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प्रबंध संपादक प्रफुल्ल पारे की कलम से-(देख दिनन को फेर)-जरा सामने तो आओ छलिए

 प्रबंध संपादक प्रफुल्ल पारे की कलम से-(देख दिनन को फेर)-जरा सामने तो आओ छलिए


आप सोशल मीडिया में एक वीडियो देख सकते हैं जिसमें यूपीएससी के कैंडिडेट का इंटरव्यू दिखाया जाता है और इंटरव्यू देने वाला हर कैंडिडेट यह कहता है कि वह आईएएस या आईपीएस इसलिए बनना चाहता है क्योंकि उसके मन में जन सेवा की प्रबल इच्छा है अब जब वह आईएएस बन जाता है तो उसके बाद जनसेवा तो दूर उसकी जन से ही दूरी बन जाती है।

इन दिनों करोना कॉल चल रहा है करोना संक्रमण की आड़ में बहुत सारे अफसर लोगों से मिलना ही नहीं चाहते जबकि वह जनसेवक हैं उन्हें मिलना तो चाहिए लेकिन उन्हें मिलने से परहेज है दो गज की दूरी से मिलने से भी परहेज है। अब आप देखिए कि सरकार अनलॉक की ओर बढ़ रही है सिनेमा हॉल खोल रही है सभाओं की अनुमति दी गई है। मंत्रिमंडल की बैठकों से लेकर चुनाव की सभा तक प्रदर्शन और विरोध की रैलियां भी आयोजित हो रही हैं। वहीं डरी-सहमी कौम की रहनुमाई करने वाले सरकारी अफसर करोना का बहाना बनाकर उनसे मिलने आने वाले लोगों से नहीं मिलने के सौ बहाने बना रहे हैं।

प्रदेश की राजधानी नायाब रायपुर में आधे-अधूरे निर्माण के बीच कुछ अधिकारियों की जिद के चलते 2012 से ही नई राजधानी में मंत्रालय और विभाग अध्यक्ष के कार्यालय और दूसरे कार्यालय ताबड़तोड़ तरीके से शिफ्ट कर दिया गए। रायपुर से नया रायपुर के बीच सार्वजनिक परिवहन की सुविधा आसान भी नहीं है और ऊपर से करोना का कहर तो ऐसे में लोगों का मंत्रालय और विभागाध्यक्ष कार्यालयों में जाना बंद सा हो गया है। यहां काम करने वाले कर्मचारी अधिकारी सरकारी बसों और वाहनों में सवार होकर एहसान करने के अंदाज में अपने अपने दफ्तर जाते हैं। करोना संक्रमण के दौर में वैसे ही छह महीने तक सरकारी दफ्तर बहुत कम खुले और फिर कुछ सरकारी दफ्तरों में करोना फैला और कुछ लोगों की मौत भी हुई। उसके बाद सरकार ने नियम बना दिया और एक रोस्टर लागू कर दिया जिसके तहत कर्मचारी-अधिकारी 7 दिन ड्यूटी करेंगे और 14 दिन क्वरांटीन में रहेंगे लेकिन यह 14 दिन क्वारेंटीन के नहीं बल्कि छुट्टियों के दिन हो गए। इस दौरान कई सरकारी कर्मचारी-अधिकारी इधर उधर घूमते फिरते पाए गए और जिन्हें सरकारी दफ्तरों में काम था वह भटकते रहे अब अफसरों ने अपनी सुविधा के लिए यह आदेश भी पारित करवा लिया कि उनकी बिना अनुमति के कोई भी व्यक्ति मंत्रालय या एचओडी कार्यालय में नहीं आ सकेगा बाकी सारे आदेश अनलॉक की प्रक्रिया के चलते हैं, समाप्त हो गए लेकिन मंत्रालय और विभागाध्यक्ष के कार्यालय में यह आदेश अभी भी जारी है। दरअसल, हमारा सरकारी महकमा और ब्यूरोक्रेसी इतनी बदनाम हो गई है कि उसका बस चले तो वह किसी से भी ना मिले क्योंकि उसे लगता है कि उनकी जवाबदेही सिर्फ अफसरों मंत्रियों और उन लोगों के प्रति है जिनसे उन्हें नुकसान या फायदा हो सकता है।

कुल मिलाकर मतलब यह है कि आप इतनी दूर मंत्रालय या नया रायपुर के किसी भी कार्यालय में ना जाएं क्योंकि वहां से कोई नहीं मिलेगा और इसलिए नहीं मिलेगा क्योंकि करो ना चल रहा है और करोना के साथ-साथ सब कुछ चल रहा है। धरना, रैली, प्रदर्शन, चुनावी सभाएं, सिनेमा हॉल, मॉल, हवाई जहाज, रेलगाड़ी सब चल रहे हैं बस सरकारी महकमों से दूरी बनाए रखें या फिर आप चाहें तो पुरानी फिल्म का यह गाना भी गुनगुना ले जरा सामने तो आओ छलिए छुप छुप छलने में क्या राज है.....।

यह तारीफ है या तंज
कभी भाजपा के कद्दावर नेता रहे दिलीप सिंह जूदेव के पुत्र युद्धवीर सिंह जूदेव ने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णु देव साय को मरवाही विधानसभा से चुनाव लड़वाने की सलाह पार्टी को दे डाली उन्होंने कहा, कि मरवाही में विष्णु देव साय मैदान में उतरेंगे तो पार्टी को फायदा होगा। विष्णु देव भी युद्धवीर सिंह का तंज समझ गए और उन्होंने भी कह दिया कि युद्धवीर सिंह मेरे शुभचिंतक हैं और मेरे लिए अच्छा सोचते हैं। वैसे आपको पता होगा कि भाजपा में नंदकुमार साय के शुभचिंतकों ने 2003 में मरवाही से उनको चुनाव लड़ा दिया था। अजीत जोगी के खिलाफ और फायदा कितना हुआ यह सबको मालूम है। शायद अपने वरिष्ठ साय की दुर्गति से विष्णुदेव साय सबक ले चुके हैं इसलिए उन्होंने पूरी विनम्रता से युद्धवीर के प्रस्ताव को नकार दिया।

फिर बिफरे बाबा
छत्तीसगढ़ में लेमरू प्रोजेक्ट एक हाथी अभयारण्य है जो कि सरगुजा में है। अब राज्य की सरकार इसका विस्तार करने जा रही है और इस हाथी अभ्यारण्य में आसपास के 30 गांवों को शामिल किया जाना है और वन विभाग के अधिकारी 1 ग्राम में ग्रामीणों की सहमति लेने का काम कर रहे हैं। कल सरगुजा के पूर्व महाराजा और वर्तमान सरकार के मंत्री टीएस सहदेव वहां पहुंचे और उन्होंने ग्रामीणों से साफ-साफ कहा कि वह इस लेमरू हाथी अभ्यारण्य के विस्तार का समर्थन नहीं करते उन्होंने ग्रामीणों से कहा कि अगर अधिकारी या कर्मचारी आपके पास आते हैं और इस अभ्यारण्य में शामिल होने के लिए कहते हैं तो आप अपने मन से फैसला कीजिए। ग्रामसभा में विचार कीजिए केवल यह सोचकर इस परियोजना में शामिल नहीं होना है कि टीएस सिंह देव के अधिकारी हैं। उन्होंने एक मजेदार बात कही कि अब राजा महाराजा का दौर चला गया है अब ऐसा नहीं है कि राजा जो चाहे वह कर ले अब राजा जानता है और फैसला उसी को करना है। सिंहदेव के इस तेवर को देखकर अंदाज बहुत आसानी से लगाया जा सकता है छत्तीसगढ़ की राजनीति में आने वाले समय में कोई ना कोई भूचाल जरूर आएगा क्योंकि इसके पहले भी वे राज्य सरकार की नीतियों के खिलाफ अपनी नाराजगी जता चुके हैं। उनका यह कहना कि राजा महाराजा जैसे काम नहीं होगा किसकी ओर इंगित करता है कहीं वे अपनी ही सरकार के मुखिया को निशाना तो नहीं बना रहे हैं। टीएस सिंहदेव की बढ़ती नाराजगी आने वाले दिनों में बड़ी घटना का रूप ना ले लें।