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प्रसंगवश: कौशल्या के राम: रामलीला का मंचन

प्रसंगवश: कौशल्या के राम: रामलीला का मंचन
सुभाष मिश्र          
छत्तीसगढ़ सरकार का संस्कृति विभाग विधायक सत्यनारायण शर्मा और अन्य लोगों के रायपुर के शहीद स्मारक में 4 से 6 अक्टूबर को कौशल्या के राम के नाम पर रामलीला का भव्य मंचन करवा रहा है। इस आयोजन के लिए हमर राम सांस्कृतिक समिति भी बनी है, जिसके संयोजक विकास तिवारी हैं। 
राम हमारी आस्था के प्रतीक हैं। राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। विवाह में राम जैसे वर और सीता जैसी वधु को लेकर गीत गाए जाते हैं। सीता-राम की जोड़ी को आदर्श जोड़ी माना जाता है। वाल्मिकी से लेकर तुलसीदास, नरेन्द्र कोहली और भगवान सिंह तक सबके अपने-अपने राम हैं। रामचरित मानस सरीखा जीवन विवेक और नीति बोधक ग्रंथ दुनिया के साहित्य में शायद ही कोई दूसरा होगा। तुलसी के राम जन-जन के राम हैं। तुलसी के राम विवेकपूर्ण शिक्षा देने वाले राम हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी कृति रामचरित मानस को लोकप्रिय बनाने के लिए स्वयं समाज के कमजोर तबके के साथ मिलकर रामलीला का आयोजन बनारस के घाट पर किया। बनारस के पंडित, मठाधीश उन्हें अपने घाटों पर घुसने नहीं देते थे। इसलिए उन्होंने लोक मंगल की कामना से रामचरित मानस लिखी। भगवान राम के लोकव्यापीकरण का श्रेय तुलसीदास को जाता है। 
राम जन्म भूमि विवाद को लेकर पिछले तीन दशक से राम जन-जन तक पहुंचे हैं। ये राम तुलसी के राम से भिन्न हैं। गांधी जिनकी 150वीं जन्मशती इस वर्ष मनाई जानी है। उनके राम सत्य, अंहिसा, सहिष्णुता के राम थे। इसलिए गोडसे की गोली लगने के बाद भी उनके मुंह से अंतिम शब्द हे राम निकला। राम जन्मभूमि आंदोलन और बावरी मस्जिद गिराने के बाद से मानों राम के मायने ही बदल गए। जय-जय श्री राम का नाम किसी हथियार की तरह इस्तेमाल होने लगा। इस आंदोलन के बाद पैदा हुई पीढ़ी बहुत ही कट्टरता से भरी हुई है। हमारे देश में हमने युवाओं को कभी इतना साम्प्रदायिक बनते नहीं देखा। आज हमारे युवा धर्म के नाम पर बम में तब्दील हो गए हैं, और हमारी जो साम्प्रदायिक सद्भाव की सांस्कृतिक पहचान थी, उसे नष्ट कर रहे हैं। आज भगवान राम पर कुछ लोगों ने एकाधिकार सा स्थापित कर लिया है, उनके लिए भगवान राम, जय-जय श्री राम उनकी हिन्दू अस्मिता का प्रतीक है। ऐसे लोगों ने कभी यह नारा भी गढ़ा हिन्दुस्तान में रहना है तो जय श्री राम कहना होगा। ऐसे लोगों ने भगवान श्री राम के चरित्र को भलिभांति समझा ही नहीं। संवेदनशील, सहिष्णु  ,उदार और विनम्रता की प्रतिमूर्ति माने जाने वाले राम जिन्हें इसी कारण मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया वही राम दल विशेष में आकर उग्र और आक्रामक धजा धर लेते हैं।लालकृष्ण अडवाणी की रथयात्रा के बाद भय प्रकट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी अलग ही तरह से दिखाई और सुनाई देने लगा। 
रायपुर में होने वाला तीन दिवसीय कौशल्या के राम प्रसंग में निश्चित ही वह रामलीला खेली जाएगी, जो लोकमंगल की कामना लिए हैं। हमें उन राम के दर्शन होंगे जो सबके हैं। रामलीला को धार्मिक तरीके से ना देखा जाए, इसकी जनमानस में गहरी पैठ है। दशहरे के समय हम सब अन्याय और अधर्म के प्रतीक रावण के पुतले को जलाते हैं, पर सच्चाई यह है कि यह पुतला हर साल बड़ा होता जाता है। रामलीला का इस्तेमाल किस तरह से किया जा रहा है, यह भी एक सवाल है। अगर रामलीला धार्मिक अंधविश्वास को बढ़ावा देने के लिए हो रहा हो तो हमें सचेत रहने की जरूरत है। किन्तु यदि इसका उपयोग धार्मिक सौहार्द के लिए किया जाता है तो यह स्वागत योग्य है। किसी भी कृति के साथ कैसा ट्रीटमेंट किया जाता है यह करने वाले की नीयत पर है। राम मनुष्य के प्रथम नायक हैं, जिसके जैसा मनुष्य होने के सपने देखता है। 
छत्तीसगढ़ को दक्षिण कौशल प्रदेश भी कहा जाता है। पूरे छत्तीसगढ़ में जन आस्था है कि कौशल्या दक्षिण कोसल अर्थात् छत्तीसगढ़ की पुत्री थी तथा आरंग (रायपुर) के समीप स्थित चंद्रखुरी उनका जन्म स्थान था। पूरी श्रद्धा और भक्ति से तर्क भी दिया जाता है कि सम्पूर्ण भारतवर्ष में कौशल्या का एक ही मंदिर है जो चन्द्रखुरी में है। यहां भांचा के चरणों में प्रणाम किया जाता है। तथा किसी भी स्थिति परिस्थिति में उसे दुखित अथवा अप्रसन्न नहीं किया जाता क्योंकि भांचा में ही श्रीराम को देखा जाता है। 
कवि उपन्यासकार भगवान सिंह अपने उपन्यास अपने-अपने राम में एक ऐसे राम की खोज करते हैं, जो कभी पंवारे के रूप में रचा गया होगा। यह वर्तमान के उस सत्य का भी साक्षात्कार है जिसे राम और रमैया की दुल्हन की आड़ में बाजा लुटने के प्रयत्नों के सामने आ रहा है। यह उस वर्णवासी का भी जवाब है जिसके समर्थन में राम तक को इस्तेमाल कर लिया गया, जिनके जीवन का एक-एक आचरण उसे तोड़ने और उससे बाहर निकलने की छटपटाहट से भरा है। वे अपनी बात कहने के लिए तुलसीदास की चौपाईयां का सहारा लेते हैं। 
एतेहु पर करिहहिं जे असंका
मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका
कबि न होउं नहिं चतुर कहावउँ
मति अनुरूप राम गुन गावउँ।।
अंधविश्वास उन्मूलन सिद्धांत किताब में डॉ. नरेन्द्र दाभोलकर कहते हैं कि सत्ताधीशों और सांस्कृतिक दृष्टि से अगड़े लोगों ने देव और धर्म को शोषण का हथियार बनाया, चार्वाक, दिग्नाग जैसे भारतीय विचारकों ने ईश्वर की कल्पना को नकारा। गौतम बुद्ध, संत कबीर जैसे लोगों ने मूर्तिपूजा को नकारा। वे कहते हैं कि समाज का एक ऐसा भी तबका है, जो ईश्वर की कल्पना के किसी भी विवाद में बिना पड़े उसके अस्तित्व को स्वीकारता है। यह   स्वीकृति व्यक्ति और समाज के लिए फायदेमंद है। ईश्वर की पहली कल्पना निर्माणकर्त्ता के रूप में उभरकर आती है। ईश्वर का दूसरा रूप नियंत्रणकर्त्ता का है। ईश्वर सर्वज्ञ है, सबसे ताकतवर और सर्व मंगलकारी है। ईश्वर की एक धारण निर्गुण निराकार की है। ईश्वर सच्चिदानंद है, वह सत्य है शाश्वत है। अंधविश्वास के खिलाफ समाज को बार-बार सचेत करने वाले नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या कट्टरपंथी ताकतों के हाथों होती है, और हम खामोश से तमाशा देखते हैं।
रामचरित मानस आधारित रामलीला के जरिए दरअसल हम उस सर्वमंगलकारी ईश्वर की कल्पना को साकार होते देखते हैं, जो हमारे जनमानस में व्याप्त हैं। यही वजह है कि हमारे पूरे देश में अलग-अलग तरीके से रामलीला का मंचन होता है। यह सही है कि हमने ईश्वर को नहीं देखा, राम के जन्म और उनके अस्तित्व को लेकर न्यायालय में बहुतेरे सवाल खड़े किए जा रहे हैं। बावजूद इसके भगवान राम हम सबकी आस्था के केंद्र में हैं। वाल्मिकी के राम, तुलसी के राम, नरेन्द्र कोहली के राम, भगवान सिंह के राम अलग-अलग हो सकते हैं। हर लेखक अपनी कृति में अपने अनुसार चीजें गढ़ता है। सवाल यह है कि वह कृति के साथ आपका ट्रीटमेंट कैसा है? आपकी नीयत क्या है? सबसे ज्यादा आसान होता है किसी मासूम सी और पवित्र समझी जानी वाली धार्मिक कथाओं, धारणाओं चरित्रों को हथियार में तब्दील कर देना यह हथियार मनुष्यता के खिलाफ कब खड़ा हो जाता है, किसी को पता ही नहीं चलता। हमारे अपने समाज में कट्टरता के लिए कभी भी कोई स्थान  नहीं रहा। मुस्लिम और ईसाई धर्म जैसी कट्टरता हिन्दू धर्म में नहीं थी। जो भी विचारक और चिंतक थे वे हमारे ऋषि थे। इस दृष्टि से मोहम्मद साहब और ईसा मसीह भी हमारे लिए विचारक की ही तरह थे। हमारे शंकाराचार्य शास्त्रार्थ करते थे। तर्क-वितर्क करके नये विचारों की उत्पत्ति होती थी। इस गौरवशाली परंपरा को भूलकर हमने अपनी चीजों को बहुत बिगाड़ा है। अब हमारे असहमति के लिए कोई स्थान नहीं है, जो विरोध में बोलते हैं, जो स्वर में स्वर नहीं मिलाते हैं, वे या ता देशद्रोही हैं या गद्दार हैं। हमारे देश में पिछले 25-30 वर्षों में वर्तमान को घसीटकर पुरातन की ओर ले जाने की कोशिश हो रही है। कथित राष्ट्रवाद के नाम पर लोगों को डराया-धमकाया जा रहा है। राम जैसा मन को शांति और सुकून देने वाला कोमल शब्द अपने उच्चारण के जयघोष में अपनी ध्वनि, शब्दों के माध्यम से हथियार बनके इस्तेमाल होने लगा है। लोग जय-जय श्री राम कहकर कुछ लोगों को डराने लगे। यह सब हाल ही समय में ज्यादा हुआ है। सरदार वल्लभभाई पटेल का कद बड़ा करके नेहरू का कद छोटा करने की कोशिश हो या गांधीजी की 150वीं जयंती के समय गांधी को कटघरे में खड़े करने की कोशिश। ऐसे समय में हमारे पड़ोसी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान का भाषण जिसे हम मध्ययुगीन सोच वाला भाषण कहके कोस रहे हैं। तब हमें यह भी सोचना पड़ेगा कि हम अपने आसपास मध्ययुगीन संस्कारों की वकालत तो नहीं कर रहे हैं। 
राम के ननिहाल समझे जाने वाले दक्षिण कौशल के रायपुर में रामलीला की शुरुआत एक अच्छी शुरुआत है। बशर्त की यह रामलीला लोकमंगल की कामना के साथ हो।