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तुलसी जयंती: युग द्रष्टा तुलसी कभी भी अप्रासंगिक नहीं हो सकते - बलदाऊ राम साहू

तुलसी जयंती: युग द्रष्टा तुलसी कभी भी अप्रासंगिक नहीं हो सकते - बलदाऊ राम साहू

बलदाऊ राम साहू

साहित्य समाज का दर्पण होता है और साहित्यकार समाज का पथ प्रदर्शक। प्रत्येक काल में रचनाकारों ने अपने युग को गाया है। चाहे वह युग का कलुष हो या स्वर्णिम पल। रचनाकार जो देखता है, वही कहता है। कहने का तरीका भिन्न हो सकता है। कोई कहानी में कहता है तो कोई गीत में। साहित्य की जितनी विधाएँ हैं, ये तो केवल भाव प्रकटीकरण का माध्यम है।

तुलसी युग की चेतना थे। चेतन पुरुष सदैव युग को दिशा देता है। भारत में अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से मानव समाज को ऊपर उठाने का प्रयास किया उनमें गोस्वामी तुलसीदास जी भी एक हैं। भक्तिकाल के अनेक कवि है, जिनका नाम हम सम्मानपूर्वक लेते हैं। भक्तिकाल में काव्य की दो धारा प्रवाहित हुई है- 1. सगुण 2. निर्गुण।

सगुन काव्य धारा में तुलसी को अतिरिक्त नाभादास और स्वामी अग्रदास का नाम उल्लेखनीय है, जबकि निर्गुण काव्य धारा में कबीर के अतिरिक्त रामानंद, नामदेव, मलिक मुहम्मद, जायसी, कुतुबन, मुल्लादाउद के नाम आते हैं।

तुलसी सगुण काव्य धारा के कवि होते हुए भी वे समन्वयवादी थे, उन्होंने सगुण और निर्गुण भक्ति धारा में भेद नहीं किया और उन्होंने कहा-

‘‘सगुनहिं अगुनहिं नहि कुछु भेदा।

गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा।।’’

तुलसी संप्रदायिक प्रवक्ता नहीं थे। वे किसी संप्रदाय विशेष का प्रतिपादन व संस्थापन नहीं किया। तुलसी के ब्रह्म तो सगुण सकार भी है और निर्गुण निराकार भी। परमात्मा राम को उन्होंने सर्वगत माना। उन्होंने ईश्वर और जीव के स्वरूप, परस्पर संबंध और माया और ब्रह्म आदि विषयों पर अपना पक्ष सप्रमाण रखा। तुलसी को सच्चिदानंद ब्रह्म स्वीकार है। उनके काव्यों में दर्शन की विविधता है। उन्होंने राम के ब्रह्म स्वरूप का निर्धारण आध्यात्मिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते नहीं हुए किया। बल्कि चेतन समाज की स्थापना के लिए आधार बनाया और प्रेम की प्रतिष्ठा की। उन्होंने  कहा-

‘‘अगुन अलेप अमान एकरस।

राम सगुन भये, भगत प्रेमरस।।’’

तो वहीं पर यह भी कहा कि-  

‘‘अगुन अखंड अनंत अनादी।

जेहि चिन्तहिं परमारथवादी।।’’

‘‘नेतिनेति जेहि वेद निरूपा।

चिदानंद निरूपाधि अनूपा।।’’

तुलसी का दार्शनिक पक्ष विराट है और उसे छोटे-आलेख में, कम शब्दों में कहना अपनी मुर्खता को व्यक्त करना है। तुलसीदास के काव्यों के कई पक्ष है। भक्ति कालीन कवियों में कबीर और तुलसी दो स्तंभ हैं। कबीर ने समाज में व्याप्त विसंगतियों पर सीधा प्रहार किया। उन्होंने जो देखा उसे वैसा ही बिना किसी राग-द्वेष के कह दिया। किसी को नहीं छोड़ा। अच्छा है तो अच्छा है और बुरा है तो बुरा है। सबकी बखियाँ उधेड़ी और समाज को एक दिशा देने का प्रयास किया। उनकी कड़वी गोली से उस समय के तथाकथित विद्वत समाज व्यथित थे, किन्तु तुलसीदास ने वैसा नहीं किया। तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस के माध्यम से समाज को दिशा देने के प्रयास किया। तुलसीदास जी का जन्म उस समय हुआ जब सामंती व्यवस्था चरम पर थी। शासकों का आतंक था। प्रजा दुखी थी। शोषित और उपेक्षित प्रजा को कहीं आश्रय नहीं था। स्वार्थी तत्व पनपने लगे थे। शासकों की स्वेच्छाचारिता इतनी बढ़ गई थी कि आम जनता को कीड़े-मकोड़े मानकर शोषण किया जा रहा था। मुगलों और पठानों द्वारा राज्य के लिए भाई का भाई और पिता का पुत्र वध तक कर दे रहा था। धर्म परिवर्तन के लिए प्रजा पर अत्याचार किए जा रहे थे। कट्टर पंथियों में धर्मिक उन्माद थी । 

उक्त दशा को देखते हुए एक साहित्यकार के रूप में तुलसीदास जी ने एक बड़ा करेक्टर के रूप में राम को चुना। राम विष्णु का अवतार, राम मर्यादा पुरूषोत्तम, राम पितृभक्त, राम आदर्श पति और उदार भाई, सेवकों का हित चाहने वाला, प्रजा हितैषी सर्वगुण सम्पन्न, योद्धा और कुशल शासक। इतने बड़े करेक्टर को समक्ष में रखकर उन्होंने एक आदर्श समाज स्थापना की बात कहीं और बन गया रामचरित मानस बन गया। रामचरितमानस के अतिरिक्त तुलसीदास जी ने क

विनय पत्रिका, कवितावली, दोहावली, कृष्णगीतावली, संकटमोचन, हनुमान चालिसा, रामललानहछू, जानकी मंगलम् इत्यादि 36 रचनाएँ लिखी जिन्होंने हिन्दी साहित्य को नई ऊँचाई दी। इन साहित्यों के विषयवस्तु, भावपक्ष, कलापक्ष और भाषा पर भी विचार किया जाना चाहिए। 

ऐसे तो प्रत्येक काव्य का उद्देश्य होता है। रचनाकार किसी ना किसी उद्देश्य के लिए रचना करता है। वह जानता है कि वे किस उद्देश्य को लेकर रचना कर रहा है। काव्य सदैव प्रयोजन मूलक होता है। आचार्य भामह और भरत मुनि ने काव्य प्रयोजन पर विस्तृत प्रकाश डाला है। भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में कहा है -

दुखार्तांना, श्रमार्तांना, शोकार्तांना तपस्विनां

विश्राम जनन लोके नाट्यमेतर भविष्यति। जबकि भामह ने कहा है कि-

धर्मार्थं काम मोक्षेषु वैचमण्यं कलासुच

करोति कीर्ति प्रीतिच साधु काव्य निवेषणम्।

किन्तु तुलसीदास जी कहते हैं कि-

स्वान्तासुखाय तुलसी रधुनाय गाथा।

भाषा निबंध मति मंजुलामनोति।।

तुलसी दास ने भले ही यह कहा हो कि वे स्वान्तासुखय के लिए रचना कर रहे हैं किन्तु उनका काव्य लोक शिक्षा के निमित्त था, उन्होंने लोक को शिक्षित करने के लिए भिन्न-भिन्न परिदृश्य गढ़े। उन्होंने एक लोकतंत्रीय समाज में राजा की परिकल्पना की और कहते हैं-

नहिं अनीति नहिं कछु प्रभु ताई

सुनउ करहु जो तुम्हहि सोहाई।

जो अनीति कछु भाषौं भाई,

तौ मोहि बरजहु भय बिसराई।

वाल्मीकि रामायण में इसे इस तरह कहा है -

स्नेहं दयां च सौख्यां च यदि वा जानकीमपि

आराधनाय लोकस्य मुंचतो नास्ति में व्यथा।

तुलसीदास की प्रजा राजा की निंदा कर सकते हैं। वास्तव में यही राम राज्य की परिकल्पना है और यही प्रजातंत्र की स्थापना भी, उन्होंने मानस में राजा को कैसा होना चाहिए, कहा है, तो प्रजा के आचरण पर भी बात कही है। दोनों पक्ष को समाने रख है। तुलसीदास जी के लोक-दृष्टि को समझना सहज नहीं है। वे कहते हैं-

जासुराज प्रिय प्रजा दुखारी

ते नृप अवस नरक अधिकारी।

तुलसीदास जी कोरे धुनी रमाने वाले संत नहीं हैं, जिन्हें केवल अपनी मुक्ति की चिंता सताती है। वे तो लोक मुक्ति की आकांक्षा से प्रेरित संत हैं। उनके लिए राम केवल राजा नहीं है, वे लोक है, लोक विश्वास है और लोक की संवेदना है।

तुलसी दास अपने साहित्य के माध्यम से जातिगत ऊँच-नीच, भेद-भाव को मिटाने और सामाजिक न्याय की प्रतिष्ठा के पक्षधर हैं। वे धर्मनिरपेक्ष भी थे। उनके अनुसार भक्त चांडल भी श्रेष्ठ है। वे कहते हैं-

तुलसी भगत सपच भलो, भजै रैन-दिन राम।

ऊँचे कुल केहि काम को, जहाँ न हरिको नाम।

तुलसीदास जी काव्य कला की अपेक्षा लोक मंगल और लोकरंजन को अधिक प्रतिष्ठा देते हैं। महाकवि तुलसी के बारे में नज़िर बनारसी लिखते हैं -

तुलसी की तरह गमक-गमक कर तुमने

भक्ति का भी मैदान किया सर तुमने

जिस राम को बनवास दिया दशरथ ने

उस राम को घर-घर पहुँचा दिया तुमने।

जो दिल में था कागत पर उतारा तुमने

मिटता हुआ हर नक्श उभारा तुमने

संसार को राम ने सँवारा लेकिन

संसार के नाम को संवारा तुमने।

तुलसी का जीवन संघर्ष का इतिहास है, बाल्यावस्था से वे अनेक उपेक्षा सहे और यही संघर्ष उनके काव्यों को उत्कर्ष प्रदान किया। कवितावली के छंद में लिखते है-

जाति के, सुजाति के, कुजाति के पेटागि बस

खाए टूक सबके बिदित बात दुनीं सो।

मानस बचन-कायँ किए पाप सतिभायँ

राम को कहाइ दासु दगाबाज पुनी सो।

राम नाम के प्रभाउ पाउ महिमा, प्रतापु

तुलसी-सो जग मनिअत महानमुनी सो।

अतिहीं अभागी, अनुरागत न रामपद

मूढ़! एतो बड़ो अचिरिजु देखि-सुनी सो।।

तुलसी लोक निंदा के गरलपान से विचलित नहीं हुए। उन्हें अनेक संप्रदायों के लोग सताने में किसी प्रकार कोर कसर नहीं रखे-

कोऊ कहै करत कुसाज दगाबाज बड़ो

कोऊ कहै रामको गुलामु खरो खूब है।

साधु जानैं महासाधु खल जानैं महाखल

बनी झूँठी-साँची कोटि उठत हबूब है।।

चहत न काहूसौं न कहत काहूकी कछू

सबकी सहत उर अंतर न ऊब है।

तुलसी को भलो पीच हाथ रघुनाथ ही के

राम की भगति-भूमि मेरी मति दूब है।।

  तुलसीदास के काव्य मूलतः भारतीय संस्कृति की मूलभूत चेतना पर आधारित है। रामकथा के पात्रों और उनके आचरण विविध आयामों में अभिव्यक्त हुई। तुलसी का साहित्य निश्चिय ही उनके समय के सापेक्ष रहा है । आज तुलसी के राम जैसे लोक नायक की आवश्यकता है, जो शबरी के जूठे बेर खाकर धन्य हो जाए। ऐसे राम की आवश्यकता है जिन्होंने अवध से लेकर लंका तक केवल समता का महामंत्र फूँका। गोस्वमी तुलसीदास ने एक सभ्य समाज निर्माण की पहल अपने काव्यों के माध्यम से की। सुख में, दुख में, संयोग में, वियोग में, भोग में, त्याग में, जीवन के हर अनुभूति में मानव मूल्य की प्रतिस्थापना हो और आज इसी की आवश्यकता है। इसलिए तुलसीदास आज भी प्रासंगिक है।  आज भी तुलसीदास के काव्य घर-घर में पढ़ी जाती है इसका मुख्य कारण उनकी भाषा की सहजता और सरलता है। तुलसी ने अपने काव्य में पात्र अनुसार भाषा का प्रयोग किया है। छंदबद्ध रचनाओं में सरल भाषा प्रयोग अद्वितीय है। तुलसी संस्कृत के महापंडित थे, किन्तु उन्होंने लोकभाषा का चयन किया- जनकवि त्रिलोचन कहते है-

तुलसी बाबा भाषा मैंने तुमसे सीखी

मेरी सजग चेतना में तुम रमे हुए हो

कह सकते थे, तुम सब कड़वी, मीठी, तीखी

प्रखर काल की धारा में तुम जमे हुए हो।