breaking news New

पुलिस का खुल्लमखुल्ला राजनैतिकीकरण, संप्रदायीकरण और हिंसक होना नागरिकों के लिए एक बड़ा ख़तरा है

पुलिस का खुल्लमखुल्ला राजनैतिकीकरण, संप्रदायीकरण और हिंसक होना नागरिकों के लिए एक बड़ा ख़तरा है

अशोक वाजपेयी

लगता है जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को नष्ट किये बिना भाजपा-संघ परिवार मानेगा नहीं. उसके परिसर में लगभग सौ नकाबपोश लोग हाथ में लाठियां आदि लिये हुए घुस गये और उन्होंने छात्रों-अध्यापकों पर हमला किया. हॉस्टल में घुस गये और घंटो हंगामा करते रहे पर दिल्ली पुलिस को पहले तो इतनी बड़ी संख्या में नकाबपोशों के जाने की ख़बर नहीं लगी और जब लग भी गयी तो उसने कुछ नहीं किया. लाचार या मुदित मन देखती रही. यह देश की राजधानी की पुलिस का हाल है तो फिर उत्तर प्रदेश में पुलिस की लगातार बर्बरता तो लगभग अपरिहार्य लगती है. पुलिस का यह खुल्लमखुल्ला राजनैतिकीकरण, संप्रदायीकरण और हिंसक होना संविधान और उसके द्वारा स्थापित राज्य में नागरिकों के लिए एक बड़ा ख़तरा बनकर उभर चुका है. केंद्रीय मंत्रियों ने इस हमले की निंदा की है, पुलिस से रिपोर्ट मांगी है. किसी को यह भरोसा नहीं है कि पुलिस को उसकी चूक के लिए दंडित किया जायेगा. पुलिस नागरिकों को सुरक्षा नहीं उन पर हिंसक हमलों को बढ़ावा दे रही है. यह बहुत ख़तरनाक वृत्ति है.

हिंसा को सत्ता ने इस समय अभिव्यक्ति और सामाजिक कर्म का अनिवार्य संस्करण मानकर एक तरह की वैधता ही दे दी है. ज्ञान, बुद्धि, सृजन, इनकी बहुविध अभिव्यक्तियां और इनकी लोकतांत्रिक स्वायत्तता और स्वतंत्रता, लगभग शुरू से ही, निशाने पर हैं. अगर ज्ञान और सृजन से शत्रुता का यह ज्वार थमा नहीं तो हम एक बेहद ज्ञानवंचित, सृजनक्षीण समाज बनकर रह जायेंगे. युवाओं को इसका अहसास हो चुका है और वे तरह-तरह से इसका प्रतिरोध कर रहे हैं. उन्हें किसी राजनैतिक दल के उकसावे पर ऐसा करने के लिए सक्रिय मानकर सत्ताधारियों को कुछ राजनैतिक लाभ या संतोष भले मिलता हो इस सचाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज का क्षुब्ध युवा स्वतंत्रता-समता-न्याय की संवैधानिक मूल्य-व्यवस्था को बचाने और स्थापित करने के लिए प्रतिरोध की राह पर है. यह तो नहीं हो सकता कि सत्ताधारियों को इसकी ख़बर नहीं है. पर गर्वोन्नत अकसर उसी को देखता-पोसता है जो उसके गर्व को पुष्ट और सबल करे. जो उससे बाहर है उसे अनदेखा-अनसुना करता है. विडंबना यह है कि यह अनदेखा-अनसुना इस उपेक्षा से कम सच या झूठ नहीं हो जाता.

गांधी के 150 वर्ष पूरे होने के बाद आज भारतीय समाज में समरसता बढ़ने के बजाय विभाजन की वृत्तियां अधिक सक्रिय हो गयी हैं. प्रेम, सद्भाव और सहिष्णुता के बजाय घृणा, भय, अविश्वास आदि व्यापक हो रहे हैं. मित्रता बढ़ने के बजाय शत्रुता बढ़ रही है. हम जाने-अनजाने कगार पर खड़े हैं.

रघुवीर-प्रसंग

दिसंबर महीना हिंदी साहित्यकार रघुवीर सहाय के जीवन में अलग महत्व रखता है. इसी महीने उनका जन्म हुआ, विवाह हुआ और मृत्यु हुई. याद आता है कि अपनी मृत्यु के समय वे राम जन्मभूमि आंदोलन के सिलसिले में हुई हिंसा के दौरान हिंदी मीडिया की निंदनीय भूमिका पर प्रेस कौंसिल के लिए एक रिपोर्ट लिख रहे थे. वे आज होते तो शायद देश भर में व्याप्त घृणा-भेदभाव-हिंसा-हत्या-बलात्कार-बर्बरता के सिलसिले में हिंदी मीडिया के संपूर्ण समर्पण और भक्ति पर रिपोर्ट लिख रहे होते. बहुत सारे सच तो तब छोटे थे अब बढ़कर भीमकाय और विकराल हो गये हैं. एक सजग संवेदनशील लेखक उन्हें दर्ज़ ही कर सकता है.

रघुवीर सहाय की एक पंक्ति है- ‘इस दुख को रोज़ समझना क्यों पड़ता है?’ उनकी कविता, एक तरह से, दुख को रोज़ समझने की कोशिश से उपजती थी. यह दुख ‘हर दिन मनुष्य से एक दर्जा नीचे रहने के दर्द से लेकर ग़ैरबराबरी, रोज़ की ज़िंदगी में बच्चों-स्त्रियों-ग़रीबों आदि पर हो रहे अत्याचारों और अन्याय पर तीख़ी नज़र रखने से उभरता और दर्ज होता था. रघुवीर सहाय का नागरिक अन्तःकरण ‘सबका सब जीवन’ लेने पर इसरार करता था. वह ‘कम से कम’ से सन्तुष्ट नहीं होता था. रघुवीर सहाय ने लोकतंत्र और सत्ता की क्रूरताएं, विडम्बनाएँ बहुत त्रासद ढंग से देखी-पहचानीं. पर उनकी कविता सिर्फ़ सामाजिक यथार्थ से आक्रांत नहीं थी. उसमें प्रकृति और जीवन के प्रति गहरा चाव था और उच्छल ऐन्द्रियता भी. निपट गद्य से, पत्रकारिता से, राजनैतिक उक्तियों और वक्तव्यों से, सार्वजनिक मुद्राओं से उन्होंने कविता बनाने की अद्भुत चेष्टा की. वे विचारधाराओं के परम सत्यों के चंगुल में कभी नहीं फंसे. उनकी कविता राजनीति को प्रतिबिम्बित नहीं करती. रघुवीर सहाय ने अपनी कविता को राजनीति बनाया. यह उन्हें प्रतिरोध के खाते में तो रखता है पर वाम से उनकी दूरी भी स्पष्ट होती है. साधारण की महिमा रघुवीर सहाय के यहां साधारण की विडंबना में प्रगट होती है. यह आकस्मिक नहीं है कि उनके यहां व्यक्तिनाम पौराणिक-ऐतिहासिक या नायकों के नाम नहीं हैं- वे निपट साधारण नाम है रामदास, रमेश, मुसद्दीलाल आदि. यह भी कह सकते हैं कि वह साधारण को नाम देती कविता है.

मोटे तौर पर यह भी कहा जा सकता है कि रघुवीर सहाय एक समाजधर्मी लेखक थे जिनके लिए व्यक्ति की इयत्ता भी अनिवार्य थी. बरसों पहले जब उन्होंने ऐसी बोली पाने पर इसरार किया था कि जिसके दो अर्थ न हों, तो मैंने कविता के लिए अनेकार्थिता और अनेक अन्तर्ध्वनियों से सम्पन्न होने का हवाला देते हुए उसका विरोध किया था. पर हमारा समय ऐसा है जब सत्ता-बाज़ार-मीडिया-धर्म आदि, शुद्ध पाखण्ड से, अनेकार्थी मुहावरों में बात कर रहे हैं, हमें आज ऐसी बोली, निश्चय ही, चाहिये जिसके दो अर्थ न हो. जो, हमारे असली हिंसक इरादे को ढांप न सके.

अकबर पदमसी

1950 में जो दो युवा कलाकार पानी के जहाज से मार्सेई बन्दरगाह पर साथ-साथ उतरे वे थे सैयद हैदर रज़ा और अकबर पदमसी. दोनों तबके बंबई से फ्रांस कला-प्रशिक्षण के लिए गये थे. दोनों प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रूप के सदस्य थे और कला में भारतीय आधुनिकता के लिए नयी ज़मीन की तलाश में थे. दोनों ने फ्रेंच स्त्रियों से विवाह किया, दोनों फ्रांस में काफ़ी समय रहे, रज़ा अकबर से कहीं अधिक और दोनों भारत वापस आ गये. दोनों की भारतीय दर्शन और सौन्दर्यशास्त्र में गहरी दिलचस्पी थी. रज़ा की तुलना में अकबर तो उनके विशेषज्ञ ही हो गये थे क्योंकि उन्हें समझने-गुनने के लिए अकबर ने संस्कृत भी सीखी थी. दोनों का रंगों पर असाधारण अधिकार था और दोनों की कला का रुझान एक स्तर पर आध्यात्मिक भी था.

अकबर से मेरा सीधा परिचय तब हुआ जब उन्होंने मुक्तिबोध के कुछ व्यक्तिचित्र बनाये और फिर व्यक्तिचित्रों की एक श्रृंखला ही बना डाली. उनकी एक प्रदर्शनी हमने मप्र कला परिषद् के तत्वाधान में भोपाल में कलावीथिका में मुक्तिबोध समारोह के अन्तर्गत की थी. उसी में मणि कौल की फिल्म ‘सतह से उठता आदमी’ और मुक्तिबोध रचनावली का लोकार्पण हुआ था. उन से संपर्क बढ़ा दो फिल्मकार-मित्रों के कारण, मणि कौल और कुमार शहानी, जिनसे अकबर की भी घनिष्टता थी. उन दिनों मुम्बई जाने पर एक शाम इन तीनों में से किसी के घर ज़रूर बीतती थी.

जब भारत भवन बना तो हुसेन, रामकुमार, बाल छाबड़ा, कृष्ण खन्ना, मनजीत बाबा के साथ अकबर भी उस मंडली में थे जो जगदीश स्वामीनाथन की वहां ‘रूपंकर’ संग्रहालय के लिए कलाकृतियां चुनने आदि में मदद कर रही थी. स्वामी के साथ अकबर एक बार बस्तर भी गये थे, आदिवासी कला कृतियां चुनने के सिलसिले में. इसके बाद बीच-बीच में उनसे भेंट होती रही. अंतिम भेंट तब हुई जब वे दिल्ली पद्म भूषण प्राप्त करने आये थे. उनके कुछ छायाचित्रों का उपयोग पेगुइन द्वारा प्रकाशित अपने प्रेमकविता संचयन ‘यहां से वहां’ में करने की उनकी अनुमति भी मिली थी. उनके इन छायाचित्रों की एक प्रदर्शनी पेरिस में देखी थी. उनकी फ्रेंच पत्नी की बेटी रईसा से पेरिस में अकसर भेंट होती रही है जहां वे अपने फिल्मकार पति के साथ रहती हैं. उनको याद है कि उन के जन्म के समय पेरिस के एक अस्पताल में रज़ा भी मौजूद थे और उन्हें शिशु रूप में देखनेवाले पहले व्यक्ति थे.

6 जनवरी 2020 को अकबर पदमसी का देहावसान भारतीय कला-आधुनिकता के एक और मूर्धन्य का लोप होना है. वे 92 वर्ष के थे. उनकी कला में रंग और आकार, आवेग और संयम, ऐन्द्रियता और अध्यात्म के बीच दूरी कम से कम थी. उन्होंने दिगम्बराओं, लैंडस्केच, सिटीस्केप आदि से लेकर अमूर्त, मेटास्केप तक अनेक तरह के चित्र बनाये. उनमें से हरेक पर उनके अचूक कौशल, सावधानी और स्फूर्ति की छाप थी. वे एक सोचते-विचारते चित्रकार थे जिन्होंने अपना अद्वितीय कलासंसार और उतना ही अद्वितीय मुहावरा रचा. अब उनकी कला में और बहुतों की कृतज्ञ स्मृति में उनका उत्तरजीवन शुरू हुआ है. लंबा चलेगा इसमें संदेह नहीं.