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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- महिलाओं के हक में एक और फैसला

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- महिलाओं के हक में एक और फैसला


महिलाओं के हक में जब भी कोई फैसला आता है तो मेरे जैसे बहुत से लोग जो महिला-पुरुष को बराबरी के नजरिये से देखते हैं, खुश होते हैंं। पूरी दुनिया की आधी आबादी जिससे दुनिया में रौनक है, जो पूरे परिवार को, घर को एक सूत्र में बांधे रखती है, उसे उसका वाजिब हक मिले, यह जरूरी है। महिला सशक्तिकरण को लेकर देश में बहुत से निर्णय हुए हैं, योजनाएं आई है, कानूनों में संशोधन किये गये हैं, किन्तु इन सबके बावजूद हमारे देश की अधिकांश महिलाएं दोयम दर्जे की नागरिक मानी जाती है। घरेलू कामकाजी महिलाओं के श्रम की, काम की गिनती उस तरह से नहीं होती जैसे कि एक घर से बाहर काम करने जाने वाले पुरुष के काम की गिनती होती है। एक घरेलू महिला एक दिन में 16 से 18 घंटे काम करती है। जब महिला और पुरुष के बीच मजदूरी देने की बात आती है, तो सामान्यत: महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी मिलती है। 8 मार्च को पूरी दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है और 15 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय  ग्रामीण महिला दिवस। 15 अक्टूबर 2008 से संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं की भूमिका को अलग से रेखांकित करने के लिए यह दिवस मनाया जाता है। हमारे देश के ग्रामीण समाज में 90 प्रतिशत महिलाएं खेती पर निर्भर है। असंगठित क्षेत्र में 98 प्रतिशत महिलाएं काम करती है। यूं तो क्या शहर, क्या गांव सभी जगह महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी और सुरक्षित नहीं है। जहां कहीं भी महिलाएं अर्थिक और सामाजिक रूप से सुरक्षित और मजबूत नहीं है, वह चाहे घर हो, परिवार हो, समाज हो या देश में सभी जगह महिलाएं शोषण का शिकार है। महिलाओं की सुरक्षा और अधिकार हमारी सोच, हमारी शिक्षा और हमारी सामाजिक व्यवस्था पर निर्भर है। अंतर्राष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस के उद्देश्यों में कृषि और ग्रामीण विकास, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण गरीबी उन्मूलन में ग्रामीण महिलाओं के योगदान को रेखांकित करके उन्हें जागरूक बनाकर आत्मनिर्भर बनाया है।

सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने एक जगह लिखा है कि यदि आप महिलाओं के हक में कोई क्रांतिकारी कदम उठाना चाहते हैं, तो उसके चूल्हे चौके को जमीन से उपर उठाकर प्लेटफार्म पर ला दो ताकि उसकी कमर सीधी हो सके। भारत सरकार ने उज्जवला योजना के जरिये 1 मई 2016 से घरेलू गैस कनेक्शन और चूल्हे दिये हंै। इस योजना के कारण बहुत सी महिलाएं अब कमर सीधी करके, खड़े होकर खाना बनाने लगी है। सरकार द्वारा उज्जवला योजना के तहत  8 करोड़ महिलाओं को गैस कनेक्शन बांटा जा चुका है। एएसईआर की रिपोर्ट के अनुसार, 6 से 14 साल की स्कूली लड़कियों का ड्राप आउट 4 प्रतिशत है। महिलाओं के हक की लड़ाई में सबसे बड़ा हथियार है शिक्षा। यदि हम प्रायमरी शिक्षा से लेकर उच्च स्तर की शिक्षा के आंकड़ों को देखें ंतो सबसे ज्यादा ड्राप आउट लड़कियों का है।

अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस के अवसर पर सुप्रीम कोर्ट ने बहू के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत बहू को अपने पति के माता-पिता के घर में रहने का अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि पति की अलग-अलग संपत्ति में ही नहीं, बल्कि साझा घर में भी बेटी का अधिकार है।

इससे पहले दिसंबर 2016 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने बहुओं का सास-ससुर की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है, कहा था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि किसी महिला के निवास करने का अधिकार सिर्फ उसके पति के मामले में बाध्यकारी होगा, वह अपने सास-ससुर द्वारा अधिकृत संपत्ति में कोई अधिकार नहीं रखती है। इस मामले में एक महिला द्वारा निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में यह दावा करते हुए अपील की गई कि बहु होने के नाते उसके पास अपने प्रतिपक्षी के घर में घुसने का कानूनी अधिकार है। निचली अदालत ने कहा था कि पत्नी का निवास पाने का अधिकार सिर्फ उसके पति के संबंध में है। जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने तरुण बत्रा मामले में दो न्यायाधीशों की पीठ के फैसले को पलट दिया है। तरुण बत्रा मामले में दो जजों की बेंच ने कहा था कि कानून में बेटियां, अपने पति के माता-पिता के स्वामित्व वाली संपत्ति में नहीं रह सकती हैं। अब तीन सदस्यीय पीठ ने तरुण बत्रा के फैसले को पलटते हुए पूर्व फैसले के संबंध में बहुत से सवालों के जवाब दिए हैं।

हमारे समाज में तेजी से संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। एकल परिवारों का चलन बढ़ा है। बेटे-बेटियां अच्छी लाईफ स्टाईल, अच्छे रोजगार की तलाश में अपने गांवों, कस्बों, छोटे शहरों से बड़े शहरों की ओर शिफ्ट हो रहे हैं। बड़े शहरों की बड़ी-बड़ी बहुमंजिला मकानों और नई पीढ़ी दोनों ही के पास स्पेस की कमी है। घर के बड़े बुजुर्ग, भाई-बहन साथ नहीं है। ऐसे समय में एकाकी जीवन जी रहे लोगों के बीच उस तरह का प्रेमभाव, स्नेह नहीं रह पाता जो सामान्यत: संयुक्त परिवारों में दिखाई देता है। ऐसी महिलाएं जो आर्थिक रुप से ज्यादा सक्षम नहीं है, बहुत ही मजबूरी में अपने ससुराल से जाकर रहना पसंद करती हैं। पति की अनुपस्थिति में उस महिला को पति के घर में यानी ससुराल में किस तरह से रखा जाता है, ये ससुराल वालों की मानसिकता और आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है। पिछले एक दशक में हजार में से 13 लोगों का तलाक भारत में होता है।

कानूनी दृष्टि से यदि देखा जाये तो मकान, ज़मीन आदि अचल संपत्तियां जिस किसी के नाम पंजीकृत है, उसी के स्वामित्व में होती हैं। पिता की संपत्ति पिता की है और माता की संपत्ति माता की। जब तक माता-पिता जीवित हैं, उनकी संपत्ति पर किसी का कोई अधिकार नहीं होता है। पुत्र को वयस्क अर्थात् 18 वर्ष का होने तक तथा पुत्री को उसके विवाहित होने तक मात्र भरण-पोषण का अधिकार होता है। यदि माता या पिता परिवार के या परिवार के बाहर के किसी सदस्य के नाम वसीयत कर देते हैं, तो उनके देहान्त के उपरान्त, संपत्ति उसकी हो जाती है, जिसके नाम वसीयत की गई है। यदि माता-पिता किसी के भी नाम वसीयत नहीं करते हैं और अपनी संपत्ति अपने ही नाम छोड़ देते हैं, तो उस संपत्ति पर उनके सभी उत्तराधिकारियों का समान अधिकार होता है।

हिन्दुओं में उत्तराधिकार की स्थिति की बात की जाए तो किसी हिंदू पुरुष की मृत्यु होने पर उसकी संपत्ति उसकी विधवा, बच्चों (लड़के तथा लड़कियों) तथा माँ (यदि जीवित है) के बीच बराबर बांटी जाती है। यदि उसके किसी पुत्र की उससे पहले मृत्यु हो गई हो तो बेटे की विधवा तथा बच्चों को संपत्ति का एक हिस्सा मिलेगा।

6 साल पहले दिल्ली की कोर्ट ने एक महिला को ससुर के मकान में रहने का अधिकार देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि सास-ससुर की संपत्ति पर बहू का कोई हक नहीं है। दरअसल, घरेलू हिंसा के मामले में महिला कोर्ट ने सास-ससुर की संपत्ति को साझा मानकर आवेदक (महिला) को उसमें रहने का अधिकार दिया था। इस पर उसके सास-ससुर ने अपील की। उन्होंने बहू पर अत्याचार और दहेज प्रताडऩा के आरोपों का खंडन करते हुए दावा किया कि संपत्ति पर बेटे का कोई हक नहीं है। इस फैसले के बाद अब सास- ससुर को भी समझना पड़ेगा की सास भी कभी बहु थी और बहु भी कभी सास बनेगी। दोनों को अपनी आपसी समझ और जरूरत के अनुसार एक दूसरे के प्रति सम्मान और आदर भाव रखकर जीने की आदत डालनी होगी। वरना एक ही मकान में परंपरागत रूप से होने वाले सास-बहु के झगड़े सुनाई देते रहेंगे।