी की, या राधा और द्रौपदी की। प्रेमिका शब्द का अर्थ संकुचित न कर सखा-सखी भाव को ले के चलना होगा। अब तो मीरा ने भी होड़ लगानी शुरू की है। जो हो, अभी तो राधा ही बड़भागिनी है कि तीन लोक का स्वामी उसके चरणों का दास है। समय का फेर और महाकाल शायद द्रौपदी या मीरा को राधा की जगह न पहुंचाएं, लेकिन इतना सम्भव नहीं लगता। हर हालत में रुक्मिणी राधा से टक्कर कभी नहीं ले सकेगी। 

कृष्ण के पहले, भारतीय देव, आसमान के देवता हैं। निस्सन्देह, अवतार कृष्ष्ण के पहले से शुरू हो गई। किन्तु त्रेता का राम ऐसा मनुष्य है जो निरन्तर देव बनने की कोशिश करता रहा। इसीलिए उसमें आसमान के देवता का अंश कुछ अधिक है। द्वापर का कृष्ण ऐसा देव है, जो निरन्तर मनुष्य बनने की कोशिशकरता रहा। उसमें उसे सम्पूर्ण सफलता मिली। कृष्ण सम्पूर्ण और अबाध मनुष्य है, खूब खाया-पिलाया, खुद प्यार किया और प्यार सिखाया, जनगण की रक्षा की और उसका रास्ता बताया, निर्लिप्त भोग का महान् त्यागी और योगी बना।