breaking news New

जरा इस दशा पर भी सोचें

जरा इस दशा पर भी सोचें

ध्रुव शुक्ल

आजकल के काँग्रेसी नेताओं के वक्तव्य सुनकर लगता ही नहीं कि इस दल में महात्मा गांधी और नेहरू जैसे विचारवान और कर्मवान विश्व नेता हुए हैं। बहुत-से काँग्रेसियों ने गांधी जी की आत्मकथा और हिंदस्वराज्य पुस्तक शायद ही पढ़ी हो।  नेहरू की लिखी- विश्व इतिहास की झलक और हिंदुस्तान की कहानी भी नहीं पढ़ी होगी । अगर पढ़ीं होती तो उनके विचारों और कर्म पर इन किताबों की छाया दिखती।

यही हाल भारतीय संस्कृति का राग अलापने वाली भाजपा के नेताओं का है। उनमें अनेकों ने शायद ही महाभारत और रामायण को आत्मभाव से परखा हो। वे तो महाभारत और रामायण सीरियल देखकर ही देश का इतिहास जानते हैं और अपनी सत्ता पर मुग्ध रहते हैं।

अंबेडकर जी ने महात्मा बुध्द का मार्ग अपनाकर उसे दलितों के उद्धार से जोड़ा। पर आज चल रही बहुजन की राजनीति पर उसका कोई प्रभाव नहीं दीखता। दलितों के दुख जहाँ के तहाँ हैं।

समाजवाद की रघुकुल रीत का पाठ पढ़ाने वाले  विचारक और नेता राम मनोहर लोहिया का शायद ही कोई पाठ समाजवादियों को याद रह गया हो। वे कहते थे कि धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति केवल तात्कालिक धर्म है। और भारत में धर्म की प्रतिष्ठा जीवन में ऋतुकाल की उन्नति से कही गयी है,  राज्य सत्ता का लोभ इस ऋत में बसे धर्म का विनाश करता है। गांधी जी के बाद किसी नेता ने देश के सत्ताकामी राजनीतिक दलों को इस धर्म की याद ही नहीं दिलायी।

विचारधारा का दावा करने वाले बेचारे वामपंथियों की वैश्विक दुर्गति हो चुकी है। वे अब ढूँढे नहीं मिलते। अपनी निराली कालोनियों में बैठकर घिसे-पिटे बयान जारी करके अपने होने का अदृश्य प्रमाण दिया करते हैं। उनके लिए यह कहावत कितनी सटीक है कि काँख भी ढँकी रहे और मुट्ठी भी तनी रहे।

अपने छिछले बयानों से व्यर्थ ही प्रसिध्दि के भ्रम में डूबे विचारशून्य और अकर्मण्य नेताओं से हम कैसे लोकतंत्र को बचाये रखने की उम्मीद करें। आज राजनीति लोकहितकारी विचार से नहीं, सत्ता का सुख भोगने के कामन मिनिमम प्रोगाम से चल रही है और देश के कामन पीपुल को उसके हाल पर छोड़ दिया गया है। 

अब बचे बौद्धिक जन, जो अपनी छोटी-सी जमात में अपने टफ इंटलेक्ट का प्रदर्शन करके ही संतुष्ट हैं। उनसे मास अपील की उम्मीद करना व्यर्थ है। वे पहले सेमीनारी थे, वेवीनारी हैं। अपनी हालत पर विचार किए बिना कुछ तो यह भी कहने लगे हैं कि जनता ही ठीक नहीं ।अब इनके लिए इनके मन की जनता कोई कैसे और कहाँ से लाये।