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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र बता रहे हैं कि- ये चॉकलेट कहीं नागरिकों को भारी न पड़ जाए

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र बता रहे हैं कि- ये चॉकलेट कहीं नागरिकों को भारी न पड़ जाए

दो महिने से अधिक के चार बार के लॉगडाउन में घर में सेफ और सुरक्षित बैठे लोगों को पांचवें दौर में अनलॉक वन को लेकर परेशानी है की कहीं यह कोरोना का वायरस उन तक न पहुँच जाए। यह आशंका कोरोना के बढ़ते मरीजों को देखते हुए स्वाभाविक भी लगती है। मोदी जी ने मन की बात की 65 वीं कड़ी में पूरी तरह से बता दिया है कि कोरोना की वैक्सीन के लिए दुनिया की नजऱ भारत पर है। परन्तु इसका मतलब यह नहीं की फि़लहाल सावधानी बरतना छोड़ दें, क्योंकि कोरोना कहीं नहीं गया। कोरोना मरीजों की तेजी से बढ़ती हुई संख्या भी हमें रोज सुबह अहसास कराती है, तुम यहीं कहीं हो।

तस्लीम फज़़ली की लिखी और मेहदी हसन साहब की गाई गज़़ल कोरोना के बढ़ते प्रभाव और अनलॉक एक के साथ खुलते हुए बाजारों में उमड़ती भीड़ को देखकर याद आ गई। जब हमारे देश के प्रधानमंत्री अपने मन की बात सुनाते हुए कह रहे हैं की कोरोना के खिलाफ लड़ाई का रास्ता लंबा है। अब हमें कोरोना के साथ जीना सीखना होगा। कोरोना को हमें इसी गज़़ल की तरह याद रखने की जरूरत है।

'रफ्ता रफ्ता वो मेरे हस्ती का सामां हो गये
पहले जां, फिर जानेजां, फिर जानेजाना हो गये
दिन-ब-दिन बढ़ती गईं इस हुस्न की रानाइयां
पहले गुल, फिर गुल-बदन, फिर गुल-बदामां हो गएÓ।

मोदी जी मन की बात सुनकर पता चला की कोरेना के खिलाफ़ लड़ाई का रास्ता लंबा है। अभी इसका कोई इलाज नहीं है। उन्होने देशवासियों को अपने मन की सुनाते हुए कहा है कि आने वाले समय में और गंभीरता के साथ सतर्कता बरतने की ज़रूरत है। हमारे देश का योग कम्युनिटी, इम्युनिटी और यूनिटी सबके लिए अच्छा है। उन्हे अफसोस है की अगर गाँव-क़स्बे आत्म निर्भर होते तो आज यह हालात नहीं होते। गांव वालों को चाहिए था की वे आत्मनिर्भरता की ओर अपने कदम बढ़ाते। 'खैर देर आये दुरूस्त आये Ó की तर्ज पर गांव वालों ने पैदल ही क्यों ना सही अपने कदम शहरों से गांव की ओर आत्मनिर्भरता और लोकल से ग्लोबल होने बढ़ा तो दिया हैं। देश के संवेदनशील प्रधानमंत्री मोदीजी को देर से ही सही अपने मन की बात में यह याद आया कि लॉकडाउन में देश के श्रमिक-मज़दूर सबसे ज़्यादा परेशान हुए हैं, उनकी परेशानियों को हम अनुभव कर रहे हैं। देश के प्रधानमंत्री का यह अनुभव करना ही अपने आप में बहुत बड़ी बात है। अनलॉक वन में दी गई छूट और उसके बाद तेजी से फैलते कोरोना संक्रमण के खतरे को देखकर लगता है की कहीं भविष्य में हेल्थ इमरजेंसी की स्थिति तो निर्मित नहीं कर देगा? लोगो को घरों में सुरक्षित रखने के उद्धेश्य से लॉगडाऊन को तोड़ कर प्रवासी मजदूर का निकलना, विपक्ष की चिल्ला चोट तथा आर्थिक मोर्चे सहित व्यवस्था के मोर्चे पर असफलता के कारण बौखलाहट में कहीं सब कुछ खोलने की जवाबदेही राज्यों पर तो नहीं छोड़ी गई है। ये भविष्य के लिए चेतावनी और नसीहत तो नहीं है।

आत्मनिर्भरता का यह कदम पता नहीं हमें कहां ले जायेगा। हमें किसी अनुशासन पर्व की जरूरत नहीं है।
अब धीरे-धीरे देश की जनता को यह समझ में आने लगा है कि हाल-फिलहाल तो कोरोना इस देश से नहीं जाने वाला है। जब उपचार की दवा या वैक्सिन नहीं बनती हैं, लोगों को कोरोना के साथ रहने की आदत डालनी है। सरकार की यदि सचमुच कुछ करने की इच्छा है तो इतना करे कि क्वारेंटाइन में रखे जाने वाले मरीजों या संभावित मरीजों को उचित सुविधाएं दें। जिस तरह की उपेक्षा, अवहेलना और असुविधाओं के बीच संदिग्ध मरीजों को रखा जाता है, और कैदियों जैसा व्यवहार होता है, वह किसी भी व्यक्ति के लिए असहाय होगा। ऐसी ही उपेक्षा और असुविधाओं के कारण मरीज भाग जाते हैं। जिन्हें भगौड़े कैदियों की भांति पकड़ा और प्रचारित किया जाता है। संवेदनशील प्रशासन का दम भरने वाले अफसरों की नाक के नीचे यह सब होता है, और वे उस समय वारियर्स के तमगे बटोरने या पुष्प वर्षा में नहाने में व्यस्त रहते हैं। 14 दिन या 18 दिन के क्वारेंटाईन के बाद मरीज की रिपोर्ट नेगेटिव आती है तो उसे नया डर सताता है कि क्वारेंटाइन में रहने वाले दूसरे मरीजों से उसे कोरोना न हो गया हो। यानी यह दौर भय, आशंका और अविश्वास का है। यही कारण है कि सामान्य सिरदर्द या बुखार होने पर भी व्यक्ति घबराने लगता है कि कहीं कोरोना न हो गया हो। डिप्रेशन और भय से लोग मनोवैज्ञानिक बीमारियों का शिकार होने लगे हैं। अब हर व्यक्ति तो मनोचिकित्सक के पास नहीं जा सकता है। कोरोना की भांति अब कोरोना के भय के मरीज भी बढऩे लगे हैं। फिर क्वारेंटाइन से लौटे लोगों के बुरे अनुभव सुनकर एक नया डर और सिर चढ़ जाता है। पहले क्वारेंटाइन या आइसोलेशन की स्थिति सुधारनी होगी। वहां मरीजों के लिए सुविधा और संवेदनशील व्यक्तियों द्वारा देखभाल की स्थिति सुधारनी होगी। कोरोना व्यक्ति का चयन करता है, और ये कब घटित हो जाएगा, कोई नहीं जानता है। बहुत संभव है कि अभी भी बहुत से कोरोना संक्रमित संवाहक की भांति घूम रहे हो। मरीज को क्वारेंटाइन यातनागृह की भांति नहीं, उपचार गृह की भांति लगना चाहिए।

बच्चों की जिद के आगे कई बार माता-पिता को उनकी मांग पूरी करनी पड़ती है। फिर मौका देखकर जिद की वजह से उपजी स्थितियों को देखकर बच्चों से उनकी बहुत सारी चीज़ें भी छीननी पड़ती हैं। बच्चों के लिए यह समय बहुत संकट का है। बच्चों के लिए प्राय: एक व्यवस्था बनाई जाती है। लेकिन शुरूआत में उसे रोते हुए चुप कराने के लिए, बहलाने-फुसलाने के लिए चॉकलेट दी जाती है। यह जानते हुए भी कि चॉकलेट बच्चों के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है। बच्चों को क्रीम, चॉकलेट की आदत हो जाती है, तो उसे डांट-डपटा जाता है। उससे चॉकलेट छुपाई जारी है, लेकिन बच्चा जिद करता है, मचल जाता है, तब विवशता की बात कहकर माता-पिता बच्चे को चॉकलेट दे देते हैं। यहां बच्चे की मांग पूरी नहीं की जा रही है। बच्चे के लिए बनाई गई व्यवस्था में खुद को विवश बताकर सब कुछ बच्चे की जिद के हवाले हो जाता है। गोया उसे जो लत लगाई गई थी, उसमें बच्चे का दोष हो या फिर बच्चे का जो अधिकार है, वह उसका अपराध हो। बातों से मिल रही चॉकलेट बच्चे के लिए उसका अधिकार बन जाती है। बुरी बात होती तो शुरू से ही मना कर दिया जाता। बच्चे जिसे अपना अधिकार समझाने लगते हैं ठीक उसी समय वह अपराध बोध से दबे माता-पिता का उपकार भाव हो जाता है कि अच्छा खा लो, हालांकि चॉकलेट बुरी चीज है, लेकिन तुम्हारी जिद के आगे हम लाचार हैं।

माता-पिता घर में जो व्यवस्था बनाते हैं, यह उस व्यवस्था का चरित्र है। अधिकार की रक्षा न हो पाए तो अधिकार मांग रहे व्यक्ति को ही दोषी करार दे दिया जाए कि बच्चे नहीं माने इसलिए हमने बच्चों को इसकी छूट दी थी। बच्चों के अधिकारों की रक्षा हो सके यह व्यवस्था मां-बाप के पास होनी चाहिए। बच्चे की आदतों, मांग आदि की वैकल्पिक व्यवस्था किए बगैर बच्चे पर पाबंदी नहीं लगाए जा सकती है, और पाबंदी लगा भी दी जाए तो यह उलाहना व्यवस्था अपने पास सुरक्षित न रखें कि बच्चे की जिद के आगे हम लाचार थे। दोष बच्चे का है या माता-पिता की व्यवस्था का। चरित्र इच्छानुसार और खुद की सुविधानुसार बदलता रहता है। व्यवस्था सारे निर्णय अपने पास रखना चाहती है और दोष अबोध बच्चों के सिर पर डालना चाहती है कि इनकी मांग और सुविधा के आगे हम विवश थे। किसी भी व्यवस्था में अधिकारों या दैनिक जीवन की जरूरतों की पूर्ति के विकल्प के बगैर कोई पाबंदी नहीं लगाई जाती है और यदि इसके ठीक उलट पाबंदी हटाई जाती है तब भी सारे वैकल्पिक साधनों पर विचार करके ही किया गया है। उसके लिए अबोध प्राणियों पर लाचारी के नाम पर अपराध-बोध नहीं लादा जा सकता है।