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कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः अपने आप जगी छवि-सा जीवन

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः अपने आप जगी छवि-सा जीवन


जीवन के सब रूप

आपस में घुले-मिले

देश-काल पर निर्भर

तरह-तरह के प्रभु

कैसे आ गये बीच में ऊपर-नीचे

कुछ आँखें खोले और कुछ मींचे


जब से जीवन की खुली आँख

उसी की साख जगत में

तरह-तरह का जीवन

वन-उपवन में जागी छवि-सा


सब एक-दूसरे के हैं पालनहार

सुख-दुख में भागीदार

बसा हुआ है सब में

सबका घरबार


कोई नहीं है जग का ठेकेदार

बनाये जो सबको लाचार

कोई क्यों ढोये उस शासन का भार


चलता है अपने अनुशासन से 

फूलता-फलता जीवन

अपने पाँवों पर खड़े वृक्ष-सा 

बीती हुई सदी-सा

बहती हुई नदी-सा