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II छत्तीस घाट : छॉलीवुड वालों..याद रखना जो यहाँ नही है, वो कहीं नही है. वरिष्ठ पत्रकार अनिल द्विवेदी का कॉलम II

II छत्तीस घाट : छॉलीवुड वालों..याद रखना जो यहाँ नही है, वो कहीं नही है. वरिष्ठ पत्रकार अनिल द्विवेदी का कॉलम II

रागों का राग 'देश-राग गाते हुए, पांच दिन तक चला रायपुर अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव यानि रिफ-2020 हमसे विदा हो गया. लाइट-साउंड-एक्शन-कैमरा के रोमांच से भरी इस उत्सविकता में, सेंसर से पास या अटकी, भाषा या देश की सीमाओं को तोड़ते हुए, जिंदगी को कुरेदती, देश-विदेश की दर्जनों फिल्में दिखाई गईं. बॉलीवुड के सितारा अभिनेता, अभिनेत्रियां, निर्माता-निर्देशक भी इस उत्सव में जुटे. सिने-प्रेमियों और नवोदित कलाकारों के साथ उन्होंने खुद की फिल्में देखी और आत्मावलोकन किया. यानि कलमकार-फिल्मकार-नौसिखिए, सभी इस सांस्कृतिक आयाम के साक्षी बने पर छॉलीवुड तो मानो गायब ही रहा! धन्न हे मितान.

साहित्य, सिनेमा और रंगकर्म के लिए देश के कई शहर ब्रॉण्ड बन चुके हैं. जैसे जयपुर का साहित्य महोत्सव, इंदौर का फिल्म फेस्टीवल, महाराष्ट्र का नाटय महोत्सव. उसी तरह रायपुर का मुक्तिबोध नाटय समारोह या रिफ-2020 यानि रायपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टीवल. यूं कह लें कि रंगकर्म में आधी सदी बिता लेने वाले सुभाष मिश्र ये दोनों आयोजन करते आए हैं. वे आत्मप्रचार से दूर चुपचाप सार्थक रचते रहते हैं. आश्चर्य कि उन्होंने 100 सीटर वाला थिएटर 'जनमंच अपने पैसे से बनवाया और उसे रंगकर्म को समर्पित कर दिया.

फिर यह उस अभागे शहर के लिए जहां जनता के पैसे से बना सरकारी ऑडिटोरियम भी एक लाख रूपये किराए पर मिलता है. अभिनेता अखिलेंद्र मिश्रा ने सुभाषजी का हौंसला यह कहकर बढ़ाया कि 'पृथ्वीराज कपूर ने जब पृथ्वी थिएटर शुरू किया था तो उनके कर्मचारी दानपात्र लेकर दरवाजे पर खड़े थे ताकि सहयोग राशि इकटटी की जा सके.' कुंठा के कॉस्टेमिक स्टोर्स से बाहर आकर छॉलीवुड को खुद से पूछना चाहिए कि जिस छत्तीसगढ़ से उसने बहुत कुछ बटोरा और खुद को खड़ा किया, उसने अपनी ओर से देश को या छत्तीसगढ़ को क्या दिया? सिर्फ ठेंगा!

फिल्मोत्सव को यादगार बनाने वाली फिल्मों में अर्जेंटीना के विश्व प्रसिद्ध निर्देशक पाब्लो सेजार की फिल्म 'थिंकिंग आफ हिम' क्या गजब की मूवी थी. गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर और विक्टोरिया ओकंपो के प्रेम प्रसंगों पर आधारित इस मूवी ने युवा फिल्म निर्माताओं को सिखाया कि निर्देशन, पटकथा और कैमरे से किस तरह चमत्कार किया जाता है! इसी तरह युवा फिल्मकार कामाख्या नारायण सिंह की फीचर फिल्म 'भोर' समाज के आखिरी पायदान पर जानवर की हालत में जी रहे मुसहर समाज का सिनेमाई क्लाइडोस्कोप नजर आया.

Come with me if you want to live. अब छॉलीवुड भले ही ठकुरसुहाती आचरण दिखा रहा हो पर फिल्मोत्सव के आयोजक उसकी उपस्थिति की अनिवार्यता को नही भूले. दो घण्टे का एक वैचारिक आख्यान वरिष्ठ पत्रकार अनिरूद्ध दुबे के नेतृत्व में रखा गया तो छॉलीवुड के सभी बड़े फिल्म निर्माता और अभिनेता हाजिर हुए. अधिकांश आइनासाजों ने संसाधन-तकनीक-प्रतिभा और आर्थिक मदद का रोना रोया. भाई अनुज शर्मा ने सही कहा, 'आपका साथ और सहयोग मिलता रहा तो छॉलीवुड आगे बढ़ता रहेगा.'

लेकिन गंध तब मची जब पत्रकार दिव्या दुबे ने इन निर्माता निर्देशकों के सामने यह कहते हुए सवाल पूछ लिया कि उसने आज तक छत्तीसगढ़ी फिल्म नही देखी क्योंकि वे स्तरीय नही होती. इसके बाद मानो सबको साँप सूंघ गया. कांव-कांव मच गई. बॉलीवुड को यह गलतफहमी या सहीफहमी रहती होगी कि वे स्टैण्डर्ड सिनेमा बनाते होंगे, पर ना तो दिव्या, ना मैं और ना ही आम जनता इस गलतफहमी पर जीती है वरना 300 फिल्मों में से 250 बाक्स आफिस पर औंधे मुंह ना गिरतीं!

आप मानें या ना मानें, फिल्म विकास निगम या फिल्म सिटी को यदि जनसमर्थन हासिल नही हो रहा है तो इसकी बड़ी वजह छॉलीवुड की एहसाने-गुरबत ही है. गोष्ठी खत्म होने के बाद भी नवोदित रंगकर्मी यह कहते सुने गए कि छॉलीवुड हमारे किसी काम का नहीं. ना वह टैलेण्ट पहचानता? ना सिखाने को तैयार है और ना ही सीखने को. फिर हम उसे हाथोंहाथ क्यों लें? यह कोई घास छीलने का पाठयक्रम तो है नही.

इस टिप्पणी पर मुस्कुराने की मुसीबत के बीच छॉलीवुड को यह समझ लेना होगा कि स्टैंडर्ड सिनेमा बनाने का उसका दावा, नई पीढ़ी के मन में किस कदर खोखला है! घर बैठे संसाधन या सहयोग तो नही मिलने वाला. इंडियन ऑयडल की तरह उसे भी गली-गली जाकर टैलेण्ट हंट खोजना होगा. प्यासे को कुँए के पास पहुंचना होता है. यदि आपके पास अच्छी फिल्में बनाने वाले निर्माता निर्देशक हैं, कलाकार हैं, फिल्म समीक्षक और पटकथा लेखक हैं, फिल्म अवार्डस बांटने की दुकानदारी चलाने वाले लोग भी हैं, मुंबई से अभिनेत्रियां लाकर उनके नाम की दलाली खाने वाले इवेंट मैनेजर भी हैं, पर ये सब इस फिल्मोत्सव से गायब थे! जबकि उनके लिए यह सीखने, सिखाने या प्रतिभाओं को तलाशने का एक अच्छा ठौर होता.

माना कि सूरज हर एक को फोकट में उपलब्ध नही होता. परंतु ऐसे फिल्मोत्सव भी पाठशाला की तरह ही हैं. बॉलीवुड स्टॉर यशपाल शर्मा महज कुछ घण्टों के लिए रायपुर पहुँचे थे पर जब उन्हें पता चला कि दूसरे दिन उनकी तीन फिल्मों का प्रदर्शन है तो फलाइट केंसल कर दो दिन तक महोत्सव में जमे रहे. आकाशधर्मा होने के बावजूद वे जमीन से जुड़े हैं, सादगी और विनम्रता की प्रतिमूर्ति हैं. मसलन अचानक कार्यक्रम में पहुंचने पर वे सीधे विदयार्थियों के बीच ही जा बैठे. गैंगस ऑफ वासेपुर और पान सिंग तोमर जैसी फिल्मों के नायक, फिल्म निर्माता तिगमांशु धुलिया ने खुद की बनाई फिल्में युवाओं के साथ बैठकर देखी और फीडबैक लिए.

क्या यही उदारता, बड़प्पन छॉलीवुड के निर्माता निर्देशक दिखला सकते हैं.  फिल्मी-गुरूओं से कुछ पाने और सीखने की तमन्ना में रंगमंच की नवकोपलें पूरे पांच दिन उत्सव में डटी रहीं. उन्हें सबसे ज्यादा तलाश अपने छॉलीवुड की थी लेकिन वह नही दिखा तो नही दिखा, सिवाय योगेश अग्रवाल, सतीश जैन या एक—दो परिचितों के अलावा. ऋगवेद में लिखा है कि यदिहास्ति तदन्यत्र, यन्नेहास्ति न तत्क्वचित अर्थात जो कुछ यहां है, वह दूसरी जगह भी है, और जो यहाँ नही है, वह कहीं नही है. रंगी-चुनी तहजीब के साथ छॉलीवुड को यह सूक्ति हमेशा के लिए याद कर लेना चाहिए.



अनिल द्विवेदी : लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.


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